*✍️ अनंतानुबंधी चतुष्क में २४ स्थान*
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*०१) गति ०४/०४*
*०२) इन्द्रिय ०५/०५*
*०३) काय ०६/०६*
*०४) योग १३/१५* (आहारकद्विक नही होता)
*०५) वेद ०३/०३*
*०६) कषाय १०/२५*
अनंतानुबंधी की स्वकीय कषाय तथा नौ नोकषाय
*०७) ज्ञान ०३/०८*
*कुज्ञान ०३* कुमतिज्ञान, कुश्रुतज्ञान, कुअवधिज्ञान
*०८) संयम ०१/०७* असंयम
*०९) दर्शन ०२/०४* चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन
अवधिदर्शन भी किन्ही किन्ही आचार्यो ने कहा है
*१०) लेश्या ०६/०६* सभी लेश्या
कृष्ण, नील, कापोत, पीत, पदम और शुक्ल लेश्या।
*११) भव्यक्त्व ०२/०२* भव्य और अभव्य।
*१२) सम्यक्त्व ०२/०६* मिथ्यात्व, सासादन
*१३) संज्ञी ०२/०२* संज्ञी और असंज्ञी।
*१४) आहारक ०२/०२* आहारक, अनाहारक
*१५) गुणस्थान ०१/१४* मिथ्यात्व, सासादन
*१६) जीवसमास १९/१९* सभी जीवसमास
*१७) पर्याप्ति ०६/०६* छहो पर्याप्तियाँ
आहार, शरीर, इन्द्रिय,श्वासोच्छ, भाषा,मन:पर्याप्ति
*१८) प्राण १०/१०* सभी प्राण
*इन्द्रिय ०५* स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और कर्ण
*बल ०३* कायबल, वचन बल और मनोबल प्राण
आयु प्राण और श्वासोच्छवास प्राण
*१९) संज्ञा ०४/०४* सभी संज्ञा
आहार संज्ञा, भय संज्ञा, मैथुन संज्ञा, परिग्रह संज्ञा।
*२०) उपयोग ०५/१२*
*ज्ञानोपयोग ०३* कुमति, कुश्रुत, कुअवधिज्ञानो
*दर्शनोपयोग ०२* चक्षु, अचक्षुदर्शनोपयोग
*२१) ध्यान ०८/१६*
*आर्त* इष्टवियोगज,अनिष्टसंयोगज,वेदना,निदान
*रौद* हिंसानन्दी,मृषानन्दी,चौर्यानन्दी,परिग्रहानन्दी
*२२) आस्रव ४०/५७*
*मिथ्यात्व०५* विपरीत,एकान्त,विनय,संशय,अज्ञान
*अविरति १२* ०५ इन्द्रिय और मन को वश में नही करने तथा षट्काय के जीवों की रक्षा नहीं करना
*कषाय १०* ०१ स्वकीय कषाय, ०९ नोकषाय
*योग १३* मनोयोग०४, वचनयोग०४, काययोग ०५
*२३) जाति ८४ लाख/८४ लाख* सभी जाति
*२४) कुल– १९९.५ ला. क./ १९९.५ ला. क.*
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*प्रश्न १३)अनन्तानुबन्धी कषाय किसे कहते हैं?*
उत्तर : अनन्त संसार का कारण होने से मिथ्यादर्शन को अनन्त कहते हैं। उस अनन्त को बांधने वाली कषाय अनन्तानुबन्धी कषाय कहलाती है।
*(राजवार्तिक ०५)*
जिन कषायों के द्वारा जीव में उत्पन्न हुए संस्कारों का अनन्त भवों में अवस्थान माना गया है वे अनन्तानुबंधी कषायें हैं।
जो क्रोध, मान, माया, लोभ सम्यग्दर्शन व सम्यक् चारित्र का विनाश करते हैं तथा जो अनन्त भव के अनुबन्धन स्वभाव वाले होते हैं वे अनन्तानुबन्धी कहलाते हैं। *(ध.१३/ ३६९)*
*प्रश्न १४) अनन्तानुबन्धी कषाय कितने प्रकार की होती है?*
उत्तर : अनन्तानुबन्धी कषाय चार प्रकार की होती है- (१) क्रोध (२) मान (३) माया (४) लोभ ।
*प्रश्न १५) अनन्तानुबन्धी क्रोधादि को किसकी उपमा दी गई है?*
उत्तर : अनन्तानुबन्धी क्रोध - पत्थर की रेखा अथवा नगराजि सदृश कहा गया है।
अनन्तानुबन्धी मान - पत्थर के स्तम्भ अथवा शैल स्तम्भ सदृश कहा गया है।
अनन्तानुबन्धी माया - बाँस सदृश अथवा बाँस वृक्ष की गठीली जड़ के सदृश कही
अनन्तानुबन्धी लोभ - किरमिच रंग अथवा कृमिराग सदृश कहा गया है। *(ज.ध. १५३-१५५ वां.चा.)*
