गुरुवार, 20 अगस्त 2026

39. कषाय मार्गणा - हास्यादि चार नोकषाय

*39. कषाय मार्गणा - हास्यादि चार नोकषाय*
https://youtu.be/h980k6RrJXE?si=0-2dgRJDN2s4kySr
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✍️ हास्य, रति, अरति, शोक में 24 स्थान :-
01. गति –    4 में 4 भेद: नरक, तिर्यंच, मनुष्य और देव
02. इन्द्रिय – 5 में से 51 भेद: पाँचो इन्द्रिय में
03. काय –   6 में से 6 भेद: पंच स्थावर और त्रसकाय।
04. योग –   15 में से 15 योग:
मनोयोग 4, वचनयोग 4, काययोग 5 काययोग
05. वेद – 3 में से 3 वेद: भाववेद अपेक्षा तीनों वेदों में। 
06. कषाय – 25 में से 23 कषाय: हास्य या शोक में से एक, रति और अरति मे से एक।
07. ज्ञान – 8 में से 7 ज्ञान: केवलज्ञान छोडकर बाकी सातो ज्ञान।
08. संयम – 7 में से 5 भेद: असंयम, संयमासंयम, सामायिक, छेदोपस्थाना, परिहार विशुद्धि
09. दर्शन – 4 में 3 दर्शन: चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन, अवधिदर्शन।
10. लेश्या –   6 में 6 लेश्या: कृष्ण, नील, कापोत, पीत, पद्म, शुक्ल। 
11. भव्यत्व – 2 में से 2 भेद: भव्य-अभव्य।
12. सम्यक्त्व – 6 में से 6 भेद: औपशमिक, क्षायिक, क्षायोपशमिक, मिथ्यात्व, सासादन, मिश्न।
13. संज्ञी –       2 में से 2 भेद: संज्ञी-असंज्ञी।
14. आहारक – 2 में से 2 भेद: आहारक-अनहारक।
15. गुणस्थान – 14 में 9 भेद: पहले से नौवे तक।
👉विशेष - सत्ता अपेक्षा नौवे तक, उदय अपेक्षा आठवे तक
16. जीवसमास – 19 में से 19 भेद: सभी जीवसमास।
17. पर्याप्ति – 6 में से 6 भेद: आहार, शरीर, इन्द्रिय, श्वासोच्छ्वास, भाषा, मन:पर्याप्ति।
18. प्राण – 10 में से 10 प्राण: सभी दसों प्राण।
19. संज्ञा – 4 में 4 भेद: आहार, भय, मैथुन, परिग्रह।
20. उपयोग – 12 में से 10 भेद: केवलदर्शन और केवलज्ञान नही होता
21. ध्यान – 16 में से 13 भेद: 
आर्त ध्यान (4) – इष्टवियोगज, अनिष्टसंयोगज, वेदना, निदान
रौद्र ध्यान (4) – हिंसानंदी, मृषानंदी, चौर्यानंदी, परिग्रहनंदी
धर्मध्यान (4) – आज्ञाविचय, अपायविचय, विपाकविचय, संस्थान विचय धर्मध्यान।
शुक्लध्यान (1) पृथक्त्ववितर्क वीचार
22. आस्रव – 57 में से 55 भेद: हास्य या शोक में से एक, रति और अरति मे से एक। बाकी सभी
23. जाति – 84 लाख में से सभी 84 लाख जातियाँ।
(चारों गति संबंधि जाति)
24. कुल – साढे 199 लाख करोड़ में से सभी कुल होते है। (चारो गति संबंधी कुल)

✍️ हास्य नोकषाय :-
जिस कर्म के उदय से अनेक प्रकार का परिहास उत्पन्न होता है, वह हास्य कर्म है। *(धवला १३/३६१)*
जिसके उदय से हँसी आती है वह हास्य कर्म है *(सर्वार्थसिद्धि ८/९)*
∆ हास्य नोकषाय वाले का लक्षण :-
हास्य नोकषाय का उदय होने पर यह जीव प्रसन्नता के अवसर पर साकूत क्रोध में तथा कहीं पर अपमान होने के बाद अकेले ही या अन्य लोगों के सामने भी प्रकट कारण के बिना ही अर्थात् बिना कारण ही हँसता है अथवा अपने आप कुछ बड़बड़ाता जाता है। *(वरांग चारित्र ४/८३)*

✍️ रति नोकषाय :-
जिस कर्म-स्कन्ध के उदय से द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावों में राग उत्पन्न होता है उसकी रति संज्ञा है। *(धवला ६/४७)*
मनोहर वस्तुओं में परम प्रीति को रति कहते हैं। *(नि.सा.ता.६)*
∆ रति नोकषाय वाले का लक्षण :-
जब किसी जीव के रति नोकषाय का उदय होता है तो उसे उन दुष्ट लोगों से ही प्रीति होती है जो पाप कर्मों के करने में ही सदा लगे रहते हैं, जिनके कर्मों का परिणाम कुफल प्राप्ति ही होती है तथा निष्कर्ष शुद्ध अहित ही होता है। *(वरांग चारित्र ४/८४)*

✍️ अरति नोकषाय :-
जिसके उदय से आत्मा की देश आदि में उत्सुकता उत्पन्न नहीं होती है वह अरति कषाय है *(सर्वार्थसिद्धि ८/९)*
नाती, पुत्र एवं स्त्री आदि में रमण करने का नाम रति है, इसकी प्रतिपक्षभूत अरति कही जाती है। *(धवला १२/१८५)*
∆ अरति नोकषाय वाले का लक्षण :-
अरति नोकषाय के फल में जीव ज्ञानार्जन के साधन, व्रतपालन का शुभ अवसर, तप तपने की सुविधाएँ, ज्ञानाभावमार्जन की सामग्री, लौकिक और पारलौकिक सम्पत्ति (द्रव्य) तथा अन्य सुखों के कारणों की प्राप्ति हो जाने पर भी अपने आपको उनमें नहीं लगा सकता है। *(वरांग चारित्र ४/८५)*

✍️ शोक नोकषाय :-
उपकार करने वाले से सम्बन्ध के टूट जाने पर जो विकलता होती है वह शोक है। *(सर्वार्थसिद्धि ८/९)*
जिसके उदय से शोक होता है, वह शोक है *(राजवार्तिक ८/९)*
∆ शोक नोकषाय का लक्षण :-
जब प्राणी हर एक बात से उदासीन हो जाता है, लम्बी-लम्बी साँस छोड़ता है, मन को नियन्त्रित नहीं कर पाता है, फलतः मन सबसे अव्यवस्थित होकर चक्कर काटता है, इन्द्रियाँ इतनी दुर्बल हो जाती हैं कि अपना कार्य भी नहीं कर पाती हैं तथा बुद्धि विचार नहीं कर सकती है तब समझिये कि उसके शोक नोकषाय का उदय है। *(वरांग चारित्र ४/८७)*

✍️ किन हास्य कषाय वाले के वचन योग नहीं है :-
एकेन्द्रिय तथा लब्ध्यपर्याप्तक जीवों के वचनयोग नहीं होता है।
द्वीन्द्रियादि सभी जीवों की निर्वृत्यपर्याप्तक तथा अनाहारक अवस्था में भी बचन योग नहीं होता है।

✍️ शोक कषाय वाले पुरुषवेदी के गतियाँ :-
शोक कषायवाले पुरुषवेदी के तीन गतियाँ होती हैं (१) तिर्यञ्चगति (२) मनुष्यगति (३) देवगति। नरक गति नहीं है क्योंकि वहाँ पुरुषवेद नहीं पाया जाता है।

✍️ नारकियों के हास्य-रति कषाय का कारण :-
 नारकियों के उदय योग्य प्रकृतियों में मोहनीय कर्म की स्त्रीवेद एवं पुरुषवेद को छोड़ कर शेष २६ प्रकृतियाँ बतायी गई हैं। नारकी जीव भी दूसरे के मारने आदि की भावना पूरी होने पर खुश होते ही होंगे। अथवा तीसरे नरक तक देवों के द्वारा धर्मोपदेश सुन कर प्रसन्नता की अनुभूति होती है, उसे भी हास्य-रति कहा जा सकता है। 

✍️ देवों में अरति-शोक सम्बन्धी आस्रव प्रत्यय होने का कारण :-
देवों में भी अरति शोक का उदय पाया जाता है इसलिए उनके अरति-शोक सम्बन्धी आस्रव होता ही है। देव भी जब वाहन आदि बनने का आदेश सुनते हैं, उनकी देवांगना आदि रूठ जाती हैं तब उनके अरति, शोक का उदय होता है।

✍️ हास्य कषाय वाले अवधिज्ञानी के जीवसमास :-
हास्य कषायवाले अवधिज्ञानी के एक ही जीवसमास होता है सैनी पंचेन्द्रिय।

✍️ हास्य कषाय के साथ अचक्षुदर्शन में गुणस्थान :-
हास्य कषाय के साथ अचक्षुदर्शन में आठ गुणस्थान पाये जाते हैं- पहले से आठवें तक।

✍️ हास्य कषाय में अवधिदर्शनी के जातियाँ :-
हास्य कषाय में अवधिदर्शनी के पंचेन्द्रिय सम्बन्धी 26 लाख जातियाँ होती है।

✍️ हास्य कषाय के उदय मे आहार संज्ञा नहीं होना :-
सातवें एवं आठवें गुणस्थान वालों के हास्य कषाय का उदय होने पर भी आहार संज्ञा नहीं होती है, क्योंकि आहार संज्ञा छठे गुणस्थान से आगे नहीं होती है।

✍️ अनाहारक अवस्था नहीं होने वाले हास्य-रति कषाय वाले जीव :-
(१) तीसरे, पाँचवें, छठे, सातवें तथा आठवें गुणस्थान में स्थित हास्य-रति कषाय वाले जीवों के अनाहारक अवस्था नहीं होती है। 
(२) त्रऋजुगति से जाने वाले पहले, दूसरे तथा चौथे गुणस्थान वालों के भी हास्य-रति कषाय के साथ अनाहारक अवस्था नहीं होती है।

✍️ अरति-शोक वालों के अनाहारक अवस्था में गुणस्थान :-
अरति-शोक वालों के अनाहारक अवस्था में 03 गुणस्थान होते हैं पहला, दूसरा, चौथा। 
नोट - तेरहवें-चौदहवें में अरति-शोक कषाय नहीं है इसलिए उनका यहाँ ग्रहण नहीं किया है।

✍️ रति कषायवाले असैनी जीवों के कितने जीवसमास :-
रति कषाय वाले असैनी जीवों के 18 जीवसमास होते हैं - एकेन्द्रिय सम्बन्धी 14, विकलत्रय के 03 तथा असैनी पंचेन्द्रिय का 01 
*कषाय मार्गणा से चौबीस ठाणा में हास्यादि चार नोकषाय का वर्णन पूर्ण हुआ।*
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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*


बुधवार, 12 अगस्त 2026

38. कषाय मार्गणा - संज्वलन लोभ मे चौबीस ठाणा

38. कषाय मार्गणा - संज्वलन लोभ मे चौबीस ठाणा*
https://youtu.be/cITo6y_CjyA?si=XJVNj5fcmFWzDdp5
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जो संयम के साथ-साथ प्रकाशमान रहे एवं जिनके उदय से यथाख्यात चारित्र न हो वे संज्वलन कषायें हैं। *(हरिवंश पुराण ५८/२४१)*
∆ संज्वलन क्रोधादिक सकल कषाय के अभाव रूप यथाख्यात चारित्र का घात करते हैं। 
∆ संयम के साथ अवस्थान होने पर एक होकर जो ज्वलित होते हैं अर्थात् चमकते हैं अथवा जिनके स‌द्भाव में संयम चमकता रहता है उसे संज्वलन कषाय कहते हैं। *(सर्वार्थसिद्धि ८/९)*

*✍️ संज्वलन लोभ में 24 स्थान :-*
01. गति –    04 में 01 भेद: मनुष्य।
02. इन्द्रिय – 05 में से 01 भेद: पंचेन्द्रिय जीव।
03. काय –   06 में से 01 भेद: त्रसकाय।
04. योग –   15 में से 11 योग:
मनोयोग 04, वचनयोग 04, काययोग 03, (औदारिक काययोग, आहारक द्विक काययोग)
05. वेद – 03 में से 03 वेद: भाववेद अपेक्षा तीनों वेदों में। (अपगत वेदी भी)
06. कषाय – 25 में से 10 कषाय: 01 स्वकीय कषाय तथा 09 नोकषाय।
07. ज्ञान – 08 में से 04 ज्ञान: मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्यय ज्ञान।
08. संयम – 07 में से 04 भेद: सामायिक, छेदोपस्थाना, परिहार विशुद्धि, सूक्ष्म सांपराय
09. दर्शन – 04 में 03 दर्शन: चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन, अवधिदर्शन।
10. लेश्या –   06 में 03 लेश्या: पीत, पद्म, शुक्ल। 
11. भव्यत्व – 02 में से 01 भेद: भव्य।
12. सम्यक्त्व – 06 में से 03 भेद: औपशमिक, क्षायिक, क्षायोपशमिक।
13. संज्ञी –       02 में से 01 भेद: संज्ञी।
14. आहारक – 02 में से 01 भेद: आहारक।
15. गुणस्थान – 14 में 05 भेद: छठे से दस तक।
16. जीवसमास – 19 में से 01 भेद: सैनी पंचेन्द्रिय।
17. पर्याप्ति – 06 में से 06 भेद: आहार, शरीर, इन्द्रिय, श्वासोच्छ्वास, भाषा, मन:पर्याप्ति।
18. प्राण – 10 में से 10 प्राण: सभी दसों प्राण।
19. संज्ञा – 4 में 4 भेद: आहार, भय, मैथुन, परिग्रह।
20. उपयोग – 12 में से 07 भेद:
4 ज्ञानोपयोग – मतिज्ञानोपयोग, श्रुतज्ञानोपयोग, अवधिज्ञानोपयोग, मनःपर्यय ज्ञानोपयोग
3 दर्शनोपयोग – चक्षुदर्शनोपयोग, अचक्षुदर्शनोपयोग, अवधिदर्शनोपयोग।
21. ध्यान – 16 में से 08 भेद: 
आर्त ध्यान (3) – इष्टवियोगज, अनिष्टसंयोगज, वेदना।
धर्मध्यान (4) – आज्ञाविचय, अपायविचय, विपाकविचय, संस्थान विचय धर्मध्यान।
शुक्लध्यान (1) 
22. आस्रव – 57 में से 21 भेद: कषाय 10, योग 11।
23. जाति – 84 लाख में से सभी 14 लाख जातियाँ। *(मनुष्यगति संबंधि जाति)*
24. कुल – 199.5 लाख करोड़ में से 14 लाख करोड़ कुल। *(मनुष्य संबंधी कुल)*

*✍️ संज्वलन लोभ की उपमा :-*
संज्वलन लोभ को हारिद्र सदृश कहा गया है अर्थात् हल्दी के रंग की उपमा दी है। (ज.ध. १२/१५५)
∆ हारिद्र सदृश लोभ – जिस प्रकार हल्दी से रंगे गये वस्त्र का वर्ण चिरकाल तक नहीं ठहरता, वायु और आतप आदि के निमित्त से ही उड़ जाता है; उसी प्रकार यह लोभ का भेद मन्दतम अनुभाग से परिणत होने के कारण चिरकाल तक आत्मा में नहीं ठहरता है, क्षणमात्र में ही दूर हो जाता है। *(जय धवला १२/१५७)*

◆ संज्वलन लोभ वालों के हास्यादि कषाय का अभाव भी हो सकता है ?
हाँ, संज्वलन लोभ वालों के आठवें गुणस्थान के बाद अर्थात् नौवें, दसवें गुणस्थान में अवेद भाग से पहले हास्यादि कषायों का अभाव हो जाता है। 

*✍️ संज्वलन लोभ में निर्वृत्यपर्याप्तक अवस्था :-*
संज्वलन लोभ वाला भी जब छठे गुणस्थान में आहारक मिश्र योग वाला होता है तो उसके भी निर्वृत्यपर्याप्तक अवस्था बन जाती है। (जब आहारक शरीर बनता है तो वह शरीर सभी पर्याप्तिया पूर्ण करता है)

*✍️ संज्वलन लोभ में संयम :-*
संज्वलन लोभ में चार संयम होते हैं – सामायिक, छेदोपस्थापना, परिहार विशुद्धि और सूक्ष्मसाम्पराय। क्योंकि संज्वलन लोभ का उदय छठे गुणस्थान से दसवें गुणस्थान तक होता है।

*✍️ संज्वलन लोभ वाले के कौन से गुणस्थान में कौन सा सम्यक्त्व :-*
∆ छठे - सातवें गुणस्थान में क्षायिक, क्षायोपशमिक तथा उपशम सम्यक्त्व।
∆ उपशमश्रेणी के 8, 9, 10 गुणस्थान मे क्षायिक तथा उपशम सम्यक्त्व।
∆ क्षपक श्रेणी के 8, 9, 10 गुणस्थान में क्षायिक सम्यक्त्व।

*✍️  संज्वलन लोभ वाले के कम-से-कम प्राण :-*
संज्वलन लोभ वाले के कम-से-कम 07 प्राण हो सकते हैं - 05 इन्द्रिय प्राण, काय बल तथा आयु। ये 07 प्राण आहारकमिश्र की अपेक्षा जानने चाहिए क्योंकि संज्वलन लोभ का उदय 06 गुणस्थान से 10 गुणस्थान तक पाया जाता है।

