गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

37. कषाय मार्गणा - संज्वलन क्रोध मान माया में चौबीस ठाणा

37. कषाय मार्गणा - संज्वलन क्रोध मान माया में चौबीस ठाणा*
https://youtu.be/ZHJN-2cfr-A?si=Npk8VDvtFyYEHuaM
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संयम के साथ अवस्थान होने पर एक होकर जो ज्वलित होते हैं अर्थात् चमकते हैं अथवा जिनके सद्भाव में संयम चमकता रहता है उसे संज्वलन कषाय कहते हैं।  *(सर्वार्थसिद्धि 8/9)*
∆ संज्वलन क्रोधादिक सकल कषाय के अभाव रूप यथाख्यात चारित्र का घात करते हैं। 
∆ जो संयम के साथ-साथ प्रकाशमान रहे एवं जिनके उदय से यथाख्यात चारित्र न हो वे संज्वलन कषायें हैं। *(हरिवंश पुराण 58/241)*

*✍️ संज्वलन क्रोध मान माया में चतुष्क में 24 स्थान :-*
01. गति – 04 में 01 भेद: मनुष्य।
02. इन्द्रिय – 05 में से 01 भेद: पंचेन्द्रिय जीव।
03. काय – 06 में से 01 भेद: त्रसकाय।
04. योग – 15 में से 11 योग:
मनोयोग 04, वचनयोग 04, काययोग 03, (औदारिक काययोग, आहारक द्विक काययोग)
05. वेद – 03 में से 03 वेद: तीनों वेदों में। (भाववेद अपेक्षा)
06. कषाय – 25 में से 10 कषाय: स्वकीय कषाय तथा नौ नोकषाय।
07. ज्ञान – 08 में से 04 ज्ञान: मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्यय ज्ञान।
08. संयम – 07 में से 03 भेद: सामायिक, छेदोपस्थाना, परिहार विशुद्धि
09. दर्शन – 04 में 03 दर्शन: चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन, अवधिदर्शन।
10. लेश्या – 06 में 03 लेश्या: पीत, पद्म, शुक्ल। 
11. भव्यत्व – 02 में से 01 भेद: भव्य।
12. सम्यक्त्व – 06 में से 03 भेद: औपशमिक, क्षायिक, क्षायोपशमिक।
13. संज्ञी – 02 में से 01 भेद: संज्ञी।
14. आहारक – 02 में से 01 भेद: आहारक।
15. गुणस्थान – 14 में 04 भेद: छठे से नौवे तक।
16. जीवसमास – 19 में से 01 भेद: सैनी पंचेन्द्रिय।
17. पर्याप्ति – 06 में से 06 भेद: आहार, शरीर, इन्द्रिय, श्वासोच्छ्वास, भाषा, मन:पर्याप्ति।
18. प्राण – 10 में से 10 प्राण: सभी दसों प्राण।
19. संज्ञा – 04 में 04 भेद: आहार, भय, मैथुन, परिग्रह।
20. उपयोग – 12 में से 07 भेद:
3 ज्ञानोपयोग – मतिज्ञानोपयोग, श्रुतज्ञानोपयोग, अवधिज्ञानोपयोग, मनःपर्यय ज्ञानोपयोग
3 दर्शनोपयोग – चक्षुदर्शनोपयोग, अचक्षुदर्शनोपयोग, अवधिदर्शनोपयोग।
21. ध्यान – 16 में से 08 भेद:
आर्त ध्यान (3) – इष्टवियोगज, अनिष्टसंयोगज, वेदना।
धर्मध्यान (4) – आज्ञाविचय, अपायविचय, विपाकविचय, संस्थान विचय धर्मध्यान।
22. आस्रव – 57 में से 21 भेद: कषाय 10, योग 11।
23. जाति – 84 लाख में से सभी 14 लाख जातियाँ।
(मनुष्यगति संबंधि जाति)
24. कुल – 199.5 लाख करोड़ में से 14 लाख करोड़ कुल। (मनुष्य संबंधी कुल)