*प्रश्न १६) पत्थर की रेखा सदृश क्रोध किसे कहते हैं ?*
उत्तर : इस क्रोध का संस्कार आत्मा पर इतना तीव्र पड़ता है कि उसकी उपमा पत्थर पर खोदी गई रेखा से दी जाती है। यही कारण है कि ये क्रोधादि जन्म जन्मान्तरों में भी जाकर शांत नहीं होती हैं और निमित्त सामने आते ही भड़क उठते हैं।
*(व.चा. ४/६६)*
जिस प्रकार पर्वतशिला किसी कारण से भेद को प्राप्त होकर पुनः किसी उपाय से नहीं जुड़ती, उसी प्रकार जो क्रोध किसी पुरुष विशेष में उत्पन्न होकर किसी दूसरे उपाय से उपशम को प्राप्त नहीं होता है, प्रतिकार रहित होकर उस भव में भी उसी प्रकार बना रहता है वही नगराजि (पत्थर की रेखा) सदृश क्रोध है। *(ज.ध.१२/१५३)*
*प्रश्न १७) शैल स्तम्भ के समान मान किसे कहते हैं?*
उत्तर : यह मान इतना तीव्र और विवेकहीन होता है कि शास्त्रकारों ने इसे पत्थर के स्तम्भ के समान माना है। इसीलिए अनन्तकाल बीत जाने पर भी उससे आक्रान्त जीव में तनिक भी मृदुता या विनम्रता नहीं आती है। *(व.चा. ४/७०)?
*प्रश्न १८) बाँस की जड़ के सदृश माया किसे कहते हैं?*
उत्तर : बाँस वृक्ष की जड़ की गाँठ नष्ट होकर तथा शीर्ण होकर भी सरल नहीं की जा सकती है, इसी प्रकार अतितीव्र वक्र भाव से परिणत माया परिणाम भी निरुपक्रम (किसी भी उपाय से हटने योग्य नहीं) होता है। *(जय धवला १२/१५५)*
◆ मायाचार करने वाले की चित्तवृत्ति बाँस की जड़ों के समान हो जाती है। इसी कारण उसके चाल चलन और तथा कुटिल हो जाते हैं और उनमें सीधापन नहीं आता है। *(व. चा. ४/७४)*
*प्रश्न १९) कृमिराग सदृश लोभ किसे कहते हैं?*
उत्तर : कृमिराग एक कीट विशेष होता है। वह नियम से जिस वर्ण के आहार को ग्रहण करता है उसी वर्ण के अतिचिक्कण डोरे को अपने मल त्यागने के द्वार से निकालता है। क्योंकि उसका वैसा ही स्वभाव है। उस सूत्र (धागे) द्वारा जुलाहे अति कीमती अनेक वर्ग वाले नाना वस्त्र बनाते हैं। उस के रंग को यद्यपि हजार कलशों की सतत धारा द्वारा प्रक्षालित किया जाता है, नाना प्रकार के सारयुक्त जलों द्वारा धोया जाता है तो भी उस रंग को थोड़ा भी दूर करना शक्य नहीं है क्योंकि वह अतिनिकाचित स्वरूप है, अग्नि में जलावे जाने पर दूर करना शक्य नही है क्याकि यह अतिनिकाचित स्वरूप है, अग्नि मे जलाये जाने पर भी भस्मपने को प्राप्त होते हुए उस कृमिराग से रंजित हुए वस्त्र का रंग कभी छूटने योग्य न होने से वैसा ही बना रहता है। इसी प्रकार जीव के हृदय में स्थित अतितीव्र लोभ परिणाम, जिसे कृश नहीं किया जा सकता, वह कृमिराग के रंग के सदृश कहा जाता है।
*(ज.ध. १२/१५६)*
*प्रश्न २०) जहाँ अनन्तानुबन्धी क्रोध होता है वहाँ चारों क्रोध होते हैं अतः यहाँ पर भी चारों क्रोधों को लेना चाहिए?*
उत्तर : जहाँ अनन्तानुबन्धी क्रोध होता है वहाँ अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्याख्यानावरण तथा संज्वलन क्रोध होता ही है फिर भी यहाँ पर अनन्तानुबन्धी क्रोध की विवक्षा होने से अन्य क्रोधो को गौण करके मात्र अनन्तानुबन्धी क्रोध को ही आस्रव के कारणों में ग्रहण किया है। इसी प्रकार मान आदि में भी जानना चाहिए।