*✍️ संज्वलन लोभ का उदय में चारों संज्ञाएँ की अपेक्षा :-*
संज्वलन लोभ का उदय दसवे गुणस्थान में ही नहीं होता है अपितु छठे से दसवे गुणस्थान तक होता है। इसलिए चारो संज्ञाएँ होती है।
छठे गुणस्थान में चारो संज्ञाए, सातवे गुणस्थान में आहार संज्ञा के अलावा तीनो संज्ञा, आठवे गुणस्थान में भी तीनो संज्ञाएं, नौवे गुणस्थान में भय भी चला जाता है केवल मैथुन और परिग्रह संज्ञा होती है। नौवे के अवेद भाग में एकमात्र परिग्रह संज्ञा बची, दसवे गुणस्थान में केवल परिग्रह संज्ञा रहती है।
👉 संज्वलन लोभ कषाय वालों के परिग्रह संज्ञा का अभाव नहीं हो सकता है क्योंकि कषाय के रहते हुए इच्छा, वांछाओं का अभाव नहीं हो सकता है। बाकी तीन संज्ञाओ का अभाव दसवे गुणस्थान से पहले हो जाता है।

*✍️ धर्मध्यान से रहित संज्वलन लोभ वाले जीव :-*
जिनके छठे गुणस्थान वालों के आर्त्तध्यान होते हैं उनके धर्मध्यान नहीं होते तथा अष्टम गुणस्थान से दसवें गुणस्थान तक मुनिराज धर्मध्यान से रहित होते हैं अर्थात् प्रथम शुक्ल ध्यान वाले होते हैं। अथवा सप्तम गुणस्थान से दसवें गुणस्थानवर्ती मुनिराज धर्मध्यानी ही होते हैं।

*✍️ आर्त्तध्यान नहीं होने वाले संज्वलन लोभ वाले :-*
सातवें गुणस्थान से दसवें गुणस्थान तक के संज्वलन लोभ कषायवालों के आर्त्तध्यान नहीं होते हैं।

*✍️ संज्वलन लोभ में कम-से-कम कितने आस्रव के प्रत्यय :-*
संज्वलन लोभ वालों के कम-से-कम 10 आस्रव के प्रत्यय होते हैं - 09 योग तथा 01 कषाय
9 योग - 4 मनोयोग, 4 वचनयोग तथा औदारिक काययोग।
01 कषाय - संज्वलन लोभ कषाय
◆ संज्वलन लोभ में ज्यादा से ज्यादा 21 आस्रव के प्रत्यय होते है (10 कषाय और 11 योग)
10 कषाय - नौ नोकषाय तथा संज्वलन क्रौधादि से एक
11 योग - मनोयोग 4, वचनयोग 4, काययोग 3, (औदारिक काययोग, आहारक द्विक काययोग)
*चौबीस ठाणा कषाय मार्गणा से संज्वलन लोभ मे चौबीस स्थान का वर्णन पूर्ण हुआ।*
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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*

गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

37. कषाय मार्गणा - संज्वलन क्रोध मान माया में चौबीस ठाणा

37. कषाय मार्गणा - संज्वलन क्रोध मान माया में चौबीस ठाणा*
https://youtu.be/ZHJN-2cfr-A?si=Npk8VDvtFyYEHuaM
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संयम के साथ अवस्थान होने पर एक होकर जो ज्वलित होते हैं अर्थात् चमकते हैं अथवा जिनके सद्भाव में संयम चमकता रहता है उसे संज्वलन कषाय कहते हैं।  *(सर्वार्थसिद्धि 8/9)*
∆ संज्वलन क्रोधादिक सकल कषाय के अभाव रूप यथाख्यात चारित्र का घात करते हैं। 
∆ जो संयम के साथ-साथ प्रकाशमान रहे एवं जिनके उदय से यथाख्यात चारित्र न हो वे संज्वलन कषायें हैं। *(हरिवंश पुराण 58/241)*

*✍️ संज्वलन क्रोध मान माया में चतुष्क में 24 स्थान :-*
01. गति – 04 में 01 भेद: मनुष्य।
02. इन्द्रिय – 05 में से 01 भेद: पंचेन्द्रिय जीव।
03. काय – 06 में से 01 भेद: त्रसकाय।
04. योग – 15 में से 11 योग:
मनोयोग 04, वचनयोग 04, काययोग 03, (औदारिक काययोग, आहारक द्विक काययोग)
05. वेद – 03 में से 03 वेद: तीनों वेदों में। (भाववेद अपेक्षा)
06. कषाय – 25 में से 10 कषाय: स्वकीय कषाय तथा नौ नोकषाय।
07. ज्ञान – 08 में से 04 ज्ञान: मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्यय ज्ञान।
08. संयम – 07 में से 03 भेद: सामायिक, छेदोपस्थाना, परिहार विशुद्धि
09. दर्शन – 04 में 03 दर्शन: चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन, अवधिदर्शन।
10. लेश्या – 06 में 03 लेश्या: पीत, पद्म, शुक्ल। 
11. भव्यत्व – 02 में से 01 भेद: भव्य।
12. सम्यक्त्व – 06 में से 03 भेद: औपशमिक, क्षायिक, क्षायोपशमिक।
13. संज्ञी – 02 में से 01 भेद: संज्ञी।
14. आहारक – 02 में से 01 भेद: आहारक।
15. गुणस्थान – 14 में 04 भेद: छठे से नौवे तक।
16. जीवसमास – 19 में से 01 भेद: सैनी पंचेन्द्रिय।
17. पर्याप्ति – 06 में से 06 भेद: आहार, शरीर, इन्द्रिय, श्वासोच्छ्वास, भाषा, मन:पर्याप्ति।
18. प्राण – 10 में से 10 प्राण: सभी दसों प्राण।
19. संज्ञा – 04 में 04 भेद: आहार, भय, मैथुन, परिग्रह।
20. उपयोग – 12 में से 07 भेद:
3 ज्ञानोपयोग – मतिज्ञानोपयोग, श्रुतज्ञानोपयोग, अवधिज्ञानोपयोग, मनःपर्यय ज्ञानोपयोग
3 दर्शनोपयोग – चक्षुदर्शनोपयोग, अचक्षुदर्शनोपयोग, अवधिदर्शनोपयोग।
21. ध्यान – 16 में से 08 भेद:
आर्त ध्यान (3) – इष्टवियोगज, अनिष्टसंयोगज, वेदना।
धर्मध्यान (4) – आज्ञाविचय, अपायविचय, विपाकविचय, संस्थान विचय धर्मध्यान।
22. आस्रव – 57 में से 21 भेद: कषाय 10, योग 11।
23. जाति – 84 लाख में से सभी 14 लाख जातियाँ।
(मनुष्यगति संबंधि जाति)
24. कुल – 199.5 लाख करोड़ में से 14 लाख करोड़ कुल। (मनुष्य संबंधी कुल)

*✍️  संज्वलन क्रोधादि की उपमा :-*
संज्वलन क्रोध को उदकराजि सदृश। (जल की पंक्ति के समान)
संज्वलन मान को लता सदृश वा बेंत के सदृश।
संज्वलन माया को अवलेखनी के सदृश या चामर के सदृश। *(जय धवला 12/152 से 155 वारंग चारित्र्)*
*◆ उदकराजि सदृश क्रोध :-*
यह क्रोध पर्वतशिला के भेद से मन्दतर अनुभाग वाला और स्तोकतर काल तक रहने वाला है क्योंकि पानी के भीतर उत्पन्न हुई रेखा का बिना दूसरे उपाय के तत्क्षण विनाश देखा जाता है। *(जय धवला 12/154)*
*◆ लता सदृश मान :-*
अन्तिम संज्वलन मान के संस्कार की तुलना  "बालों की घुंघराली लट"  से की है। आपाततः जैसे ही उसे शास्त्र ज्ञान रूपी हाथ से स्पर्श करते हैं वैसे ही वह क्षणभर में ही सीधा और सरल हो जाता है। (वारंग चारित्र् 4/73)
*◆ अवलेखनी (ब्रश) सदृश माया :-*
यह माया आत्मा को चमरी मृग के रोम के समान कर देती है। अतएव जैसे ही आत्मा रूपी रोम को आत्म-ज्ञान यंत्र में रखकर दबाते हैं तो तत्काल वह बिना विलम्ब अपने शुद्ध स्वभाव को प्राप्त कर लेता है। ((वारंग चारित्र् 4/77)*
 
*✍️ संज्वलन मान वाले के अवधिदर्शन के गुणस्थान :-*
संज्वलन मान वाले के अवधिदर्शन 4 गुणस्थानों में होता है - छठे, सातवें, आठवें तथा नौवें। इसी प्रकार क्रोध एवं माया में जानना चाहिए।
*◆ संज्वलन माया के शुक्ललेश्या के गुणस्थान :-*
संज्वलन माया वाले के शुक्ल लेश्या 4 गुणस्थानों में होती है  -छठे से नौवे गुणस्थान तक। इसी प्रकार क्रोध एवं मान में जानना चाहिए।
*◆ संज्वलन त्रिक में क्षायिक सम्यक्त्व :-*
संज्वलन त्रिक में क्षायिक सम्यक्त्व छठे, सातवें, आठवें और नौवें - इन चार गुणस्थानों में होता है।
*◆ संज्वलन माया में संज्ञाओं का अभाव :-*
संज्वलन माया में तीन संज्ञाओं का अभाव हो सकता है - आहार संज्ञा, भयसंज्ञा तथा मैथुन संज्ञा।
∆ परिग्रह संज्ञा का अभाव नहीं हो सकता है क्योंकि संज्वलन माया का उदय नौवें गुणस्थान तक होता है और चौथी संज्ञा दसवें गुणस्थान तक पायी जाती है। इसी प्रकार क्रोध एवं मान में जानना चाहिए।

*✍️ संज्वलन मान में कम-से-कम कितने उपयोग हो सकते हैं ?*
संज्वलन मान में कम-से-कम चार उपयोग हो सकते हैं-
मतिज्ञानोपयोग, श्रुतज्ञानोपयोग, चक्षुदर्शनोपयोग तथा अचक्षुदर्शनोपयोग। इसी प्रकार कोध माया एवं लोभ में भी जानना चाहिए।
*कषाय मार्गणा से संज्वलन क्रोध मान माया में चौबीस ठाणा का वर्णन पूर्ण हुआ।*
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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*

गुरुवार, 16 अप्रैल 2026

36. प्रत्याख्यानावरण चतुष्क मे चौबीस ठाणा*

*✍️ प्रत्याख्यानावरण चतुष्क में २४ स्थान*
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*०१) गति       ०२/०४*  मनुष्यगति, तिर्यंचगति
*०२) इन्द्रिय    ०१/०५*   पंचेन्द्रिय जीवो के
*०३) काय       ०१/०६*  त्रसकाय
*०४) योग       ०९/१५* 
       *मन ०४, वचन ०४, औदारिक काययोग*
*०५) वेद         ०३/०३*  तीनो वेद
*०६) कषाय     १०/२५*  
*प्रत्याख्यानावरण का स्वकीय तथा नौ नोकषाय*
*०७) ज्ञान         ०३/०८*  
        *मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान*
*०८) संयम       ०१/०७*  संयमासंयम
*०९) दर्शन       ०३/०४*  चक्षु, अचक्षु, अवधि
*१०) लेश्या       ०३/०६*  पीत, पदम, शुक्ल
        *अशुभ लेश्या नही होती*
*११) भव्यक्त्व   ०१/०२*  भव्यजीव
*१२) सम्यक्त्व   ०३/०६* औप,क्षा, क्षायोपशमिक 
*१३) संज्ञी         ०१/०२*  संज्ञी 
*१४) आहारक   ०१/०२*  आहारक
*१५) गुणस्थान   ०१/१४*  पांचवा संयमासंयम
*१६) जीवसमास  ०१/१९* सैनी पंचेन्द्रिय
*१७) पर्याप्ति      ०६/०६*  छहो पर्याप्तियाँ
*आहार,शरीर,इन्द्रिय,श्वासोच्छ,भाषा,मन:पर्याप्ति*
*१८) प्राण           १०/१०*   दसो प्राण
*इन्द्रिय ०५, बल ०३ आयु, श्वासोच्छवास प्राण*
*१९) संज्ञा         ०४/०४*  सभी संज्ञा
*आहार संज्ञा, भय संज्ञा, मैथुन संज्ञा, परिग्रह संज्ञा*
*२०) उपयोग      ०६/१२*  
*ज्ञानोपयोग  ०३* मति, श्रुत, अवधिज्ञानोपयोग
*दर्शनोपयोग ०३* चक्षु, अचक्षु, अवधिदर्शनोपयोग
*२१) ध्यान        ११/१६*  आर्त ०४, रौद ०४ धर्मध्यान ०३ *(संस्थान विचय धर्मध्यान नही हैं)*
*२२) आस्रव       ३०/५७*  
*अविरति ११* ०५ इन्द्रिय और मन को वश में नही करने तथा स्थावरकाय के जीवों की रक्षा नहीं करना
*कषाय १०* ०१ स्वकीय कषाय, ०९ नोकषाय
*योग ०९* मनोयोग०४, वचनयोग०४, काययोग ०१ 
*२३) जाति   १८ लाख/८४ लाख* तिर्यंचगति ०४ लाख, मनुष्यगनि १४ लाख
*एकेन्द्रिय और विकलत्रय नही होती*
*२४) कुल– ५७.५ ला.क / १९९.५ ला.क.* 
*४३.५ लाख करोड तिर्यंच,मनुष्य १४ लाख करोड*
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*प्रश्न ३७) प्रत्याख्यानावरण कषाय किसे कहते हैं*
उत्तर : जिसके उदय से सकल संयम विरति या सकल संयम को धारण नहीं कर सकता, वह समस्त प्रत्याख्यान का आवरण करने वाली प्रत्याख्यानावरण क्रोधादि कषाय है। *(रा.वा.५)* प्रत्याख्यान का अर्थ महाव्रत है। उनका आवरण करने वाला कर्म प्रत्याख्यानावरणीय कषाय है। 
*(ध. १३/३६०)*

*प्रश्न ३८) प्रत्याख्यानावरणीय क्रोधादि को किसकी उपमा दी जा सकती है?*
उत्तर
प्रत्याख्यानावरणीय क्रोध – धूलिरेखा सदृश / बालुकाराजि सदृश।
प्रत्याख्यानावरणीय मान – दारुस्तम्भ सदृश
प्रत्याख्यानावरणीय माया – गोमूत्र सदृश।
प्रत्याख्यानावरणीय लोभ – शरीर के मल के सदृश/पांशु लेप सदृश  *(ज.ध.१२/.१५३-१५५ वं.चा.)*

*प्रश्न ३९) धूलिरेखा सदृश क्रोध कैसा होता है?*
उत्तर: यथा नदी के पुलिन आदि में बालुकाराजि के मध्य पुरुष के प्रयोग से या अन्य किसी कारण से उत्पन्न हुई रेखा जिस प्रकार हवा के अभिघात आदि दूसरे कारण द्वारा शीघ्र ही पुनः समान हो जाती है अर्थात् रेखा मिट जाती है। इसी प्रकार यह क्रोध परिणाम भी मन्द रूप से उत्पन्न होकर गुरु के उपदेश रूपी पवन से प्रेरित होता हुआ अति शीघ्र उपशम को प्राप्त हो जाता है। *(ज.ध.१२/१५४)*
*(पुलिन=नदी का तट)*
अधिकत्तम - १५ दिन, जघन्य - अन्तरमुहूर्त

*प्रश्न ४०) दारु स्तम्भ सदृश मान कैसा होता है?*
उत्तर : इस मान में इतनी कठोरता आ जाती है जितनी गीली लकड़ी में आती है। फलतः जब ऐसा जीव रूपी काष्ठ ज्ञान रूपी तेल से सराबोर कर दिया जाता है, उसके उपरान्त ही वह सरलता से झुक सकता है। *(व.चा. ०४/७२)*

*प्रश्न ४१) गोमूत्र सदृश माया कैसी होती है?*
उत्तर : इस माया की तुलना चलते हुए बैल के मूत्र से बनी टेढ़ी-मेढ़ी रेखा से होती है। परिणाम यह होता है कि उसकी सभी चेष्टाएँ बैल के मूत्र के समान आधी-सीधी और आधी कुटिल एवं कपटपूर्ण होती हैं। *(व.चा. ०४/७६)*

*प्रश्न ४२) पांशु लेप सदृश लोभ कैसा होता है?*
उत्तर : पांशु का अर्थ होता है पैर
जिस प्रकार पैर में लगा धूलि का लेप पानी के द्वारा धोने आदि उपायों द्वारा सुखपूर्वक दूर कर दिया जाता है वह चिरकाल तक नहीं ठहरता। उसी के समान उत्तरोत्तर मन्द स्वभाव वाला वह लोभ का भेद भी चिरकाल तक नहीं ठहरता। यह अप्रत्याख्यानावरण लोभ से अनन्तगुणा हीन सामर्थ्य वाला होता हुआ थोड़े से प्रयत्न द्वारा दूर हो जाता है। *(ज.ध. १२/१५६)*
इस लोभ वाला प्राणी जैसे ही आत्मा को शास्त्राभ्यास रूपी जल से भली-भाँति धोता है तत्काल इस लोभ का नामोनिशान ही नष्ट हो जाता है। *(वरांग चारित्र ०४/७९)*

*प्रश्न ४३) क्या प्रत्याख्यानावरण कषाय वाले तिर्यंच मनुष्य दोनों के क्षायिक सम्यक्त्व होता है?*
उत्तर : नहीं, प्रत्याख्यानावरण कषाय के उदय वाले तिर्यञ्चों के क्षायिक सम्यक्त्व नहीं हो सकता है। केवल मनुष्यों में ही क्षायिक सम्यग्दृष्टि पंचम गुणस्थान को प्राप्त कर सकते हैं क्योंकि तिर्यंचो में क्षायिक सम्यक्त्व भोगभूमि में ही होता है अर्थात् कर्मभूमि तिर्यंचों के क्षायिक सम्यक्त्व नहीं होता है। भोगभूमि में संयम नहीं है इसलिए प्रत्याख्यानावरण कषाय वाले तिर्यंच के क्षायिक सम्यक्त्व नहीं हो सकता है।