अनन्तानुबन्धी चतुष्क में से भी एक समय में एक का ही उदय आता है अर्थात् क्रोध के साथ मान, माया आदि का उदय नहीं हो सकता।
*प्रश्न २१) क्या अनन्तानुबन्धी को कभी भी नष्ट नहीं किया जा सकता है?*
उत्तर : यद्यपि अनन्तानुबन्धी कषाय का वासना काल अनन्त काल है, अनन्तानुबन्धी कषाय पत्थर की रेखा के समान है फिर भी पुरुषार्थ के माध्यम से उसे पुरुषार्थ के माध्यम से जिस प्रकार पत्थर पर बनी हुई लकीर को भी घिसकर साफ किया जा सकता है, उसी प्रकार अनन्तानुबन्धी कषाय को भी करण (अध:करण आदि) रूप परिणामों के द्वारा एक अन्तर्मुहत में नष्ट किया जा सकता है।
(अध:करण, अपूर्वकरण, अनिवृत्तिकरण)
*प्रश्न २२) क्या ऐसे भी कोई जीव हैं जिनके अनन्तानुबन्धी कषाय का कभी नाश नहीं होगा?*
उत्तर : हाँ, अभव्य जीवों के अनन्तानुबंधी कषाय का कभी नाश नहीं होगा तथा वे भव्य जीव जो सती विधवा के समान हैं अर्थात् अभव्य सम भव्य जीवों के भी कभी अनन्तानुबन्धी कषाय का नाश नहीं होगा, क्योंकि इनमें मोक्ष जाने की क्षमता होते हुए भी इन्हें कभी अनन्तानुबन्धी चतुष्क को क्षय, उपशम करने के योग्य निमित्त नहीं मिलेंगे। जिस प्रकार सती विधवा को पुत्रप्राप्ति के योग्य निमित्त नहीं मिलेंगे इसलिए उसमें पुत्रप्राप्ति की क्षमता होने पर भी उसे कभी पुत्र की प्राप्ति नहीं होगी।
*(अभव्य जीव = बाझ स्त्री)*
*प्रश्न २३) क्या ऐसे कोई जीव हैं जिनके अब कभी अनन्तानुबंधी सम्बन्धी आस्रव के प्रत्यय नहीं होंगे?*
उत्तर : हाँ, वे जीव जिन्होंने क्षायिक-सम्यग्दर्शन प्राप्त कर लिया है तथा जो कृतकृत्य वेदक सम्यग्दृष्टि हैं उनको भी कभी अनन्तानुबन्धी सम्बन्धी आस्रव नहीं होगा। तथा दूसरे-तीसरे नरक में जाने के सम्मुख मिथ्यादृष्टि (तीर्थंकर प्रकृति की सत्ता वाला) जीव जब तक नरक में पहुँचकर सम्यक्त्व प्राप्त नहीं कर लेते उन जीवों को छोड़कर शेष जिन्होंने तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध कर लिया है उनके भी कभी अनन्तानुबन्धी कषाय के निमित्त से आस्रव नहीं होगा, क्योंकि ये कभी सम्यक्त्व से च्युत (होकर पहले दूसरे गुणस्थान को प्राप्त) नहीं होते हैं।
◆ यद्यपि वे तीसरे गुणस्थान को भी प्राप्त नही करते है लेकिन यहा अनंतानुबंधी कषाय की विवक्षा होने से उसे यहा ग्रहण नही किया है।
◆ मिथ्यात्व-०५, अविरति-१२, कषाय-१०, योग- १३ कुल आस्रव के प्रत्यय ४० है।
प्रश्न २४) अनन्तानुबन्धी का क्षय कौनसी गति में किया जा सकता है?*
उत्तर : अनन्तानुबन्धी कषाय का क्षय मात्र मनुष्य गति में ही किया जा सकता है। उसमें भी कम- से-कम आठ वर्ष अन्तर्मुहूर्त की आयु वाला कर्म भूमिया मनुष्य ही केवली, श्रुतकेवली के पादमूल में कर सकता है, अन्य कोई नहीं।
◆ नोट - (१) अनन्तानुबन्धी कषाय का कभी सीधा क्षय नहीं होता है। अनन्तानुबन्धी कषाय का विसंयोजन अर्थात् अन्य कषाय में परिवर्तित करके ही उसका क्षय किया जाता है।
(२) वह दुखमा-सुखमा काल में जन्मा जीव ही होना चाहिए।
◆ क्षयोपशमिक सम्यक्त्व - मिथ्यात्व, सम्यक्त्व मिथ्यात्व का उदयाभावी क्षय - इन्ही का सद अवस्था रुप उपशम और सम्यक प्रकृति का उदय इसे कहते है क्षयोपशमिक सम्यक्त्व।