*प्रश्न ४४) क्या ऐसे कोई प्रत्याख्यानावरण कषाय के उदय वाले तिर्यंच हैं जिनके उपशम सम्यक्त्व नहीं हो सकता है?*
उत्तर: हाँ, सम्मूर्च्छन जन्म वाले पंचेन्द्रिय तिर्यंच जो प्रत्याख्यानावरण कषाय के उदय वाले हैं उनके उपशम सम्यक्त्व नहीं हो सकता है।
*(क्योंकि उपशम सम्यक्त्व गर्भजो के ही होता है)* *(धवला ०६/४२९)*

*प्रश्न ४५) प्रत्याख्यानावरण कषाय में कम-से-कम कितने प्राण हैं?*
उत्तर : प्रत्याख्यानावरण कषाय में कम-से-कम भी १० प्राण ही होते हैं क्योंकि इस कषाय का उदय पंचम गुणस्थान में कहा गया है। वह पंचम गुणस्थान पर्याप्त जीवों के ही होता है।
◆ अगर अप्रत्याख्यानावरण कषाय का उदय हो तो कम से कम सात (०७) होते है।
◆ निवृत्यपर्याप्तक अवस्था मे भी चौथा गुणस्थान होता है और वहा सात (०७) प्राण होते है।
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आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)

गुरुवार, 2 अप्रैल 2026

35. अप्रत्याख्यानावरण चतुष्क मे चौबीस ठाणा

*✍️ अप्रत्याख्यानावरण चतुष्क में २४ स्थान*
*✍️ अप्रत्याख्यानावरण चतुष्क में २४ स्थान*
🕳️🕳️🕳️🕳️🕳️🕳️
*०१) गति       ०४/०४*   चारो गति में
*०२) इन्द्रिय    ०१/०५*   पंचेन्द्रिय जीवो के
*०३) काय       ०१/०६*  त्रसकाय
*०४) योग       १३/१५* (आहारकद्विक नही होता)
*०५) वेद         ०३/०३*  तीनो वेद
*०६) कषाय     १०/२५*  
अप्रत्याख्यानावरण स्वकीय तथा नौ नोकषाय
*०७) ज्ञान         ०३/०८*  
मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान
*०८) संयम       ०१/०७*  असंयम
*०९) दर्शन       ०३/०४*  चक्षु, अचक्षु, अवधि
*१०) लेश्या       ०६/०६*  सभी लेश्या 
कृष्ण, नील, कापोत, पीत, पदम और शुक्ल लेश्या।
*११) भव्यक्त्व   ०१/०२*  भव्य 
*१२) सम्यक्त्व   ०४/०६*  
औपशमिक, क्षायिक, क्षायोपशमिक, मिश्र 
*१३) संज्ञी         ०१/०२*  संज्ञी 
*१४) आहारक   ०२/०२*  आहारक, अनाहारक
ये चतुर्थ गुणस्थान वाले विग्रहगति मे भी जाते है
*१५) गुणस्थान   ०२/१४*  मिश्र, अविरत
*१६) जीवसमास  ०१/१९* सैनी पंचेन्द्रिय
*१७) पर्याप्ति      ०६/०६*  छहो पर्याप्तियाँ
आहार, शरीर, इन्द्रिय,श्वासोच्छ, भाषा,मन:पर्याप्ति
*१८) प्राण           १०/१०*   दसो प्राण
*इन्द्रिय ०५* स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और कर्ण
*बल ०३* कायबल, वचन बल और मनोबल प्राण
आयु प्राण और श्वासोच्छवास प्राण
*१९) संज्ञा         ०४/०४*  सभी संज्ञा
आहार संज्ञा, भय संज्ञा, मैथुन संज्ञा, परिग्रह संज्ञा।
*२०) उपयोग      ०६/१२*  
*ज्ञानोपयोग ०३* मति, श्रुत, अवधिज्ञानोपयोग
*दर्शनोपयोग ०३* चक्षु, अचक्षु, अवधिदर्शनोपयोग
*२१) ध्यान         १०/१६*  
*आर्त* इष्टवियोगज,अनिष्टसंयोगज,वेदना,निदान
*रौद* हिंसानन्दी,मृषानन्दी,चौर्यानन्दी,परिग्रहानन्दी
*धर्मध्यान* आज्ञाविचय, अपायविचय
*२२) आस्रव       ३५/५७*  
*अविरति १२* ०५ इन्द्रिय और मन को वश में नही करने तथा षट्काय के जीवों की रक्षा नहीं करना
*कषाय १०* ०१ स्वकीय कषाय, ०९ नोकषाय
*योग १३* मनोयोग०४, वचनयोग०४, काययोग ०५ 
*२३) जाति   २६ लाख/८४ लाख* 
चारो गति के पंचेन्द्रिय संबंधी जाति
*२४) कुल– १०८.५ ला.क / १९९.५ ला.क.* 
चारो गति के पंचेन्द्रिय संबंधी कुल 
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*प्रश्न २८) अप्रत्याख्यानावरण कषाय किसे कहते हैं?*
उत्तर : अ=नही, प्रत्याख्यान=त्याग, आवरण=किंचित त्याग भी नही होने दे, त्याग पर आवरण डाले वह अप्रत्याख्यानावरण कषाय है।
◆ जिसके उदय से यह प्राणी ईषत (न्यून) भी देशविरत (संयमासंयम) नामक व्रत को स्वीकार नही कर सकता है, स्वल्प मात्र भी व्रत धारण नहीं कर सकता है वह देशविरत प्रत्याख्यान का आवरण करने वाली अप्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया और लोभ कषाय है। *(रा.वा. ०८/०९)*
जो देशसंयम को अल्प मात्र भी न होने  उसे अप्रत्याख्यानावरण क्रोधादि कषाय कहते हैं। 
*(गो. क. जी. १३३)*

*प्रश्न २९) अप्रत्याख्यानावरण क्रोधादि को किसकी उपमा दी गई है?*
उत्तर :अप्रत्याख्यानावरण क्रोध =पृथ्वी रेखा सदृश
अप्रत्याख्यानावरण मान = हड्डी के समान, अस्थि स्तम्भ सदृश।
अप्रत्याख्यानावरण माया =बकरी के सींग या मेंढ़े के सींग सदृश।
अप्रत्याख्यानावरण लोभ = नील रंग/अक्षमल या कज्जल सदृश। *(ज.ध.१२/१५३-१५५ वं.चा.)*

*प्रश्न ३०) पृथ्वीरेखा सदृश क्रोध किसे कहते हैं?*
उत्तर : यह क्रोध पूर्व क्रोध (नगराजि सदृश क्रोध) (न=नही, ग=गमन करे, जो गमन ना करे यानि पर्वत, राजी=श्रद्धला यानि पर्वतो की कतार) से मन्द अनुभाग वाला है, क्योंकि चिरकाल तक अवस्थित होने पर भी इसका पुनः दूसरे उपाय से सन्धान (जुड़ना) हो जाता है। यथा ग्रीष्म काल में पृथिवी का भेद हुआ (गाड़ी गड़ार/दरार बन गई) पुनः वर्षा काल में जल के प्रवाह से वह दरार भरकर उसी समय संधान को प्राप्त हो गई। इसी प्रकार जो क्रोध परिणाम चिरकाल तक अवस्थित रहकर भी पुनः दूसरे कारण से तथा गुरु के उपदेश आदि से उपशम भाव को प्राप्त होता है वह इस प्रकार का तीव्र परिणाम भेद पृथिवी रेखा सदृश है। 
*(ज.ध. १२/१५३)*
ये संस्कार काफी समय बीतने पर अथवा शास्त्र रूपी जल वृष्टि से चित्त स्नेहार्द्र हो जाने पर उपशम को प्राप्त हो जाता है। *(व.चा. ४/६७)*

*प्रश्न ३१)अस्थिस्तम्भ सदृश मान किसे कहते है?*
उत्तर : पुराण पुरुष कहते हैं कि दूसरे मान का उदय आत्मा में हड्डी के समान कर्कशता ला देता है, परिणाम यह होता है कि जब जीव ज्ञान रूपी आग में काफी तपाया जाता है तो उसमें कुछ-कुछ विनम्रता आ ही जाती है। *(व.चा. ४/७१)*

*प्रश्न ३२) मेढ़े के सींग सदृश माया किसे कहते हैं?*
उत्तर : इस माया का आत्मा पर पड़ने वाला संस्कार मेढ़े के सींग के समान गुड़ीदार होता है फलतः इस कषाय से आक्रान्त व्यक्ति मन में कुछ सोचता है और जो करता है वह इससे बिल्कुल भिन्न होता है। *(व.चा. ४/७५)*

*प्रश्न ३३) अक्षमल सदृश लोभ किसे कहते हैं?*
उत्तर : अक्ष (रथ का चक्का) का मल अक्षमल है। अक्षांजन के स्नेह से गीला हुआ मषीमल अति चिक्कण होने से उस अक्षमल को सुखपूर्वक दूर करना शक्य नहीं है। उसी प्रकार यह लोभ परिणाम भी  "निधत्त स्वरूप"  होने से जीव के हृदय में अवगाढ़ होता है इसलिए उसे दूर करना शक्य नहीं है। 
*(ज.ध. १२/१५६)* 
जैसे ही जीव अपने आपको ज्ञान रूपी जल में धोता है वैसे ही आत्मा तुरन्त शुचि और स्वच्छ हो जाता है। *(व.चा. ४/७९)*

*प्रश्न ३४) अप्रत्याख्यानावरण कषाय वाले क्षायिक सम्यग्दृष्टि के कितने उपयोग हो सकते हैं?*
उत्तर : अप्रत्याख्यानावरण कषाय वाले क्षायिक सम्यग्दृष्टि के छह (०६) उपयोग हो सकते हैं -
*०३ ज्ञानोपयोग* मति, श्रुत, अवधिज्ञानोपयोग।
*०३ दर्शनोपयोग* चक्षु, अचक्षु, अवधिदर्शनोपयोग

*प्रश्न ३५) अप्रत्याख्यानावरण कषाय वाले कार्मण काययोगी के कितने आस्रव प्रत्यय हो सकते हैं ?*
उत्तर : कार्मण काययोग में स्थित अप्रत्याख्यानावरण कषाय वाले के बाईस (२२) आस्रव के प्रत्यय होते हैं -
९ कषाय = ८ नोकषाय (स्त्री वेद बिना), १ स्वकीय अर्थात् क्रोधादि में से एक 
०१ योग = कार्मण काययोग
१२ अविरति = छहकाय व पांच इन्द्रिय और मन के संबंधी अविरति

*प्रश्न ३६) अप्रत्याख्यानावरण कषाय वाले व्यंतर देव के कितने आस्रव के प्रत्यय होते हैं?*
उत्तर : अप्रत्याख्यानावरण कषाय वाले व्यंतरदेव के उनतीस २९ आस्रव के प्रत्यय होते हैं -
१२ अविरति =
०८ कषाय - ०७ नोकषाय (देव है इसलिए स्त्रीवेद नहीं है) तथा ०१ स्वकीय कषाय है।
०९ योग - (०४ मनोयोग, ०४ वचनयोग, वैक्रियिक काययोग)    *(१२+८+९ = २९ आस्रव प्रत्यय)*
(यहा मिथ्यात्व को नही लिया है क्योकि यह सम्यग्दर्शन वाला जीव है)
*नोट* स्वकीय कषाय के साथ प्रत्याख्यानावरण तथा संज्वलन क्रोधादि को भी ग्रहण करने पर आस्रव के दो प्रत्यय और हो जाते हैं।
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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*

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*०१) गति       ०४/०४*   चारो गति में
*०२) इन्द्रिय    ०१/०५*   पंचेन्द्रिय जीवो के
*०३) काय       ०१/०६*  त्रसकाय
*०४) योग       १३/१५* (आहारकद्विक नही होता)
*०५) वेद         ०३/०३*  तीनो वेद
*०६) कषाय     १०/२५*  
अप्रत्याख्यानावरण स्वकीय तथा नौ नोकषाय
*०७) ज्ञान         ०३/०८*  
मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान
*०८) संयम       ०१/०७*  असंयम
*०९) दर्शन       ०३/०४*  चक्षु, अचक्षु, अवधि
*१०) लेश्या       ०६/०६*  सभी लेश्या 
कृष्ण, नील, कापोत, पीत, पदम और शुक्ल लेश्या।
*११) भव्यक्त्व   ०१/०२*  भव्य 
*१२) सम्यक्त्व   ०४/०६*  
औपशमिक, क्षायिक, क्षायोपशमिक, मिश्र 
*१३) संज्ञी         ०१/०२*  संज्ञी 
*१४) आहारक   ०२/०२*  आहारक, अनाहारक
ये चतुर्थ गुणस्थान वाले विग्रहगति मे भी जाते है
*१५) गुणस्थान   ०२/१४*  मिश्र, अविरत
*१६) जीवसमास  ०१/१९* सैनी पंचेन्द्रिय
*१७) पर्याप्ति      ०६/०६*  छहो पर्याप्तियाँ
आहार, शरीर, इन्द्रिय,श्वासोच्छ, भाषा,मन:पर्याप्ति
*१८) प्राण           १०/१०*   दसो प्राण
*इन्द्रिय ०५* स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और कर्ण
*बल ०३* कायबल, वचन बल और मनोबल प्राण
आयु प्राण और श्वासोच्छवास प्राण
*१९) संज्ञा         ०४/०४*  सभी संज्ञा
आहार संज्ञा, भय संज्ञा, मैथुन संज्ञा, परिग्रह संज्ञा।
*२०) उपयोग      ०६/१२*  
*ज्ञानोपयोग ०३* मति, श्रुत, अवधिज्ञानोपयोग
*दर्शनोपयोग ०३* चक्षु, अचक्षु, अवधिदर्शनोपयोग
*२१) ध्यान         १०/१६*  
*आर्त* इष्टवियोगज,अनिष्टसंयोगज,वेदना,निदान
*रौद* हिंसानन्दी,मृषानन्दी,चौर्यानन्दी,परिग्रहानन्दी
*धर्मध्यान* आज्ञाविचय, अपायविचय
*२२) आस्रव       ३५/५७*  
*अविरति १२* ०५ इन्द्रिय और मन को वश में नही करने तथा षट्काय के जीवों की रक्षा नहीं करना
*कषाय १०* ०१ स्वकीय कषाय, ०९ नोकषाय
*योग १३* मनोयोग०४, वचनयोग०४, काययोग ०५ 
*२३) जाति   २६ लाख/८४ लाख* 
चारो गति के पंचेन्द्रिय संबंधी जाति
*२४) कुल– १०८.५ ला.क / १९९.५ ला.क.* 
चारो गति के पंचेन्द्रिय संबंधी कुल 
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*प्रश्न २८) अप्रत्याख्यानावरण कषाय किसे कहते हैं?*
उत्तर : अ=नही, प्रत्याख्यान=त्याग, आवरण=किंचित त्याग भी नही होने दे, त्याग पर आवरण डाले वह अप्रत्याख्यानावरण कषाय है।
◆ जिसके उदय से यह प्राणी ईषत (न्यून) भी देशविरत (संयमासंयम) नामक व्रत को स्वीकार नही कर सकता है, स्वल्प मात्र भी व्रत धारण नहीं कर सकता है वह देशविरत प्रत्याख्यान का आवरण करने वाली अप्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया और लोभ कषाय है। *(रा.वा. ०८/०९)*
जो देशसंयम को अल्प मात्र भी न होने  उसे अप्रत्याख्यानावरण क्रोधादि कषाय कहते हैं। 
*(गो. क. जी. १३३)*

*प्रश्न २९) अप्रत्याख्यानावरण क्रोधादि को किसकी उपमा दी गई है?*
उत्तर :अप्रत्याख्यानावरण क्रोध =पृथ्वी रेखा सदृश
अप्रत्याख्यानावरण मान = हड्डी के समान, अस्थि स्तम्भ सदृश।
अप्रत्याख्यानावरण माया =बकरी के सींग या मेंढ़े के सींग सदृश।
अप्रत्याख्यानावरण लोभ = नील रंग/अक्षमल या कज्जल सदृश। *(ज.ध.१२/१५३-१५५ वं.चा.)*

*प्रश्न ३०) पृथ्वीरेखा सदृश क्रोध किसे कहते हैं?*
उत्तर : यह क्रोध पूर्व क्रोध (नगराजि सदृश क्रोध) (न=नही, ग=गमन करे, जो गमन ना करे यानि पर्वत, राजी=श्रद्धला यानि पर्वतो की कतार) से मन्द अनुभाग वाला है, क्योंकि चिरकाल तक अवस्थित होने पर भी इसका पुनः दूसरे उपाय से सन्धान (जुड़ना) हो जाता है। यथा ग्रीष्म काल में पृथिवी का भेद हुआ (गाड़ी गड़ार/दरार बन गई) पुनः वर्षा काल में जल के प्रवाह से वह दरार भरकर उसी समय संधान को प्राप्त हो गई। इसी प्रकार जो क्रोध परिणाम चिरकाल तक अवस्थित रहकर भी पुनः दूसरे कारण से तथा गुरु के उपदेश आदि से उपशम भाव को प्राप्त होता है वह इस प्रकार का तीव्र परिणाम भेद पृथिवी रेखा सदृश है। 
*(ज.ध. १२/१५३)*
ये संस्कार काफी समय बीतने पर अथवा शास्त्र रूपी जल वृष्टि से चित्त स्नेहार्द्र हो जाने पर उपशम को प्राप्त हो जाता है। *(व.चा. ४/६७)*

*प्रश्न ३१)अस्थिस्तम्भ सदृश मान किसे कहते है?*
उत्तर : पुराण पुरुष कहते हैं कि दूसरे मान का उदय आत्मा में हड्डी के समान कर्कशता ला देता है, परिणाम यह होता है कि जब जीव ज्ञान रूपी आग में काफी तपाया जाता है तो उसमें कुछ-कुछ विनम्रता आ ही जाती है। *(व.चा. ४/७१)*

*प्रश्न ३२) मेढ़े के सींग सदृश माया किसे कहते हैं?*
उत्तर : इस माया का आत्मा पर पड़ने वाला संस्कार मेढ़े के सींग के समान गुड़ीदार होता है फलतः इस कषाय से आक्रान्त व्यक्ति मन में कुछ सोचता है और जो करता है वह इससे बिल्कुल भिन्न होता है। *(व.चा. ४/७५)*

*प्रश्न ३३) अक्षमल सदृश लोभ किसे कहते हैं?*
उत्तर : अक्ष (रथ का चक्का) का मल अक्षमल है। अक्षांजन के स्नेह से गीला हुआ मषीमल अति चिक्कण होने से उस अक्षमल को सुखपूर्वक दूर करना शक्य नहीं है। उसी प्रकार यह लोभ परिणाम भी  "निधत्त स्वरूप"  होने से जीव के हृदय में अवगाढ़ होता है इसलिए उसे दूर करना शक्य नहीं है। 
*(ज.ध. १२/१५६)* 
जैसे ही जीव अपने आपको ज्ञान रूपी जल में धोता है वैसे ही आत्मा तुरन्त शुचि और स्वच्छ हो जाता है। *(व.चा. ४/७९)*

*प्रश्न ३४) अप्रत्याख्यानावरण कषाय वाले क्षायिक सम्यग्दृष्टि के कितने उपयोग हो सकते हैं?*
उत्तर : अप्रत्याख्यानावरण कषाय वाले क्षायिक सम्यग्दृष्टि के छह (०६) उपयोग हो सकते हैं -
*०३ ज्ञानोपयोग* मति, श्रुत, अवधिज्ञानोपयोग।
*०३ दर्शनोपयोग* चक्षु, अचक्षु, अवधिदर्शनोपयोग

*प्रश्न ३५) अप्रत्याख्यानावरण कषाय वाले कार्मण काययोगी के कितने आस्रव प्रत्यय हो सकते हैं ?*
उत्तर : कार्मण काययोग में स्थित अप्रत्याख्यानावरण कषाय वाले के बाईस (२२) आस्रव के प्रत्यय होते हैं -
९ कषाय = ८ नोकषाय (स्त्री वेद बिना), १ स्वकीय अर्थात् क्रोधादि में से एक 
०१ योग = कार्मण काययोग
१२ अविरति = छहकाय व पांच इन्द्रिय और मन के संबंधी अविरति

*प्रश्न ३६) अप्रत्याख्यानावरण कषाय वाले व्यंतर देव के कितने आस्रव के प्रत्यय होते हैं?*
उत्तर : अप्रत्याख्यानावरण कषाय वाले व्यंतरदेव के उनतीस २९ आस्रव के प्रत्यय होते हैं -
१२ अविरति =
०८ कषाय - ०७ नोकषाय (देव है इसलिए स्त्रीवेद नहीं है) तथा ०१ स्वकीय कषाय है।
०९ योग - (०४ मनोयोग, ०४ वचनयोग, वैक्रियिक काययोग)    *(१२+८+९ = २९ आस्रव प्रत्यय)*
(यहा मिथ्यात्व को नही लिया है क्योकि यह सम्यग्दर्शन वाला जीव है)
*नोट* स्वकीय कषाय के साथ प्रत्याख्यानावरण तथा संज्वलन क्रोधादि को भी ग्रहण करने पर आस्रव के दो प्रत्यय और हो जाते हैं।
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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*

गुरुवार, 26 मार्च 2026

34. अनंतानुबंधी चतुष्क चौबीस ठाणा में

*✍️ अनंतानुबंधी चतुष्क में २४ स्थान*
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*०१) गति       ०४/०४*   
*०२) इन्द्रिय    ०५/०५*   
*०३) काय       ०६/०६*  
*०४) योग       १३/१५* (आहारकद्विक नही होता)
*०५) वेद          ०३/०३*  
*०६) कषाय     १०/२५*  
अनंतानुबंधी की स्वकीय कषाय तथा नौ नोकषाय
*०७) ज्ञान         ०३/०८*  
*कुज्ञान ०३* कुमतिज्ञान, कुश्रुतज्ञान, कुअवधिज्ञान
*०८) संयम       ०१/०७*  असंयम
*०९) दर्शन       ०२/०४*  चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन
अवधिदर्शन भी किन्ही किन्ही आचार्यो ने कहा है
*१०) लेश्या       ०६/०६*  सभी लेश्या 
कृष्ण, नील, कापोत, पीत, पदम और शुक्ल लेश्या।
*११) भव्यक्त्व   ०२/०२*  भव्य और अभव्य।
*१२) सम्यक्त्व   ०२/०६*  मिथ्यात्व, सासादन 
*१३) संज्ञी         ०२/०२*  संज्ञी और असंज्ञी।
*१४) आहारक   ०२/०२*  आहारक, अनाहारक
*१५) गुणस्थान   ०१/१४*  मिथ्यात्व, सासादन
*१६) जीवसमास  १९/१९* सभी जीवसमास 
*१७) पर्याप्ति      ०६/०६*  छहो पर्याप्तियाँ
आहार, शरीर, इन्द्रिय,श्वासोच्छ, भाषा,मन:पर्याप्ति
*१८) प्राण         १०/१०*  सभी प्राण
*इन्द्रिय ०५* स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और कर्ण
*बल ०३* कायबल, वचन बल और मनोबल प्राण
आयु प्राण और श्वासोच्छवास प्राण
*१९) संज्ञा         ०४/०४*  सभी संज्ञा
आहार संज्ञा, भय संज्ञा, मैथुन संज्ञा, परिग्रह संज्ञा।
*२०) उपयोग      ०५/१२*  
*ज्ञानोपयोग ०३* कुमति, कुश्रुत, कुअवधिज्ञानो
*दर्शनोपयोग ०२* चक्षु, अचक्षुदर्शनोपयोग
*२१) ध्यान         ०८/१६*  
*आर्त* इष्टवियोगज,अनिष्टसंयोगज,वेदना,निदान
*रौद* हिंसानन्दी,मृषानन्दी,चौर्यानन्दी,परिग्रहानन्दी 
*२२) आस्रव       ४०/५७*  
*मिथ्यात्व०५* विपरीत,एकान्त,विनय,संशय,अज्ञान
*अविरति १२* ०५ इन्द्रिय और मन को वश में नही करने तथा षट्काय के जीवों की रक्षा नहीं करना
*कषाय १०* ०१ स्वकीय कषाय, ०९ नोकषाय
*योग १३* मनोयोग०४, वचनयोग०४, काययोग ०५ 
*२३) जाति   ८४ लाख/८४ लाख*  सभी जाति
*२४) कुल– १९९.५ ला. क./ १९९.५ ला. क.*  
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*प्रश्न १३)अनन्तानुबन्धी कषाय किसे कहते हैं?*
उत्तर : अनन्त संसार का कारण होने से मिथ्यादर्शन को अनन्त कहते हैं। उस अनन्त को बांधने वाली कषाय अनन्तानुबन्धी कषाय कहलाती है। 
*(राजवार्तिक ०५)*
जिन कषायों के द्वारा जीव में उत्पन्न हुए संस्कारों का अनन्त भवों में अवस्थान माना गया है वे अनन्तानुबंधी कषायें हैं।
जो क्रोध, मान, माया, लोभ सम्यग्दर्शन व सम्यक् चारित्र का विनाश करते हैं तथा जो अनन्त भव के अनुबन्धन स्वभाव वाले होते हैं वे अनन्तानुबन्धी कहलाते हैं। *(ध.१३/ ३६९)*

*प्रश्न १४) अनन्तानुबन्धी कषाय कितने प्रकार की होती है?*
उत्तर : अनन्तानुबन्धी कषाय चार प्रकार की होती है- (१) क्रोध (२) मान (३) माया (४) लोभ ।

*प्रश्न १५) अनन्तानुबन्धी क्रोधादि को किसकी उपमा दी गई है?*
उत्तर : अनन्तानुबन्धी क्रोध - पत्थर की रेखा अथवा नगराजि सदृश कहा गया है।
अनन्तानुबन्धी मान - पत्थर के स्तम्भ अथवा शैल स्तम्भ सदृश कहा गया है।
अनन्तानुबन्धी माया - बाँस सदृश अथवा बाँस वृक्ष की गठीली जड़ के सदृश कही
अनन्तानुबन्धी लोभ - किरमिच रंग अथवा कृमिराग सदृश कहा गया है। *(ज.ध. १५३-१५५ वां.चा.)*

*प्रश्न १६) पत्थर की रेखा सदृश क्रोध किसे कहते हैं ?*
उत्तर : इस क्रोध का संस्कार आत्मा पर इतना तीव्र पड़ता है कि उसकी उपमा पत्थर पर खोदी गई रेखा से दी जाती है। यही कारण है कि ये क्रोधादि जन्म जन्मान्तरों में भी जाकर शांत नहीं होती हैं और निमित्त सामने आते ही भड़क उठते हैं। 
*(व.चा. ४/६६)*
जिस प्रकार पर्वतशिला किसी कारण से भेद को प्राप्त होकर पुनः किसी उपाय से नहीं जुड़ती, उसी प्रकार जो क्रोध किसी पुरुष विशेष में उत्पन्न होकर किसी दूसरे उपाय से उपशम को प्राप्त नहीं होता है, प्रतिकार रहित होकर उस भव में भी उसी प्रकार बना रहता है वही नगराजि (पत्थर की रेखा) सदृश क्रोध है। *(ज.ध.१२/१५३)*

*प्रश्न १७) शैल स्तम्भ के समान मान किसे कहते हैं?*
उत्तर : यह मान इतना तीव्र और विवेकहीन होता है कि शास्त्रकारों ने इसे पत्थर के स्तम्भ के समान माना है। इसीलिए अनन्तकाल बीत जाने पर भी उससे आक्रान्त जीव में तनिक भी मृदुता या विनम्रता नहीं आती है। *(व.चा. ४/७०)?

*प्रश्न १८) बाँस की जड़ के सदृश माया किसे कहते हैं?*
उत्तर : बाँस वृक्ष की जड़ की गाँठ नष्ट होकर तथा शीर्ण होकर भी सरल नहीं की जा सकती है, इसी प्रकार अतितीव्र वक्र भाव से परिणत माया परिणाम भी निरुपक्रम (किसी भी उपाय से हटने योग्य नहीं) होता है। *(जय धवला १२/१५५)*
◆ मायाचार करने वाले की चित्तवृत्ति बाँस की जड़ों के समान हो जाती है। इसी कारण उसके चाल चलन और तथा कुटिल हो जाते हैं और उनमें सीधापन नहीं आता है। *(व. चा. ४/७४)*

*प्रश्न १९) कृमिराग सदृश लोभ किसे कहते हैं?*
उत्तर : कृमिराग एक कीट विशेष होता है। वह नियम से जिस वर्ण के आहार को ग्रहण करता है उसी वर्ण के अतिचिक्कण डोरे को अपने मल त्यागने के द्वार से निकालता है। क्योंकि उसका वैसा ही स्वभाव है। उस सूत्र (धागे) द्वारा जुलाहे अति कीमती अनेक वर्ग वाले नाना वस्त्र बनाते हैं। उस के रंग को यद्यपि हजार कलशों की सतत धारा द्वारा प्रक्षालित किया जाता है, नाना प्रकार के सारयुक्त जलों द्वारा धोया जाता है तो भी उस रंग को थोड़ा भी दूर करना शक्य नहीं है क्योंकि वह अतिनिकाचित स्वरूप है, अग्नि में जलावे जाने पर दूर करना शक्य नही है क्याकि यह अतिनिकाचित स्वरूप है, अग्नि मे जलाये जाने पर भी भस्मपने को प्राप्त होते हुए उस कृमिराग से रंजित हुए वस्त्र का रंग कभी छूटने योग्य न होने से वैसा ही बना रहता है। इसी प्रकार जीव के हृदय में स्थित अतितीव्र लोभ परिणाम, जिसे कृश नहीं किया जा सकता, वह कृमिराग के रंग के सदृश कहा जाता है।
*(ज.ध. १२/१५६)*

*प्रश्न २०) जहाँ अनन्तानुबन्धी क्रोध होता है वहाँ चारों क्रोध होते हैं अतः यहाँ पर भी चारों क्रोधों को लेना चाहिए?*
उत्तर : जहाँ अनन्तानुबन्धी क्रोध होता है वहाँ अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्याख्यानावरण तथा संज्वलन क्रोध होता ही है फिर भी यहाँ पर अनन्तानुबन्धी क्रोध की विवक्षा होने से अन्य क्रोधो को गौण करके मात्र अनन्तानुबन्धी क्रोध को ही आस्रव के कारणों में ग्रहण किया है। इसी प्रकार मान आदि में भी जानना चाहिए।
अनन्तानुबन्धी चतुष्क में से भी एक समय में एक का ही उदय आता है अर्थात् क्रोध के साथ मान, माया आदि का उदय नहीं हो सकता।

*प्रश्न २१) क्या अनन्तानुबन्धी को कभी भी नष्ट नहीं किया जा सकता है?*
उत्तर : यद्यपि अनन्तानुबन्धी कषाय का वासना काल अनन्त काल है, अनन्तानुबन्धी कषाय पत्थर की रेखा के समान है फिर भी पुरुषार्थ के माध्यम से उसे पुरुषार्थ के माध्यम से जिस प्रकार पत्थर पर बनी हुई लकीर को भी घिसकर साफ किया जा सकता है, उसी प्रकार अनन्तानुबन्धी कषाय को भी करण (अध:करण आदि) रूप परिणामों के द्वारा एक अन्तर्मुहत में नष्ट किया जा सकता है। 
(अध:करण, अपूर्वकरण, अनिवृत्तिकरण)

*प्रश्न २२) क्या ऐसे भी कोई जीव हैं जिनके अनन्तानुबन्धी कषाय का कभी नाश नहीं होगा?*
उत्तर : हाँ, अभव्य जीवों के अनन्तानुबंधी कषाय का कभी नाश नहीं होगा तथा वे भव्य जीव जो सती विधवा के समान हैं अर्थात् अभव्य सम भव्य जीवों के भी कभी अनन्तानुबन्धी कषाय का नाश नहीं होगा, क्योंकि इनमें मोक्ष जाने की क्षमता होते हुए भी इन्हें कभी अनन्तानुबन्धी चतुष्क को क्षय, उपशम करने के योग्य निमित्त नहीं मिलेंगे। जिस प्रकार सती विधवा को पुत्रप्राप्ति के योग्य निमित्त नहीं मिलेंगे इसलिए उसमें पुत्रप्राप्ति की क्षमता होने पर भी उसे कभी पुत्र की प्राप्ति नहीं होगी।
*(अभव्य जीव = बाझ स्त्री)*

*प्रश्न २३) क्या ऐसे कोई जीव हैं जिनके अब कभी अनन्तानुबंधी सम्बन्धी आस्रव के प्रत्यय नहीं होंगे?*
उत्तर : हाँ, वे जीव जिन्होंने क्षायिक-सम्यग्दर्शन प्राप्त कर लिया है तथा जो कृतकृत्य वेदक सम्यग्दृष्टि हैं उनको भी कभी अनन्तानुबन्धी सम्बन्धी आस्रव नहीं होगा। तथा दूसरे-तीसरे नरक में जाने के सम्मुख मिथ्यादृष्टि (तीर्थंकर प्रकृति की सत्ता वाला) जीव जब तक नरक में पहुँचकर सम्यक्त्व प्राप्त नहीं कर लेते उन जीवों को छोड़कर शेष जिन्होंने तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध कर लिया है उनके भी कभी अनन्तानुबन्धी कषाय के निमित्त से आस्रव नहीं होगा, क्योंकि ये कभी सम्यक्त्व से च्युत (होकर पहले दूसरे गुणस्थान को प्राप्त) नहीं होते हैं।
◆ यद्यपि वे तीसरे गुणस्थान को भी प्राप्त नही करते है लेकिन यहा अनंतानुबंधी कषाय की विवक्षा होने से उसे यहा ग्रहण नही किया है।
◆ मिथ्यात्व-०५, अविरति-१२, कषाय-१०, योग- १३ कुल आस्रव के प्रत्यय ४० है।

प्रश्न २४) अनन्तानुबन्धी का क्षय कौनसी गति में किया जा सकता है?*
उत्तर : अनन्तानुबन्धी कषाय का क्षय मात्र मनुष्य गति में ही किया जा सकता है। उसमें भी कम- से-कम आठ वर्ष अन्तर्मुहूर्त की आयु वाला कर्म भूमिया मनुष्य ही केवली, श्रुतकेवली के पादमूल में कर सकता है, अन्य कोई नहीं।
◆ नोट - (१) अनन्तानुबन्धी कषाय का कभी सीधा क्षय नहीं होता है। अनन्तानुबन्धी कषाय का विसंयोजन अर्थात् अन्य कषाय में परिवर्तित करके ही उसका क्षय किया जाता है।
(२) वह दुखमा-सुखमा काल में जन्मा जीव ही होना चाहिए।
◆ क्षयोपशमिक सम्यक्त्व - मिथ्यात्व, सम्यक्त्व मिथ्यात्व का उदयाभावी क्षय - इन्ही का सद अवस्था रुप उपशम और सम्यक प्रकृति का उदय इसे कहते है क्षयोपशमिक सम्यक्त्व।
◆ कृतकृत्य वेदक - अनंतानुबंधी चतुष्क समाप्त हो जाए तथा मिथ्यात्व, सम्यक मिथ्यात्व इन छह का नष्ट होना तथा जहा केवल सम्यक प्रकृति बचे उसे कहते है कृतकृत्य वेदक सम्यक्त्व, है यह भी क्षयोपशमिक सम्यक्त्व।