◆ कृतकृत्य वेदक - अनंतानुबंधी चतुष्क समाप्त हो जाए तथा मिथ्यात्व, सम्यक मिथ्यात्व इन छह का नष्ट होना तथा जहा केवल सम्यक प्रकृति बचे उसे कहते है कृतकृत्य वेदक सम्यक्त्व, है यह भी क्षयोपशमिक सम्यक्त्व।
*प्रश्न २५) अनन्तानुबन्धी कषाय वाले के मति आदि ज्ञान क्यों नहीं होते हैं?*
उत्तर : अनन्तानुबन्धी कषाय के साथ मिथ्यात्व का उदय रहता है। उस मिथ्यात्व के कारण प्राणी जीवादि पदार्थों के यथार्थ स्वरूप को नहीं समझ सकता है, उसको इनका यथार्थ श्रद्धान नहीं हो सकता है इसलिए उसके मति, श्रुत तथा अवधिज्ञान विपरीत हो जाते हैं। कहा भी है- *“सदसतोरविशेषाद्यदृच्छोपलब्धेरुन्मत्तवत्" (त.सू. १/३२)*
उन्मत्त पुरुष के समान मिथ्यादृष्टि जीव भी पदार्थों का सही स्वरूप नहीं समझ सकता है। उसका ज्ञान कड़वी तूम्बी में रखे गये मीठे दूध के समान मिथ्या रूप हो जाता है।
दूसरे गुणस्थान में मिथ्यात्व का उदय नहीं है, फिर भी वहाँ मिथ्याज्ञान ही कहे गये हैं
यद्यपि वे तीसरे गुणस्थान को भी प्राप्त नहीं करते हैं लेकिन यहाँ अनन्तानुबन्धी कषाय की विवक्षा होने से उसे यहाँ ग्रहण नहीं किया है।
क्योंकि अनन्तानुबन्धी कषाय सम्यक्त्व का घात करने वाली भी कही गई है। दूसरी बात, दूसरे गुणस्थान वाले नियम से मिथ्यात्व में ही प्रवेश करते हैं इसलिए अनन्तानुबन्धी कयाय वाले के मति आदि ज्ञान नहीं होते हैं।
*प्रश्न २६) अनन्तानुबन्धी की शक्ति दो स्वभाव (सम्यक्त्व घातक तथा चारित्र घातक) रूप है, इसमें क्या युक्ति है?*
उत्तर : अनन्तानुबन्धी चतुष्क दर्शनमोहनीय स्वरूप नहीं माने जा सकते हैं क्योंकि सम्यक्त्त्व प्रकृति, मिथ्यात्व तथा सम्यग्मिथ्यात्व प्रकृति के द्वारा ही आवरण किये जाने वाले दर्शन मोहनीय के फल का अभाव है। और न इन्हें चारित्रमोहनीय स्वरूप ही माना जा सकता है, क्योंकि अप्रत्याख्यानावरणादि कषायों के द्वारा आवरण किये गये चारित्र के आवरण करने में फल का अभाव है। इसलिए उपर्युक्त अनन्तानुबन्धी कषायों का अभाव सिद्ध होता है। किन्तु उनका अभाव नहीं है, क्योंकि सूत्र में इनका अस्तित्व पाया जाता है। इसलिए इन अनन्तानुबन्धी कषायों के उदय में सासादन भाव की उत्पत्ति अन्यथा हो नहीं सकती है। इसी अन्यथानुपपत्ति से इनके दर्शनमोहनीयता और चारित्रमोहनीयता अर्थात् सम्यक्त्व और चारित्र को घात करने की शक्ति का होना सिद्ध होता है।
*(धवला ०६/४२)* *( सूत्र यानि शास्त्र)*
*प्रश्न २७) बाँस की जड़ के समान माया में कितने उपयोग हो सकते हैं?*
उत्तर : बाँस सदृश माया में कम-से-कम ०३ उपयोग हो सकते हैं- (१) कुमतिज्ञानोपयोग (२) कुश्रुत ज्ञानोपयोग (३) अचक्षु दर्शनोपयोग।
ये तीन उपयोग एकेन्द्रिय, द्विन्द्रिय, त्रीन्द्रिय जीवों की अपेक्षा कहे गये हैं।
अधिक से अधिक ०५ उपयोग हो सकते है - कुमति, कुश्रुत, कुअवधि, चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन
◆ जो आचार्य अवधिदर्शन को प्रथम गुणस्थान से स्वीकार करते हैं उनकी अपेक्षा ०६ उपयोग हो सकते हैं अर्थात् उपर्युक्त पाँच उपयोगों के साथ अवधिदर्शन भी हो सकता है।
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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*