*प्रश्न २५) अनन्तानुबन्धी कषाय वाले के मति आदि ज्ञान क्यों नहीं होते हैं?*
उत्तर : अनन्तानुबन्धी कषाय के साथ मिथ्यात्व का उदय रहता है। उस मिथ्यात्व के कारण प्राणी जीवादि पदार्थों के यथार्थ स्वरूप को नहीं समझ सकता है, उसको इनका यथार्थ श्रद्धान नहीं हो सकता है इसलिए उसके मति, श्रुत तथा अवधिज्ञान विपरीत हो जाते हैं। कहा भी है- *“सदसतोरविशेषाद्यदृच्छोपलब्धेरुन्मत्तवत्" (त.सू. १/३२)*
उन्मत्त पुरुष के समान मिथ्यादृष्टि जीव भी पदार्थों का सही स्वरूप नहीं समझ सकता है। उसका ज्ञान कड़वी तूम्बी में रखे गये मीठे दूध के समान मिथ्या रूप हो जाता है।
दूसरे गुणस्थान में मिथ्यात्व का उदय नहीं है, फिर भी वहाँ मिथ्याज्ञान ही कहे गये हैं
यद्यपि वे तीसरे गुणस्थान को भी प्राप्त नहीं करते हैं लेकिन यहाँ अनन्तानुबन्धी कषाय की विवक्षा होने से उसे यहाँ ग्रहण नहीं किया है।
क्योंकि अनन्तानुबन्धी कषाय सम्यक्त्व का घात करने वाली भी कही गई है। दूसरी बात, दूसरे गुणस्थान वाले नियम से मिथ्यात्व में ही प्रवेश करते हैं इसलिए अनन्तानुबन्धी कयाय वाले के मति आदि ज्ञान नहीं होते हैं।

*प्रश्न २६) अनन्तानुबन्धी की शक्ति दो स्वभाव (सम्यक्त्व घातक तथा चारित्र घातक) रूप है, इसमें क्या युक्ति है?*
उत्तर : अनन्तानुबन्धी चतुष्क दर्शनमोहनीय स्वरूप नहीं माने जा सकते हैं क्योंकि सम्यक्त्त्व प्रकृति, मिथ्यात्व तथा सम्यग्मिथ्यात्व प्रकृति के द्वारा ही आवरण किये जाने वाले दर्शन मोहनीय के फल का अभाव है। और न इन्हें चारित्रमोहनीय स्वरूप ही माना जा सकता है, क्योंकि अप्रत्याख्यानावरणादि कषायों के द्वारा आवरण किये गये चारित्र के आवरण करने में फल का अभाव है। इसलिए उपर्युक्त अनन्तानुबन्धी कषायों का अभाव सिद्ध होता है। किन्तु उनका अभाव नहीं है, क्योंकि सूत्र में इनका अस्तित्व पाया जाता है। इसलिए इन अनन्तानुबन्धी कषायों के उदय में सासादन भाव की उत्पत्ति अन्यथा हो नहीं सकती है। इसी अन्यथानुपपत्ति से इनके दर्शनमोहनीयता और चारित्रमोहनीयता अर्थात् सम्यक्त्व और चारित्र को घात करने की शक्ति का होना सिद्ध होता है। 
*(धवला ०६/४२)*  *( सूत्र यानि शास्त्र)*

*प्रश्न २७) बाँस की जड़ के समान माया में कितने उपयोग हो सकते हैं?*
उत्तर : बाँस सदृश माया में कम-से-कम ०३ उपयोग हो सकते हैं- (१) कुमतिज्ञानोपयोग (२) कुश्रुत ज्ञानोपयोग (३) अचक्षु दर्शनोपयोग।
ये तीन उपयोग एकेन्द्रिय, द्विन्द्रिय, त्रीन्द्रिय जीवों की अपेक्षा कहे गये हैं।
अधिक से अधिक ०५ उपयोग हो सकते है - कुमति, कुश्रुत, कुअवधि, चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन
◆ जो आचार्य अवधिदर्शन को प्रथम गुणस्थान से स्वीकार करते हैं उनकी अपेक्षा ०६ उपयोग हो सकते हैं अर्थात् उपर्युक्त पाँच उपयोगों के साथ अवधिदर्शन भी हो सकता है। 
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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*

गुरुवार, 19 मार्च 2026

33. कषाय मार्गणा (चौबीस ठाणा)

https://youtu.be/kmW0dRvFzX4?si=cjRzMCSYTYpzeITz


*प्रश्न ०१) कषाय और कषाय मार्गणा किसे कहते हैं?*
उत्तर : जो तत्वार्थश्रद्धान रूप सम्यक्त्त्व, अणुव्रत रूप देशचारित्र, महाव्रत रूप सकल चारित्र और यथाख्यात चारित्र रूप आत्मा के विशुद्ध परिणामों को कषती अर्थात् घातती है उसे कषाय कहते हैं। *(गो.जी. २८२-८३)*
जो संसारी जीव के ज्ञानावरण आदि 08 मूल प्रकृति और 148 उत्तर प्रकृति के भेद से भिन्न शुभ-अशुभ कर्म रूप क्षेत्र को कषति अर्थात् जोतती हैं वे कषायें हैं।
क्रोधादि कषायों में अथवा कषाय और अकषाय में जीवों की खोज करने को कषाय मार्गणा कहते हैं।

*प्रश्न ०२) कषाय मार्गणा कितने प्रकार की होती है?*
उत्तर : कषाय मार्गणा चार प्रकार की होती है -क्रोध,  मान, माया, लोभ।   *(बृ.द्र.सं. १३ टीका)*
अथवा कषायें पच्चीस होती हैं -
अनन्तानुबन्धी–क्रोध, मान, माया, लोभ।
अप्रत्याख्यानावरण – क्रोध, मान, माया, लोभ।
प्रत्याख्यानावरण – क्रोध, मान, माया, लोभ।
संज्वलन – क्रोध, मान, माया, लोभ। = कुल १६
नौ नोकषाय - हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, स्त्रीवेद, पुरुषवेद और नपुंसकवेद। =०९
१६ + ०९ = २५ कषाय 
कषाय मार्गणा के अनुवाद से क्रोधकषायी, मान कषायी, मायाकषायी, लोभकषायी तथा कषाय रहित जीव होते हैं।  *(धवला ०१/३४८)*

*प्रश्न ०३) क्या कषायरहित जीव भी होते हैं?*
उत्तर : हाँ, कषायरहित जीव भी होते हैं। ११ वें, १२ वें, १३ वें, १४ वें गुणस्थान वाले तथा सिद्ध भगवान कषाय से रहित होते हैं।

*प्रश्न ०४) नोकषाय किसे कहते हैं ?*
उत्तर : ईषत् कषाय को नोकषाय कहते हैं। यहाँ ईषत् अर्थात् किंचित् यानि अल्प (न्यून) को नोकषाय कहा है। *(सर्वा. ०८/०९ )*
जिस प्रकार कुत्ता स्वामी का इशारा पाकर बलवन्त हो जाता है और जीवों को मारने के लिए प्रवृत्ति करता है तथा स्वामी के इशारों से वापिस आ जाता है; उसी प्रकार क्रोधादि कषाओ के बल पर ही ईषत् प्रतिषेध होने पर हास्यादि नोकषायों की प्रवृत्ति होती है। क्रोधादि कषायों के अभाव में निर्बल रहती है इसलिए हास्यादि को ईषत्-कषाय, अकषाय या नोकषाय कहते हैं। *(रा.वा.०८/०९)*

*प्रश्न ०५) ये चारों चौकड़ी किसका घात करती हैं?*
उत्तर : ◆ अनन्तानुबन्धी क्रोधादि कषायें सम्यक्त्व एवं चारित्र का घात करती हैं। 
चतुर्थादि गुणस्थान मे जो प्रथमोपशम, द्वितियोपशम सम्यक्त्व वाले होते है, उनके जब अनंतानुबंधी का उदय आता है, वहा सम्यक्त्व की विराधना हो जाती है। तथा जो विराधना हुई तो इसी से पता चलता है कि अनंतानुबंधी के उदय से सम्यक्त्व नष्ट होता है, विराधित होता है।
◆ अप्रत्याख्यानावरण क्रोधादि कषायें देशसंयम (अणुव्रतों) का घात करती हैं। गुणस्थान ०५ वा
◆ प्रत्याख्यानावरण क्रोधादि कषायें सकल संयम (महाव्रतो) का घात करती हैं। गुणस्थान ०६-१०
◆ संज्वलन क्रोधादि कषायें यथाख्यात संयम का घात करती हैं। गुणस्थाना ११, १२, १३, १४

*प्रश्न ०६) क्रोध कषाय किसे कहते हैं?*
उत्तर : युक्तायुक्त विचार से रहित दूसरे के घात की वृत्ति, शरीर में कम्पन, दाह, नेत्रों में लालिमा तथा मुख की विवर्णता लक्षण वाला क्रोध है। 
अपने या पर के अपराध से अपना या दूसरों का नाश होना या नाश करना क्रोध है। 
*(य.ति.च. ०८/४६७)*
जिसके उदय से अपने और पर के घात करने के परिणाम हों तथा पर के उपकार करने के अभाव रूप भाव अर्थात् पर का उपकार करने के भाव न होना वा क्रूर भाव हो सो क्रोध कषाय है।

*प्रश्न ०७) मान कषाय किसे कहते हैं?*
उत्तर : मन में कठोरता, ईर्षा, दया का अभाव, दूसरों के मर्दन का भाव, अपने से बड़ों को नमस्कार नहीं करना, अहंकार, दूसरों की उन्नति को सहन नहीं करना लक्षण मान हैं।
जाति आदि के मद से दूसरे के तिरस्कार रूप भाव को मान कषाय कहते हैं। युक्ति दिखा देने पर भी दुराग्रह नहीं छोड़ना मान है। *(रा.वा. ०८/०९)*
रोष से या विद्या आदि के मद से दूसरे के तिरस्कार रूप भाव को मान कषाय कहते हैं। *(ध.१/३४९)*

*प्रश्न ०८) माया कषाय किसे कहते हैं?*
उत्तर : नाना प्रकार के प्रतारण के उपायों द्वारा ठगने के लिए आकुलित मति और विनय, विश्वासाभास से चित्त को हरण करने के लिए बनी आकृति माया है।
दूसरों को ठगने के लिए जो छल-कपट और कुटिल भाव होता है वह माया है। *(रा.वा. ०८/०९)*
अपने हृदय में विचारो को छिपाने की जो चेष्ठा की जाती है वह माया है। *(धवला १२)*

*प्रश्न ०९)  लोभ कषाय किसे कहते हैं?*
उत्तर : परिग्रह के ग्रहण में अतीव लालायित मानसिक भावना, परिग्रह के लाभ से अतिप्रसन्नता, ग्रहण किये हुए परिग्रह के रक्षण से उत्पन्न आर्त्तध्यान लोभ है।
चेतन स्त्री-पुत्रादिक में और अचेतन धन-धान्यादिक पदार्थों में ये "मेरे हैं" इस प्रकार की चित्त में उत्पन्न हुई विशेष तृष्णा को लोभ कहते हैं। अथवा 
इन पदार्थों की वृद्धि होने पर जो विशेष संतोष होता है, इनके विनाश होने पर महान् असंतोष होता है वह लोभ है। *(य. ति. च. ८/४६७)*

*प्रश्न १०) वासना काल किसे कहते हैं ?*
उत्तर : उदय का अभाव होते हुए भी कषाय का संस्कार जितने काल तक रहता है, उसे वासना काल कहते हैं।  *(गो.क.जी. ४६-४७)* जैसे किसी पुरुष ने क्रोध किया। फिर क्रोध छूट कर वह अपने काम में लग गया। वहाँ क्रोध का उदय तो नहीं है परन्तु वासना काल है इसलिए जिस पर क्रोध किया था, उस पर क्षमा रूप भाव उत्पन्न नहीं हुआ है। इसी प्रकार सभी कषायों का वासना काल जानना चाहिए।

*प्रश्न ११)  कषायों का वासना काल कितना है ?*
उत्तर : कषायों का वासना काल -
*कषाय                              वासना काल*
संज्वलन चतुष्क का :             एक अन्तर्मुहूर्त
प्रत्याख्यानावरण चतुष्क का :  एक पक्ष
अप्रत्याख्यानावरण चतुष्क का  छह माह
अनन्तानुबन्धी चतुष्क का : संख्यात भव, असंख्यात भव, अनन्त भव।   *(गो.क.जी. ४६-४७)*

*प्रश्न १२) किस गति के प्रथम समय में कौनसी कषाय की प्रधानता है ?*
उत्तर : नरक गति में उत्पन्न जीवों के प्रथम समय में क्रोध का उदय, 
मनुष्यगति में मान का उदय,
तिर्यंचगति में माया का उदय,
देवगति में लोभ के उदय का नियम है। ऐसा आचार्य परम्परागत उपदेश है। *(धवला ०४/४४५)*
🗣️विशेष : महाकर्मप्रकृति प्राभृत प्रथम सिद्धान्त के कर्त्ता भूतबली आचार्य के अभिप्रायानुसार किसी भी गति मे कोई भी कषाय का उदय हो सकता है।
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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*

बुधवार, 18 मार्च 2026

32. चौबीस ठाणा मे अपगतवेदी जीव

*✍️२४ स्थान अपगतवेद में*
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*०१) गति        ०१/०४*  मनुष्यगति
*०२) इन्द्रिय     ०१/०५*  पंचेन्द्रिय
*०३) काय       ०१/०६*  त्रसकाय
*०४) योग       ११/१५*   मन ०४, वचन ०४, काय ०३ (औदारिकद्विक, कार्मण काययोग) 
*०५) वेद         ००/०३*  कोई नही
केवल द्रव्यवेद होता है पुरुषवेद, भाववेद नही 
*०६) कषाय      ०४/२५*  संज्वलन कषाय
नौवे गुणस्थान ०४, दसवे मे सूक्ष्म लोभ, ११ से १४ गुणस्थान मे कोई भी नही 
*०७) ज्ञान         ०५/०८*  
मति, श्रुत, अवधिज्ञान, मनःपर्यय, केवलज्ञान
*०८) संयम       ०४/०७*  
सामायिक,क्षेदोपस्थापना,सुक्ष्मसाम्पराय,यथाख्यात
*०९) दर्शन       ०४/०४*  
चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन, अवधिदर्शन, केवलदर्शन
*१०) लेश्या       ०१/०६*  शुक्ल लेश्या 
*११) भव्यक्त्व   ०१/०२*  भव्य जीव 
*१२) सम्यक्त्व   ०२/०६* सामायिक, द्वितियोपशम
*१३) संज्ञी         ०१/०२*  संज्ञी 
*१४) आहार      ०२/०२*  आहारक, अनाहारक 
अनहारक समुद्धात अपेक्षा तथा १४ वे गुणस्थान में
*१५) गुणस्थान   ०६/१४*  ०९ से १४ तक
*१६) जीवसमास  ०१/१९*  सैनी पंचेन्द्रिय
*१७) पर्याप्ति    ०६/०६*  
आहार, शरीर, इन्द्रिय,श्वासोच्छ, भाषा,मन:पर्याप्ति
*१८) प्राण         १०/१०*  सभी प्राण
*इन्द्रिय ०५* स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और कर्ण
*बल ०३* कायबल, वचन बल और मनोबल प्राण
आयु प्राण और श्वासोच्छवास प्राण
*१९) संज्ञा         ०१/०४*  परिग्रह संज्ञा 
परिग्रह संज्ञा दसवे गुणस्थान तक है, आगे कोई नही
*२०) उपयोग     ०९/१२*  (०६ + ०३)
*२१) ध्यान         ०४/१६*  चारो शुक्ल ध्यान 
*२२) आस्रव       १५/५७*  
कषाय-०४, योग -११ (१४ वे आस्रव नही होता है) 
*२३) जाति    १४ लाख/८४ लाख*  मनुष्यगति की
*२४) कुल– १४ ला.क. /१९९.५ ला. क.*  
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*प्रश्न ३०) अपगतवेदी किसे कहते हैं?*
उत्तर- जो स्त्री, पुरुष तथा स्त्री-पुरुष दोनों की अभिलाषा रूप परिणामों की तीव्र वेदना से होने वाले संक्लेश से रहित हैं, वे अपगतवेदी हैं। 
जो कारीष, तृण तथा इष्टपाक की अग्रि के समान परिणामों के वेदन से उन्मुक्त हैं और अपनी आत्मा में उत्पन्न हुए श्रेष्ठ अनन्तसुख के धारक भोक्ता हैं वे अपगतवेदी हैं। *(पं. सं. प्रा. ०१/१०८)*
जिनके तीनों प्रकार के वेदों से उत्पन्न होने वाला संताप दूर हो गया है वे वेदरहित जीव हैं। *(धवला ०१ /३४२)*

*प्रश्न ३१) अपगतवेदी जीवों के कितनी कषायें होती हैं?*
उत्तर- अपगतवेदी जीवों के ०४ कषाये होती हैं संज्वलन क्रोध, मान, माया, लोभ।
नवमें गुणस्थान में पहले वेद का अभाव होता है । उसके बाद संज्वलन कषायों का नाश होता है । इसलिए नवमें गुणस्थान में संज्वलन क्रोधादि चारों कषाए पाये जाते हैं तथा दसवें गुणस्थान में केवल सूक्ष्म लोभ पाया जाता है। *(धवला ०२)*
ग्यारहवें से चौदहवें गुणस्थान तक तथा सिद्ध भगवान भी अपगतवेदी होते हैं लेकिन उनके कषाय भी नहीं होती है।

*प्रश्न ३२) अपगतवेद में पाँचों ज्ञान किस अपेक्षा से पाये जाते हैं?*
उत्तर- अपगतवेदी के ०९ वें, १० वें, ११ वें तथा १२ वें गुणस्थान में मति, श्रुत, अवधि और मनःपर्यय ज्ञान होता है। १३ वें और १४ वें गुणस्थान में केवलज्ञान पाया जाता है। *(धवला ०२)* 
सिद्ध भगवान के ज्ञान को भी केवलज्ञान कहते हैं।
नोट – इसी प्रकार चार दर्शनों में भी जानना चाहिए

*प्रश्न ३३) अपगतवेद में संयम की विवेचना किस प्रकार करनी चाहिए?*
उत्तर- अपगतवेद में चार संयम होते है –
सामायिक-छेदोपस्थापना सयम ०९ वे गुणस्थान की अवेद अवस्था में होते है। यानि ०६ से ०९ गुणस्थान
सूक्ष्म साम्पराय संयम – १० वें गुणस्थान में होता है।
यथाख्यात संयम – ११-१२-१३-१४ वें गुणस्थान में पाया जाता है। *(धवला ०२)*

*प्रश्न ३४) अपगतवेद में दो सम्यकत्व किस अपेक्षा से कहे गये हैं?*
उत्तर – अपगतवेदी के उपशम सम्यकत्व – उपशम श्रेणी में स्थित ०९ वे (अवेद भाग में) १० वें तथा ११वें गुणस्थान में पाया जाता है।
क्षायिक सम्यकत्व – उपशम श्रेणी में स्थित ०९ वे से ११ वें गुणस्थान तक तथा क्षपक श्रेणी में स्थित ०९ वे, १० वें, १२ वें गुणस्थान में और १३ वें, १४ वें गुणस्थान तथा सिद्ध भगवान के भी पाया जाता है । *(धवला ०२)*

*प्रश्न ३५) अपगतवेदी के वेद का अभाव भाव की अपेक्षा होता है या द्रव्य की अपेक्षा ?*
उत्तर- (यद्यपि पाँचवें गुणस्थान से आगे भी द्रव्यवेद का सद्‌भाव पाया जाता है, परन्तु केवल द्रव्य वेद से ही विकार उत्पन्न नहीं होता है ।) 
यहाँ पर तो भाववेद का अधिकार है, इसलिए भाववेद के अभाव से ही उन जीवों को अपगतवेदी जानना चाहिए, द्रव्यवेद के अभाव से नहीं। 
*(ध. ०१/३४५)* 
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*✍️समुच्चय प्रश्नोत्तर*
*प्रश्न ३६) किन-किन जीवों के तीनों वेद होते हैं?*
उत्तर-तिर्यंच असंज्ञी पंचेन्द्रिय से लेकर संयतासंयत गुणस्थान तक तीनों वेद से युक्त होते है। इससे पहले सभी नियम से नपुंसक वेद है। 
*(धवला ०१/१०७-१०८)* 
मनुष्य मिथ्यादृष्टि गुणस्थान से लेकर अनिवृत्तिकरण गुणस्थान तक तीनों वेद वाले होते है। आगम में नवमे गुणस्थान के सवेद भाग पर्यन्त द्रव्य से एक पुरुषवेद और भाव से तीनों वेद हैं ऐसा कथन किया है। *(गो. जी. जी. २७१)*

*प्रश्न ३७) कौन सी गति के जीवों में एक, दो, तीन वेद तथा वेद रहित अवस्था भी होती है?*
उत्तर- मनुष्यगति के जीवों में एक वेद, दो वेद, तीन वेद तथा वेद रहित अवस्था भी होती है-
*◆ एक पुरुष वेद* आहारक ऋद्धि, मनःपर्ययज्ञान, परिहार विशुद्धि संयम तथा सभी ६३ शलाका पुरुषों के एक मात्र पुरुषवेद होता है। ये द्रव्य से तो पुरुष होते है भाव से भी पुरुष होते है।
*◆ एक नपुंसक* वे सभी सम्मूर्च्छन नपुंसक वेद होता है क्योकि ये अपर्याप्तक होते है, श्वास के १८ वे भाग मे इनका मरण हो जाता है। इनकी संख्या भी असंख्यात है।
*◆ दो वेद वाले* भोगभूमि, कुभोगभूमि तथा सर्व म्लेच्छ खण्डों में रहने वाले जीवो के दो वेद होते है - स्त्रीवेद और पुरुषवेद (इनका द्रव्यवेद और भाववेद दोनो समान होते है)
*◆तीन वेद वाले* कर्मभूमिया मनुष्य इनके तीनो वेद होते है।
*◆अपगतवेदी* नवमें गुणस्थान के अवेद भाग से आगे चौदहवे गुणस्थान तक के मनुष्य।

*प्रश्न ३८) ऐसे कौन-कौन से योग हैं जो तीनों वेद वालों के भी होते हैं और अपगतवेदीके भी होते हैं?*
उत्तर- ११ योग तीनों वेदों में भी होते हैं तथा अपगतवेदी के भी होते हैं –
मनोयोग-०४, वचनयोग-०४ तथा काययोग -०३ (औदारिकद्विक तथा कार्मण) 

*प्रश्न ३९) ऐसा कौन- कौनसा वेद है जिसकी अनाहारक अवस्था में तीन ही गतियाँ होती है?*
उत्तर- तीनों ही वेदों की अनाहारक अवस्था में तीन गतियाँ ही होती हैं –
*स्त्रीवेद में* तिर्यंचगति, मनुष्यगति, देवगति।
*पुरुषवेद में* तिर्यंचगति, मनुष्यगति, देवगति।
*नपुंसक वेद में* नरकगति, तिर्यंचगति, मनुष्यगति

*प्रश्न ४०) नरकगति में जाते समय द्रव्य स्त्री और पुरुष वेदी के कम-से-कम कितने आस्रव के प्रत्यय हो सकते हैं?*
उत्तर- *द्रव्य स्त्रीवेदी* जो यहाँ से नरकगति में जा रहा है उसके विग्रहगति में कम-से-कम आस्रव के ४१ प्रत्यय हो सकते हैं–०५ मिथ्यात्व,१२ अविरति, २३ कषाय तथा ०१ योग। 
*द्रव्य पुरुषवेदी* के नरक में जाते समय कम से कम ३२ आस्रव के प्रत्यय हैं –१२ अविरति, १९ कषाय तथा ०१ योग। 
नोट: द्रव्य पुरुषवेदी ही सम्यग्दर्शन को लेकर नरक गति में जा सकता है क्योंकि क्षायिक सम्यग्दर्शन तथा कृतकृत्य वेदक सम्यक द्रव्य पुरुष-वेदी के ही होते हैं। इसलिए उसके ०५ मिथ्यात्व तथा अनन्तानुबन्धी सम्बन्धी आस्रव के प्रत्यय निकल जावेंगे।

*प्रश्न ४१) क्या अपगतवेदी आस्रव रहित भी होते हैं?*
उत्तर- हाँ, चौदहवें गुणस्थानवर्ती अपगतवेदी आस्रव रहित ही होते हैं। सिद्ध भगवान भी आस्रव रहित ही होते हैं।

*प्रश्न ४२) किस-किस स्थान के सभी उत्तर भेदों में तीनों वेद पाये जाते हैं?*
उत्तर- आठ स्थानों के सभी उत्तर भेदों में तीनों वेद पाये जाते हैं- लेश्या, भव्यत्व, सम्बक्च, संज्ञी, आहार, पर्याप्ति,  प्राण,  संज्ञा।
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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

31. नपुंसकवेद मार्गण चौबीस ठाणा

*31. नपुंसकवेद मार्गण*
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*नपुंसक* जो ना ही स्त्री है और ना पुरुष है वो नुपंसक है। जिसके बाहर मे ना तो स्त्री के चिन्ह जैसे स्तन, योनि आदि पाये जाते है ना ही पुरुष के चिन्ह जैसे दाढी मूछ आदि चिन्ह, दोनो से रहित होता है, तीव्र काम पीडा से भरा हुआ होता हैं वह नुपंसक है।
*नपुंसकवेद* नुपंसकवेद नोकषाय के उदय से होनी वाली अवस्था विशेष के नपुंसक वेद कहते है।
*अवस्था विशेष* स्त्री-पुरुष की तरफ आकर्षण होना, रमण करने की इच्छा होना नपुंसक वेद है।

*✍️२४ स्थान नपुंसकवेद में*
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*०१) गति      ०३/०४*  मनुष्य, तिर्यंच, नारकगति
*०२) इन्द्रिय    ०५/०५*   ए. द्वी. त्री. चतु. पंचे.
*०३) काय       ०६/०६*  छहो काय 
*०४) योग       १३/१५*   आहारकद्विक नही होता
*०५) वेद         ०१/०३*  स्वकीय (नपुंसकवेद)
*०६) कषाय      २३/२५*  
(स्त्रीवेद और पुरुष वेद नोकषाय को छोडकर)
*०७) ज्ञान         ०६/०८*  
कुमति, कुश्रुत, कुअवधि, मति, श्रुत, अवधिज्ञान
*०८) संयम       ०४/०७*  
असंयम, संयमासंयम, सामायिक, क्षेदोपस्थापना
*०९) दर्शन       ०३/०४*  चक्षु,अचक्षु,अवधिदर्शन
*१०) लेश्या       ०६/०६*  सभी लेश्या 
कृष्ण, नील, कापोत, पीत, पदम और शुक्ल लेश्या।
*११) भव्यक्त्व   ०२/०२*  भव्य और अभव्य।
*१२) सम्यक्त्व   ०६/०६*  सभी
मिथ्यात्व,सासादन,मिश्र,उपशम,क्षयोपशम, क्षायिक
(क्षायिक का कारण है यहा भावनपुंसक को लिया)
*१३) संज्ञी         ०२/०२*  संज्ञी और असंज्ञी।
*१४) आहार      ०२/०२*  आहारक ,अनाहारक
*१५) गुणस्थान   ०९/१४*  ०१ से ०९ तक
*१६) जीवसमास  १९/१९*  
*१७) पर्याप्ति    ०६/०६*  
आहार, शरीर, इन्द्रिय,श्वासोच्छ, भाषा,मन:पर्याप्ति
*१८) प्राण         १०/१०*  सभी प्राण
*इन्द्रिय ०५* स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और कर्ण
*बल ०३* कायबल, वचन बल और मनोबल प्राण
आयु प्राण और श्वासोच्छवास प्राण
*१९) संज्ञा         ०४/०४*  सभी संज्ञा
आहार संज्ञा, भय संज्ञा, मैथुन संज्ञा, परिग्रह संज्ञा।
*२०) उपयोग     ०९/१२*  
मनःपर्यय, केवलदर्शन, केवलज्ञानोपयोग नही होता
*२१) ध्यान         १३/१६*  
*आर्त* इष्टवियोगज,अनिष्टसंयोगज,वेदना,निदान
*रौद* हिंसानन्दी,मृषानन्दी,चौर्यानन्दी,परिग्रहानन्दी
*धर्म* आज्ञाविचय,अपायविचय, विपाकविचय, संस्थानविचय  *शुक्लध्यान* पृथक्त्ववितर्क वीचार 
*२२) आस्रव       ५३/५७*  
*मिथ्यात्व०५* विपरीत,एकान्त,विनय,संशय,अज्ञान
*अविरति १२* ०५ इन्द्रिय और मन को वश में करने तथा षट्काय के जीवों की रक्षा नहीं करना
*कषाय २३* १६ अनन्तानुबन्धी आदि ०७नोकषाय
*योग १३* मनोयोग०४, वचनयोग०४, काययोग ०५ 
*२३) जाति   ८० लाख/८४ लाख*  
*(देवो की ०४ लाख जाति नही होती है)*
*२४) कुल–१७३-१/२ ला.क. /१९९.५ ला. क.*  
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*प्रश्न २३) नपुंसक वेद किसके सामान है ?*
उत्तर- नपुंसकवेद की प्रकृति ईट के भटटे की अग्नि के समान बहुत तेज व कालुषितचित्त वाली होती है। इनकी कमाग्नि बहुत समय तक बनी रहती है। जो कि एक बार गर्म होने के बाद इनका ताप बुझता नही है।    *(गो.जी. २७५)*
ईटों के आवे के समान जब किसी प्राणी में काम उपभोग सम्बन्धी भयंकर विकलता होती तथा अत्यन्त निन्दनीय कुरूपपना होता है वही नपुंसक वेद का परिपाक है । *(वारंग चारित्र ०४/९१)*

*प्रश्न २४) किन-किन जीवों के नपुंसक वेद ही होता है?*
उत्तर - वे जीव जिनके नपुंसक वेद ही होता है,वे हैं *०१)* सातों पृथिवियों के नारकी जीव 
*०२)* एकेन्द्रिय तथा विकलत्रय जीव 
*०३)* सम्मूर्च्छन संज्ञी पंचेन्द्रिय जीव 
*०४)* सम्पूर्च्छन असंज्ञी पंचेन्द्रिय जीव 

*प्रश्न २५)कहाँ-कहाँ पर नपुंसक वेद नहीं होता है?*
उत्तर - वे स्थान जहाँ नपुंसक वेद नहीं होता-
*०१)* देवगति में सभी देव-देवांगनाओं में
*०२)* भोगभूमि तथा कुभोग भूमि में 
*०३)* परिहारविशुद्धि संयमी के 
*०४)* आहारक तथा आहारकमिश्र काययोग में
*०५)* मन:पर्यय ज्ञानी जीवों के 
*०६)* किसी भी ऋद्धिधारी मुनिराज के 
*०७)* उसी भव में तीर्थंकर होने वाले जीवों के 
*०८)* सभी म्लेच्छों के नपुंसक वेद नहीं होता है।
*०९)* ६३ शलाका पुरुषों के नपुंसक वेद नहीं होता 
भवनवासी, व्यतर, ज्योतिषी, कल्पवासी देव, तीस भोगभूमियों में उत्पन्न तिर्यंच, मनुष्य, भोगभूमि के प्रतिभाग में उत्पन्न असख्यात वर्ष की आयु वाले (कुभोग भूमिया) तथा सर्व मलेच्छ खण्डों में उत्पन्न होने वाले मनुष्य-तिर्यंच नपुंसकवेद वाले नहीं होते है।   *(आ. समु. ३४)*

प्रश्न २६)  विग्रहगति में शरीर नहीं होता अत: वहाँ स्त्री, पुरुष तथा नपुंसक वेद कैसे हो सकता है?*
उत्तर - यद्यपि अनाहारक अवस्था में शरीर नहीं होता है फिर भी वहाँ उनके भाववेद का अभाव नहीं होता है क्योंकि भाववेद वेदकषाय के उदय से होता है। विग्रहगति में भी वेद का उदय रहता है इसलिए वहाँ भी तीनों वेदों का सद्‌भाव कहा गया है।

*प्रश्न २७) नपुंसक वेद वाले के कम-से-कम कितने प्राण होते हैं?*
उत्तर - नपुंसकवेद वाले के कम-से-कम ०३ प्राण होते हैं - स्पर्शन इन्द्रिय, कायबल और आयु प्राण
ये एकेन्द्रिय जीवों की निर्वृत्यपर्याप्त अवस्था में या लब्ध्यपर्यातक अवस्था मे होते है।

*प्रश्न २८)  नपुंसक वेद में कितने शुक्लध्यान हो सकते हैं?*
उत्तर - नपुंसक वेद में पहला पृथक्त्ववितर्क वीचार  शुक्लध्यान हो सकता है। यह ध्यान ०८, ०९ वे गुणस्थान की अपेक्षा कहा गया है। 
जो आचार्य दसवें गुणस्थान तक धर्मध्यान मानते हैं उनकी अपेक्षा नपुंसकवेद में एक भी शुक्लध्यान नहीं हो सकता है। इसी प्रकार स्त्रीवेद और पुरुषवेद में भी जानना चाहिए। 

*प्रश्न २९) तीनों वेदों में मनुष्य-तिर्यंच आदि की पूरी पूरी जातियाँ ग्रहण की गई हैं तो क्या सभी तिर्यंच, मनुष्य, स्त्रीवेद, पुरुषवेद या नपुंसक वेद वाले होते हैं अथवा हो सकते हैं?*
उत्तर - नहीं, सभी मनुष्य-तिर्यंच स्त्री, पुरुष, नपुसक वेद वाले नहीं होते तथा न हो ही सकते हैं लेकिन प्रत्येक जाति में तीनों वेद वाले जीव उत्पन्न होते हैं, हो सकते हैं। 
जैसे-पर्याप्त मनुष्य उनतीस (२९) अंक प्रमाण होते हैं और मनुष्यों की जातियाँ मात्र १४ लाख बताई गई हैं। एक-एक जाति में करोड़ों-करोड़ों मनुष्य उत्पन्न हो सकते हैं, उन करोड़ों मनुष्यों में कोई स्त्रीवेद वाला, कोई पुरुष वेद वाला तो कोई नपुंसक वेद वाला हो सकता है। सम्भवत: इसीलिए तीनों वेदों में पूरी-पूरी जातियों का ग्रहण किया गया है। 
*नोट* इसी प्रकार कुलों में भी जानना चाहिए । 
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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026

30. चौबीस ठाण मे पुरुषवेद मार्गणा

30. चौबीस ठाण मे पुरुषवेद मार्गणा*

*✍️ पुरुषवेद मे २४ स्थान*
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*०१) गति       ०३/०४*   देव, मनुष्य, तिर्यंचगति, 
*०२) इन्द्रिय    ०१/०५*   पंचेन्द्रिय 
*०३) काय       ०१/०६*  त्रसकाय 
*०४) योग       १५/१५*   सभी
*०५) वेद         ०१/०३*  स्वकीय (पुरुषवेद)
*०६) कषाय      २३/२५*  
(स्त्रीवेद और नपुंसक वेद नोकषाय को छोडकर)
*०७) ज्ञान         ०७/०८*  
केवलज्ञान अपगतवेदी के होता है
*०८) संयम       ०५/०७*  
सुक्ष्मसंपराय, यथाख्यात संयम अपगत वेदी के है
*०९) दर्शन       ०३/०४*  चक्षु,अचक्षु,अवधिदर्शन
*१०) लेश्या       ०६/०६*  सभी लेश्या 
कृष्ण, नील, कापोत, पीत, पदम और शुक्ल लेश्या।
*११) भव्यक्त्व   ०२/०२*  भव्य और अभव्य।
*१२) सम्यक्त्व   ०६/०६*  सभी
मिथ्यात्व,सासादन,मिश्र,उपशम,क्षयोपशम, क्षायिक
*१३) संज्ञी         ०२/०२*  संज्ञी और असंज्ञी।
*१४) आहार      ०२/०२*  आहारक ,अनाहारक
*१५) गुणस्थान   ०९/१४*  ०१ से ०९ तक
*१६) जीवसमास  ०२/१९*  असंज्ञी-संज्ञी पंचेन्द्रिय
*१७) पर्याप्ति    ०६/०६*  
आहार, शरीर, इन्द्रिय,श्वासोच्छ, भाषा,मन:पर्याप्ति
*१८) प्राण         १०/१०*  सभी प्राण
*इन्द्रिय ०५* स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और कर्ण
*बल ०३* कायबल, वचन बल और मनोबल प्राण
आयु प्राण और श्वासोच्छवास प्राण
*१९) संज्ञा         ०४/०४*  सभी संज्ञा
आहार संज्ञा, भय संज्ञा, मैथुन संज्ञा, परिग्रह संज्ञा।
*२०) उपयोग      १०/१२*  
केवलदर्शन और केवलज्ञानोपयोग नही होता
*२१) ध्यान         १३/१६*  
*आर्त* इष्टवियोगज,अनिष्टसंयोगज,वेदना,निदान
*रौद* हिंसानन्दी,मृषानन्दी,चौर्यानन्दी,परिग्रहानन्दी
*धर्म* आज्ञाविचय,अपायविचय, विपाकविचय, संस्थानविचय   *शुक्ल* पृथक्त्ववितर्क वीचार 
*२२) आस्रव       ५५/५७*  
*मिथ्यात्व०५* विपरीत,एकान्त,विनय,संशय,अज्ञान
*अविरति १२* ०५ इन्द्रिय और मन को वश में नही करने तथा षट्काय के जीवों की रक्षा नहीं करना
*कषाय २३* १६ अनन्तानुबन्धी आदि ०७ नोकषाय
*योग १५* मनोयोग०४, वचनयोग०४, काययोग ०७ 
*२३) जाति   २२ लाख/८४ लाख*  
तिर्यंच ०४ लाख, मनुष्य १४ लाख, देव ०४ लाख
*२४) कुल–८३-१/२ ला.क. /१९९.५ ला क*  
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*प्रश्न १६) पुरुषवेद में जीव की स्थिति कैसी होती है?*
उत्तर - पुरुषवेद युक्त प्राणी स्त्री को देखते ही वैसे ही पिघल जाता है जैसे-जमे हुए घी का घड़ा अग्नि के स्पर्श होते ही क्षणभर में पानी-पानी हो जाता है । *(वारांग चारित्र ०४/९०)* अग्नि=स्त्री, घी=पुरुष
पुरुषवेद तृण की अग्रि के समान कहा गया है ।

*प्रश्न १७) क्या ऐसे कोई पंचेन्द्रिय जीव हैं जिनके पुरुषवेद नहीं होता है?*
उत्तर - हाँ है, ऐसे भी पंचेन्द्रिय जीव हैं जिनके पुरुषवेद नहीं होता है। 
सभी नारकी, नौवें गुणस्थान के अवेद भाग से आगे विराजमान सभी जीव, सम्मूर्च्छन जन्म वाले पंचेन्द्रिय जीव, स्त्री तथा नपुंसक वेद वाले जीवों के भी पुरुष वेद नहीं होता है।

*प्रश्न १८) ऐसे कौन से असैनी पंचेन्द्रिय जीव हैं जिनके पुरुषवेद भी होता है?*
उत्तर - जो जीव गर्भ से उत्पन्न होने पर भी मन से रहित हैं उन तोता मैना आदि तिर्यंचगति के पंचेन्द्रिय जीवों के पुरुषवेद भी यानि तीनों वेद हो होते हैं।

*प्रश्न १९) पुरुषवेदी के कौन-कौनसे संयम नहीं हो सकते है?*
उत्तर - पुरुषवेदी के दो संयम नहीं हो सकते हैं- सूक्ष्म साम्पराय और यथाख्यात संयम। 
क्योंकि ये दोनों संयम अवेदी जीवों के होते हैं।

*प्रश्न २०) पुरुषवेद तो भगवान के भी दिखता है तो उनके चारों शुक्ल ध्यान क्यों नहीं कहे?*
उत्तर- यद्यपि द्रव्य पुरुषवेद भगवान के भी दिखता है लेकिन उनके भाववेद नहीं होता है क्योंकि भाववेद का कारण मोहनीय कर्म (वेद कषाय) का उदय कहा है। भगवान के वेद कषाय का उदय नहीं पाया जाता है। यहाँ सभी कथन भाववेद की अपेक्षा किया गया है इसलिए पुरुषवेद वालों के चारों शुक्ल ध्यान नहीं होते हैं। नवमें गुणस्थान तक वेद है वहाँ एक ही शक्ल ध्यान होता है।

*प्रश्न २१) पुरुषवेद वालों के कम- से-कम कितने प्राण होते हैं?*
उत्तर - पुरुषवेद वालों के कम-से-कम सात प्राण होते हैं। ये सभी सैनी या असैनी पंचेन्द्रिय जीवों की निर्वृत्यपर्याप्तक अवस्था में ०५ इन्द्रिय, ०१ कायबल तथा आयु प्राण। 
आहारकमिश्र अवस्था में भी ये सात प्राण होते हैं।

*प्रश्न २२) पुरुषवेदी के कम-से- कम कितने आस्रव के प्रत्यय होते हैं?*
उत्तर - पुरुषवेदी के कम-से-कम आस्रव के चौदह प्रत्यय होते हैं –
*कषाय ०४)* – संज्वलन क्रोध, मान, माया, लोभ
*योग ०९)* – मनोयोग ०४, वचनयोग०४, औदारिक काययोग      *वेद ०१)* – पुरुषवेद 
ये आस्रव के प्रत्यय नौवे गुणस्थान में सवेद भाग तक होते हैं। 
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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*

गुरुवार, 29 जनवरी 2026

29. वेद मार्गणा, २४ ठाणा मे स्त्रीवेद

29.  वेद मार्गणा, २४ ठाणा मे स्त्रीवेद
https://youtu.be/QLdDpzJZhAQ?si=dlYMNVHTSb_a-OwZ
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*प्रश्न ०१) वेद मार्गणा किसे कहते हैं?*
उत्तर- वेद कर्म के उदय से होने वाले भाव को वेद कहते हैं। *(धवला ०१/१४१)*
आत्मा की चैतन्य रूप पर्याय में मैथुनरूप चित्त विक्षेप के उत्पन्न होने को वेद कहते है। 
*(गो. जी.२७२)* 
वेदों में जीवों की खोज करने को वेदमार्गणा कहते हैं 
◆ वेद चारित्र मोहनीय कर्म का भेद है और लिंग शरीर नाम कर्म के उदय से होने वाली शारीरीक रचना है, शरीर के चिन्ह विशेष है पूरी तरह पुदग्लमय है। 
वेद जीव के भाव रुप है इसलिए इसे चेतनमय भी कहते है क्योकी वेद रुप भाव जीव के ही होते है।

*प्रश्न ०२) वेदमार्गणा कितने प्रकार की है?*
उत्तर- वेद मार्गणा तीन प्रकार की है- स्त्रीवेद, पुरुषवेद, नपुंसकवेद। *(बृ द्र संग्रह १३ टीका)*
वेद मार्गणा के अनुवाद से स्त्रीवेद, पुरुषवेद, नपुंसकवेद तथा अपगतवेद वाले जीव होते *(धवला ०१/३४०)*
अथवा – वेद दो प्रकार के हैं- द्रव्य वेद, भाव वेद ।

*प्रश्न ०३) स्वीवेद किसे कहते हैं?*
उत्तर- जिसके उदय से जीव पुरुष में अभिलाषा रूप मैथुन सज्ञा से आक्रान्त होता है वह स्त्रीवेद है।
जिसके उदय से पुरुष के साथ रमने के भाव हों वह स्त्रीवेद है।   *(गो. जी. २७१)*

*प्रश्न ०४) पुरुषवेद किसे कहते हैं?*
उत्तर - जिसके उदय से जीव स्त्री में अभिलाषा रूप मैथुन सज्ञा से आक्रान्त होता है वह पुरुषवेद हे। जिसके उदय से स्त्री के साथ रमने के भाव हों वह पुरुषवेद है। *(गो. जी. २७१)*

*प्रश्न ०५) नपुंसकवेद किसे कहते हैं?*
उत्तर - जिसके उदय से जीव के स्त्री और पुरुष की अभिलाषा रूप तीव्र कामवेदना उत्पन्न होती है वह नपुंसकवेद है। 
जिसके उदय से स्त्री तथा पुरुष दोनों के साथ रमने के भाव हों वह नपुसक वेद है। *(गो. जी. २७१)*

*प्रश्न ०६) द्रव्यवेद किसे कहते हैं?*
उत्तर- जो योनि, मेहन आदि नामकर्म के उदय से रचा जाता है वह द्रव्यवेद है। *(सर्वा ०२/५२)*

*प्रश्न ०७) भाववेद किसे कहते ई?*
उत्तर - भाव लिंग आत्मपरिणाम स्वरूप है। वह स्त्री पुरुष, नपुंसक इन तीनों में एक-दूसरे की अभिलाषा लक्षण वाला है और वह चारित्रमोह के विकल्परूप स्त्री, पुरुष तथा नपुंसक वेद नामके नोकषाय के उदय से होता है। *(रा.वा. ०२/०६)*

*प्रश्न ०८) वेद मार्गणा में किस वेद को ग्रहण करना चाहिए?*
उत्तर- वेद मार्गणा में भाववेद को ग्रहण करना चाहिए क्योंकि यदि यहाँ द्रव्यवेद से प्रयोजन होता तो मनुष्य स्त्रियों के अपगतवेद स्थान नहीं बन सकता, क्योंकि द्रव्यवेद चौदहवें गुणस्थान् के अन्त तक पाया जाता है। परन्तु अपगतवेद भी होता है। इस प्रकार वचन निर्देश नौवें गुणस्थान के अवेद भाग से किया गया है। 
*(जिससे प्रतीत होता है कि यहाँ भाववेद से प्रयोजन है, द्रव्यवेद से नहीं)  (धवला ०२/५१३)*
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*✍️ स्त्रीवेद मे २४ स्थान*

*०१) गति       ०३/०४*   देव, मनुष्य, तिर्यंचगति, 
*०२) इन्द्रिय    ०१/०५*   पंचेन्द्रिय 
*०३) काय       ०१/०६*  त्रसकाय 
*०४) योग       १३/१५* (आहारकद्विक नही होता)
*०५) वेद           ०१/०३*  स्वकीय (स्त्रीवेद)
*०६) कषाय      २३/२५*  
*(पुरुषवेद, नपुंसक वेद नोकषाय को छोडकर)*
*०७) ज्ञान         ०६/०८*  
*कुज्ञान ०३* कुमतिज्ञान, कुश्रुतज्ञान, कुअवधिज्ञान
*सुज्ञान ०३* मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, 
*(मनःपर्यय तथा केवलज्ञान नहीं होता है)*
*०८) संयम       ०४/०७*  
असंयम, संयमासंयम, सामायिक, छेदोपस्थापना
*०९) दर्शन       ०३/०४*  चक्षु,अचक्षु,अवधिदर्शन
*१०) लेश्या       ०६/०६*  सभी लेश्या 
कृष्ण, नील, कापोत, पीत, पदम और शुक्ल लेश्या।
*११) भव्यक्त्व   ०२/०२*   भव्य और अभव्य।
*१२) सम्यक्त्व   ०६/०६*  
मिथ्यात्व,सासादन,मिश्र,उपशम,क्षयोपशम, क्षायिक
(क्षायिक लेने का कारण है यहा भाव स्त्री को लिया)
*१३) संज्ञी         ०२/०२*  संज्ञी और असंज्ञी।
*१४) आहारक   ०२/०२*  आहारक, अनाहारक
*१५) गुणस्थान   ०९/१४*  ०१ से ०९ तक
*१६) जीवसमास  ०२/१९*  असंज्ञी-संज्ञी पंचेन्द्रिय
*१७) पर्याप्ति    ०६/०६*  
आहार, शरीर, इन्द्रिय,श्वासोच्छ, भाषा,मन:पर्याप्ति
*१८) प्राण         १०/१०*  सभी प्राण
*इन्द्रिय ०५* स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और कर्ण
*बल ०३* कायबल, वचन बल और मनोबल प्राण
आयु प्राण और श्वासोच्छवास प्राण
*१९) संज्ञा         ०४/०४*  सभी संज्ञा
आहार संज्ञा, भय संज्ञा, मैथुन संज्ञा, परिग्रह संज्ञा।
*२०) उपयोग      ०९/१२*  
*ज्ञानोपयोग ०६* मति, श्रुत, अवधि, कुमति, कुश्रुत, कुअवधिज्ञानोपयोग
*दर्शनोपयोग ०३* चक्षु, अचक्षु, अवधिदर्शनोपयोग
*२१) ध्यान         १३/१६*  
*आर्त* इष्टवियोगज,अनिष्टसंयोगज,वेदना,निदान
*रौद* हिंसानन्दी,मृषानन्दी,चौर्यानन्दी,परिग्रहानन्दी
*धर्म* आज्ञाविचय,अपायविचय, विपाकविचय, संस्थानविचय     *शुक्ल* पृथक्त्ववितर्क वीचार 
*२२) आस्रव       ५३/५७*  
*मिथ्यात्व०५* विपरीत,एकान्त,विनय,संशय,अज्ञान
*अविरति १२* ०५ इन्द्रिय और मन को वश में नही करने तथा षट्काय के जीवों की रक्षा नहीं करना
*कषाय २३* १६ अनन्तानुबन्धी आदि ०७नोकषाय
*योग १३* मनोयोग०४, वचनयोग०४, काययोग ०५ 
*२३) जाति   २२ लाख/८४ लाख*  
तिर्यंच ०४ लाख, मनुष्य १४ लाख, देव ०४ लाख
*२४) कुल–८३-१/२ ला.क. /१९९.५ ला क*  
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*प्रश्न ०९) स्त्रीवेद किसके समान होता है?*
उत्तर - स्त्रीवेद के उदय में जीव पुरुष को देखते ही उसी प्रकार द्रवित हो उठता है जिस प्रकार आग को छूते ही लाख पिघल जाती है। *(व.चा. ४/८९)*
स्त्रीवेद कण्डे की अग्रि के समान माना गया है।
यह वेद स्त्री और पुरुष दोनो के हो सकता है।

*प्रश्न १०) स्त्रीवेदी जीव कहाँ-कहाँ पाये जाते हैं?*
उत्तर - मनुष्यगति, तिर्यंचगति तथा देवों में सोलहवें स्वर्ग तक स्त्रीवेदी जीव पाये जाते हैं। 
लेकिन सम्मूर्च्छन, लब्ध्यपर्यातक मनुष्य-तिर्यंचो में स्त्रियाँ नहीं होती हैं क्योंकि सम्मूर्च्छन जीव नपुंसक वेद वाले ही होते हैं ।

*प्रश्न ११) स्त्रीवेदी के आहारकद्विक काययोग क्यों नहीं होते हैं?*
उत्तर - अप्रशस्त वेदों के साथ आहारक ऋद्धि उत्पन्न नहीं होती है।  *(धवला २/६६७)*
अप्रशस्त वेदों यानि स्त्रीवेद और नपुंसक वेद

*प्रश्न १२) क्या स्त्रीवेदी की निर्वृत्यपर्याप्तक अवस्था में भी अवधिदर्शन हो सकता है?*
उत्तर - नहीं, क्योंकि सम्यग्दृष्टि जीव स्त्रीवेदी में उत्पन्न नहीं होता है। ना द्रव्यवेद मे ना भाववेद मे।
अवधिदर्शन सम्यग्दृष्टि तथा सम्यग्मिथ्यादृष्टि के होता है। तीसरे गुणस्थान वाले का मरण नहीं होता, इसलिए स्त्रीवेदी के निर्वृत्यपर्यातक अवस्था में अवधिदर्शन नहीं हो सकता। 
इसी प्रकार नपुंसक वेद में जानना चाहिए लेकिन नरक की अपेक्षा नपुंसकवेदी की निर्वृत्यपर्यातक अवस्था में भी अवधिदर्शन होता है।

*प्रश्न १३) स्त्रीवेद वाले के कौन-कौन से संयम नहीं हो सकते हैं?*
उत्तर - स्त्रीवेद वाले के तीन सयम नहीं हो सकते हैं- परिहारविशुद्धि, सूक्ष्म साम्पराय, यथाख्यात सयम।
परिहारविशुद्धि संयम पुरुषवेद वाले के ही होता है । सूक्ष्म साम्पराय तथा यथाख्यात संयम अवेदी जीवों के ही होते हैं, इसलिए स्त्रीवेद में ये तीनों संयम नहीं होते हैं। इसी प्रकार नपुंसक वेद में भी ये संयम नहीं हो सकते हैं ।

*प्रश्न १४) स्त्रीवेदी के निर्वृत्यपर्याप्तक अवस्था में कितने सम्यक्त्व हो सकते हैं?*
उत्तर - स्त्रीवेदी के निर्वृत्यपर्यातक अवस्था में दो सम्यक्त्व हो सकते हैं- मिथ्यात्व और सासादन।
स्त्रीवेद की पर्याप्त अवस्था में सभी सम्यक्त्व हों सकते हैं क्योंकि भावस्त्री वेदी मोक्ष जा सकते हैं।

*प्रश्न १५) स्त्रीवेद में कौन-कौन सी संज्ञाओं का अभाव हो सकता है?*
उत्तर - स्त्रीवेद में दो संज्ञाओं का अभाव हो सकता है- आहार संज्ञा तथा भय संज्ञा। 
आहार संज्ञा छठे गुणस्थान तक होती है सातवे गुणस्थान मे चली जाती है।
भय संज्ञा आठवे गुणस्थान तक होती है नौवे गुणस्थान  मे चली जाती है।

सातवे गुणस्थान मे वेद अतिमंद हो जाते है, छठे मे तो तीव्र भी हो सकते है।
भाववेद स्त्री हो द्रव्य से पुरुष हो ऐसे लोग मोक्ष जा सकते है, लेकिन जो तीर्थंकर होते है वे द्रव्य से भी और भाव से भी पुरुष वेद वाले होते है।
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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*

गुरुवार, 22 जनवरी 2026

28 अयोगी केवली

यह अयोग केवली गुणस्थान संसारी जीवो का सबसे अंतिम गुणस्थान है, इस गुणस्थान वाले जीवो को अयोग केवली जिन भी कहते है, इसके बाद मोक्ष प्राप्त होता है।*
*अयोग=योग रहित, केवली = केवल दर्शन ज्ञान सहित, जिन=घातिया कर्मो से रहित*
*०१)* जिनके योग विद्यमान नही है उन्हे अयोग कहते है, जिनके केवलज्ञान पाया जाता है उन्हे केवली कहते है।
*०२)* जिनके पुण्य और पाप को उत्पन्न करने वाले शुभ और अशुभ योग भी नही होते है अयोगी जिन कहलाते है।
*०३)* जो अट्टारह हजार (१८०००) शीलो के स्वामी है, सर्व आस्रव से रहित है, योग रहित है, केवलज्ञान सहित है वे अयोगी भगवान है।

*२४ स्थान मे अयोगी केवली*
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अयोगी केवली के २४ स्थानों में से १७ स्थान होते हैं

*०१) गति      ०१/०४*   मनुष्यगति
*०२) इन्द्रिय   ०१/०५*   पंचेन्द्रिय (द्रव्येन्द्रिय)
*०३) काय      ०१/०६*   त्रसकाय
*०४) योग       ००/१५*    ✖️
*०५) वेद        ००/०३*    ✖️ 
कोई वेद नही होता केवल पुरुष लिंग है। वेद नौवे गुणस्थान मे वेद समाप्त हो जाता है।
*०६) कषाय    ००/२५*    ✖️
*०७) ज्ञान       ०१/०८*   केवलज्ञान
*०८) संयम     ०१/०७*   यथाख्यात संयम
*०९) दर्शन       ०१/०४*   केवलदर्शन
*१०) लेश्या      ००/०६*   ✖️
*११) भव्यक्त्व  ०१/०२*  भव्य
*१२) सम्यक्त्व   ०१/०६*  क्षायिक सम्यक्त्व 
*१३) संज्ञी        ००/०२*  ✖️ (अनुसंज्ञी कहलाते)
*१४) आहारक   ०१/०२*  अनहारक (शरीर के योग्य कार्मण वर्गणा को भी ग्रहण नही करते)
*१५) गुणस्थान   ०१/१४*  अयोग केवली
*१६) जीवसमास  ०१/१९*  पंचेन्द्रिय 
संज्ञी असंज्ञी से रहित सामान्य पंचेन्द्रिय होगे
*१७) पर्याप्ति      ०६/०६*  छहो पर्याप्ति 
नया कुछ भी ग्रहण नही कर रहे है, लेकिन पुराना सभी वर्गणा है।
*१८) प्राण          ०१/१०*  आयु प्राण
*१९) संज्ञा          ००/०४*  ✖️
*२०) उपयोग      ०२/१२*  केवलदर्शन, केवलज्ञान
*२१) ध्यान         ०१/१६*  व्युपरतक्रियानिवृति
*२२) आस्रव       ००/५७*  ✖️
*२३) जाति   १४ लाख/८४ लाख* 
*२४) कुल      १४ ला.क./१९९.५ लाख़ करोड*
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◆ अयोग केवली अवस्था मे २४ स्थानो मे से १७ स्थान ही होते है।

*विशेषताएँ*
*०१)* यहाँ पूर्ण संवर तथा उत्कृष्ट निर्जरा होती है।
*०२)* इस गुणस्थान में ८५ प्रकृतियो की सत्ता है, इतनी प्रकृतियो का क्षय तो १३ वे गुणस्थान तक मे भी नही होता जितना की १४ वे मे क्षय होता है। जिसमे से उपान्त्य (अंतिम समय से पहले) मे ७२ कर्म प्रकृतियो का क्षय होता है तथा अंतिम समय मे बाकी १३ प्रकृतियो का क्षय होता है, तथा सभी कर्मो का क्षय होने से कर्ममल से रहित होकर शुद्धात्म अवस्था को प्राप्त हो जाते है।
*०३)* अयोगी जिन १८ हजार शीलों के भेदो के स्वामी बन जाते है, तथा ८४ लाख उत्तर गुणो के धारक हो जाते है।
*०४)* चौदहवे गुणस्थान के प्रथम समय से ही आत्मा के सम्पूर्ण प्रदेश अकम्प स्थिर होकर शरीर से किंचित न्यून होकर शरीर आकार वाले हो जाते है, अर्थात हलन चलन बंद हो जाता है, निष्कम्प हो गये
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*सत* इस गुणस्थान मे जीव पाये जाते है
*संख्या* इस गुणस्थान मे होने वाले जीवो की संख्या कम से कम एक या दो, तथा अधिक से अधिक १०८ जीव हो सकते है।
*क्षेत्र* लोक का असंख्यात भाग ढाई द्वीप के अन्दर ही रहते है।
*भाव* मूल मे तीन भाव *(क्षायिक, औदयिक, पारिणामिक भाव)* होते है।
विस्तार से ५३ भावो मे से १३ भाव–
क्षायिक के नौ भेद, औदयिक के दो भेद (मनुष्य गति व असिद्धत्व), पारिणामिक के दो भेद (जीवत्व, भव्यत्व)
*🌴काल* इस गुणस्थान का काल अंतरमुहूर्त यानि पाँच हस्व स्वर *(अ, ई, उ, ऋ, लृ)* के उच्चारण मे जितना काल लगता है वह है।
*🌴बंध प्रत्यय* यहा आस्रव और बंध के कारणो का अभाव होने से आस्रव व बंध का पूर्णता आभाव है, यहा कषाय भी नही, योग भी नही है केवल संवर और निर्जरा होती है फिर मोक्ष हो जाता है।
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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*

गुरुवार, 15 जनवरी 2026

27. योग मार्गणा (समुच्चय प्रश्न)

*प्रश्न १००) किन-किन योग मे सभी संयम होते है।*
उत्तर - नौ योग मे सभी संयम हो सकते है –
मनोयोग ०४, वचनयोग ०४, औदारिक काययोग
*◆ मनोयोग* के चारो भेदो मे भी सातो संयम होते है। ०१ से ०४ गुणस्थान मे असंयम होगा, ०५ वे गुणस्थान वालो के देश संयम होगा, ०६ से १२ गुणस्थान वालो के सामायिक, छेदोपस्थापना, परिहार विशुद्धि, सुक्ष्म सांपराय और यथाख्यात संयम होगे तथा १३ वे गुणस्थान मे की मनोयोग के दो भेद सत्य और अनुभय होते है।
*◆ वचनयोग* के चारो भेदो मे भी सातो संयम है। 
जैसे मनोयोग मे सातो संयम है उसी प्रकार वचन योग मे भी सातो संयम है।
*◆ काययोग* औदारिक काययोग मे भी सातो संयम होते है।
वैक्रियिकद्विक काययोग मे केवल असंयम ही होता है देव हो या नारकी
आहारकद्विक काययोग मे केवल दो संयम है सामायिक और छेदोपस्थापना संयम
कार्मण काययोग मे दो संयम –असंयम और यथाख्यात संयम होते है।
औदारिक मिश्र मे दो संयम – असंयम ०१ से ०४ गुणस्थान अपेक्षा, केवली समुद्धात अपेक्षा यथाख्यात संयम
औदारिक काययोग मे भी सातो संयम होते है।
०१ से ०४ गुणस्थान तक असंयम, ०५ वे गुणस्थान मे संयमासंयम, ०६ से १३ गुणस्थान तक बाकी संयम होते है।

*प्रश्न १०१) किन किन योगो मे यथाख्यात संयम नही हो सकता है?*
उत्तर - चार योगो मे यथाख्यात संयम नही हो सकता है–
आहारक काययोग, आहारक मिश्र काययोग, 
वैक्रियक काययोग, वैक्रियक मिश्न काययोग

*प्रश्न १०२) किस योग ने दो-दो संयम होते है?*
उत्तर - चार योग मे दो-दो संयम होते है –
आहारक और आहारक मिश्र – सामायिक और छेदोपस्थाना संयम
औदारिक मिश्र मे –असंयम और यथाख्यात संयम
कार्मण काययोग – असंयम और यथाख्यात संयम

*प्रश्न १०३) किस-किस योग मे शुभ लेश्या ही होती है?*
उत्तर - दो योग- आहारक और आहारक मिश्र मे शुभ लेश्या ही होती है।

*प्रश्न १०४) किन-किन योगों में सैनी जीव ही होते हैं*
उत्तर- ११ योगों में सैनी जीव ही होते हैं- 
मनोयोग ०४, वचनयोग ०३, काय ०४ योग मे
◆ मन के चारो योग मे सैनी जीव ही होते हैं।
◆ वचन के चार मे से अनुभयवचनयोग बिना तीन मे सैनी जीव ही होते हैं।
◆ काय के सात मे से वैक्रियकद्विक, आहारकद्विक मे सैनी जीव ही होते हैं।
औदारिकद्विक और कार्मण काययोग मे सैनी और असैनी दोनो प्रकार के जीव हो सकते है। 

*प्रश्न १०५) ऐसे कितने योग है जो मात्र असैनी के ही होते है।*
उत्तर - ऐसा कोई भी योग नही है जो मात्र असैनी का ही हो।

*प्रश्न १०६) किस-किस योग मे मात्र चार ही गुणस्थान होते है?*
उत्तर - तीन योगों में ०४ ही गुणस्थान होते हैं –
औदारिकमिश्र काययोग – ०१, ०२, ०४, १३
कार्मण काययोग – ०१, ०२, ०४, १३
वैक्रियक काययोग – ०१, ०२, ०३, ०४
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औदारिक काययोग मे ०१- १३ तक गुणस्थान 
वैक्रियकमिश्र काययोग – ०१, ०२, ०४ गुणस्थान
आहारकद्विक काययोग – ०६ गुणस्थान

*प्रश्न १०७) किस- किस योग में १३ गुणस्थान होते हैं?*
उत्तर- पाँच योगों में १३ गुणस्थान होते हैं- 
मनोयोग ०२- सत्यमन, अनुभयमन मे ०१- १३
वचनयोग ०२ - सत्यवचन, अनुभयवचन मे ०१- १३
औदारिक काययोग मे ०१- १३ तक गुणस्थान है
 
*प्रश्न १०८) कितने योगों में सभी जीवसमास होते हैं?*
उत्तर - तीन योगों में सभी जीवसमास होते है।
●औदारिक काययोग मे सभी जीवसमास होते है। यह एकेन्द्रिय से १३ वे गुणस्थान है- १९ जीवसमास
●औदारिकमिश्र काययोग मे भी एकेन्द्रिय से संज्ञी पंचेन्द्रिय जीव है, सभी १९ जीवसमास होते है।
●कार्मणकाययोग मे भी एकेन्द्रिय से संज्ञी पंचेन्द्रिय जीव है, सभी १९ जीवसमास होते है।

*प्रश्न १०९) ऐसे कौनसे योग हैं जिनमें श्वासोच्छास प्राण नहीं पाया जाता है?*
उत्तर - चार योगों औदारिकमिश्र, वैक्रियिकमिश्र,  आहारक मिश्र, कार्मण काययोग में श्वासोच्चवास प्राण नहीं पाया जाता है।

*प्रश्न ११०) ऐसे कौन-कौन से योग हैं जिनमें संज्ञाओं का अभाव भी हो सकता है?*
उत्तर - ११ योग मे संज्ञा का अभाव भी हो सकता है
मन ०४, वचन ०४, औदारिकद्विक काययोग, कार्मण काययोग मे संज्ञाओं का अभाव भी हो सकता है। 
कार्मण काययोग मे १३ वे गुणस्थान की अपेक्षा संज्ञाओं का अभाव भी हो सकता है। 

*प्रश्न १११) किस-किस योग में संज्ञातीत जीव नहीं होते हैं?*
उत्तर - चार योगों वैक्रियिकद्विक और आहारक द्विक में संज्ञातीत जीव नहीं होते हैं।
*वैक्रियिकद्विक* क्योंकि देव-नारकी चतुर्थ गुणस्थान से आगे नहीं जा सकते हैं। 
*आहारकद्विक* छठे गुणस्थान में ही होता है।

*प्रश्न ११२) कौन-कौन से योग में आस्रव के ४३ प्रत्यय होते हैं?*
उत्तर - आहारकद्विक काययोग को छोड्‌कर शेष १३ योगों में अर्थात् मन ०४, वचन ०४, औदारिकद्बिक, वैक्रियिकद्विक तथा कार्मण काययोग में आस्रव के ४३ प्रत्यय होते हैं। (मिथ्यात्व ०५,अविरति १२, कषाय २५, योग स्वकीय=४३)
●आहारकद्विक मे आस्रव के प्रत्यय– मिथ्यात्व ००,  अविरति १२, कषाय ११ (संज्वलन ०४, नोकषाय ०७), योग स्वकीय = २४ आस्रव प्रत्यय

*प्रश्न ११३) सबसे कम आस्रव के प्रत्यय किस योग में होते हैं?*
उत्तर - सबसे कम आस्रव के प्रत्यय आहारकद्बिक काययोग में होते हैं- इन में आस्रव के १२ प्रत्यय हैं। संज्वलन कषाय ०४, नोकषाय ०६ + पुरुषवेद तथा स्वकीय योग। 
आहारक काययोग में आहारक तथा आहारकमिश्र में आहारकमिश्र काययोग होता है ।
● जहाँ केवल औदारिक काययोग ही शेष रहता है ऐसे अरहन्त केवली भगवान के आस्रव का मात्र एक (औदारिक काययोग रूप) प्रत्यय शेष रहता है। 
इसी प्रकार औदारिक मिश्र तथा कार्मण काययोग में भी केवली भगवान के एक ही स्वकीय योग रूप आस्रव का प्रत्यय होता है।
● औदारिकमिश्न केवली भगवान के समुद्धात मे कपात-प्रतर-लोकपूरण अवस्था मे होता है। वहा एक ही योग होता है कार्मण काययोग
◆ केवली भगवान के आस्रव के अधिक से अधिक ०७ आस्रव के प्रत्यय होते है –
मन ०२ (सत्य, अनुभय), वचन ०२ (सत्य, अनुभय), औदारिकद्विक काययोग, कार्मण काययोग।
*(●केवली भगवान के सयोग केवली मे अधिक से अधिक ०७ आस्रव के प्रत्यय, और कम से कम ०१ आस्रव का प्रत्यय होता हैं)*
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*प्रश्न ५६१) किस-किस योग में किस अपेक्षा से नपुंसक वेद होता है?*
उत्तर- चार मनोयोगों एव तीन वचन योगों में (अनुभय वचन को छोडकर) इनमे पर्याप्त नारकी, पर्याप्त तिर्यंच तथा पर्याप्त मनुष्यों में नपुंसक वेद होता है।
◆ अनुभय वचन योग– पर्याप्त द्विन्द्रिय से लेकर पर्याप्त पंचेन्द्रिय तिर्यंच, पर्याप्त मनुष्य तथा पर्याप्त नारकियों के नपुंसक वेद होता है।
◆ औदारिक काययोग – पर्याप्त एकेन्द्रिय से लेकर नवम गुणस्थान के सवेद भाग तक नपुंसक वेद होता है।
◆ औदारिक मिश्र काययोग – निर्वृत्यपर्यातक तथा लब्ध्यपर्यातक मनुष्य-तिर्यंचों में नपुंसक वेद होता है।
◆ वैक्रियिक काययोग – पर्याप्त नारकियों के नपुंसक वेद होता है।
◆  वैक्रियिक मिश्रकाययोग – निर्वृत्यपर्यातक नारकियों के नपुंसक वेद होता है।
◆ कार्मण काययोग – अनाहारक नारकी, मनुष्य तथा तिर्यंचों के यानि जो विग्रहगति से जा रहे है उनमे भी नपुंसक वेद रह सकता है।

विशेष : आहारकद्विक काययोग में नपुंसक वेद नहीं होता है । 
औदारिक मिश्र काययोग, कार्मण काययोग तथा सत्य अनुभय मन वचन योग में केवली भगवान को ग्रहण नहीं करना चाहिए, क्योंकि वे वेदातीत होते हैं ।
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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*


39. कषाय मार्गणा - हास्यादि चार नोकषाय

*39. कषाय मार्गणा - हास्यादि चार नोकषाय* https://youtu.be/h980k6RrJXE?si=0-2dgRJDN2s4kySr 🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴 ✍️ हास्य, रति, अरति, शोक में 24...