*✍️  संज्वलन क्रोधादि की उपमा :-*
संज्वलन क्रोध को उदकराजि सदृश। (जल की पंक्ति के समान)
संज्वलन मान को लता सदृश वा बेंत के सदृश।
संज्वलन माया को अवलेखनी के सदृश या चामर के सदृश। *(जय धवला 12/152 से 155 वारंग चारित्र्)*
*◆ उदकराजि सदृश क्रोध :-*
यह क्रोध पर्वतशिला के भेद से मन्दतर अनुभाग वाला और स्तोकतर काल तक रहने वाला है क्योंकि पानी के भीतर उत्पन्न हुई रेखा का बिना दूसरे उपाय के तत्क्षण विनाश देखा जाता है। *(जय धवला 12/154)*
*◆ लता सदृश मान :-*
अन्तिम संज्वलन मान के संस्कार की तुलना  "बालों की घुंघराली लट"  से की है। आपाततः जैसे ही उसे शास्त्र ज्ञान रूपी हाथ से स्पर्श करते हैं वैसे ही वह क्षणभर में ही सीधा और सरल हो जाता है। (वारंग चारित्र् 4/73)
*◆ अवलेखनी (ब्रश) सदृश माया :-*
यह माया आत्मा को चमरी मृग के रोम के समान कर देती है। अतएव जैसे ही आत्मा रूपी रोम को आत्म-ज्ञान यंत्र में रखकर दबाते हैं तो तत्काल वह बिना विलम्ब अपने शुद्ध स्वभाव को प्राप्त कर लेता है। ((वारंग चारित्र् 4/77)*
 
*✍️ संज्वलन मान वाले के अवधिदर्शन के गुणस्थान :-*
संज्वलन मान वाले के अवधिदर्शन 4 गुणस्थानों में होता है - छठे, सातवें, आठवें तथा नौवें। इसी प्रकार क्रोध एवं माया में जानना चाहिए।
*◆ संज्वलन माया के शुक्ललेश्या के गुणस्थान :-*
संज्वलन माया वाले के शुक्ल लेश्या 4 गुणस्थानों में होती है  -छठे से नौवे गुणस्थान तक। इसी प्रकार क्रोध एवं मान में जानना चाहिए।
*◆ संज्वलन त्रिक में क्षायिक सम्यक्त्व :-*
संज्वलन त्रिक में क्षायिक सम्यक्त्व छठे, सातवें, आठवें और नौवें - इन चार गुणस्थानों में होता है।
*◆ संज्वलन माया में संज्ञाओं का अभाव :-*
संज्वलन माया में तीन संज्ञाओं का अभाव हो सकता है - आहार संज्ञा, भयसंज्ञा तथा मैथुन संज्ञा।
∆ परिग्रह संज्ञा का अभाव नहीं हो सकता है क्योंकि संज्वलन माया का उदय नौवें गुणस्थान तक होता है और चौथी संज्ञा दसवें गुणस्थान तक पायी जाती है। इसी प्रकार क्रोध एवं मान में जानना चाहिए।

*✍️ संज्वलन मान में कम-से-कम कितने उपयोग हो सकते हैं ?*
संज्वलन मान में कम-से-कम चार उपयोग हो सकते हैं-
मतिज्ञानोपयोग, श्रुतज्ञानोपयोग, चक्षुदर्शनोपयोग तथा अचक्षुदर्शनोपयोग। इसी प्रकार कोध माया एवं लोभ में भी जानना चाहिए।
*कषाय मार्गणा से संज्वलन क्रोध मान माया में चौबीस ठाणा का वर्णन पूर्ण हुआ।*
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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*

गुरुवार, 16 अप्रैल 2026

36. प्रत्याख्यानावरण चतुष्क मे चौबीस ठाणा*

*✍️ प्रत्याख्यानावरण चतुष्क में २४ स्थान*
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*०१) गति       ०२/०४*  मनुष्यगति, तिर्यंचगति
*०२) इन्द्रिय    ०१/०५*   पंचेन्द्रिय जीवो के
*०३) काय       ०१/०६*  त्रसकाय
*०४) योग       ०९/१५* 
       *मन ०४, वचन ०४, औदारिक काययोग*
*०५) वेद         ०३/०३*  तीनो वेद
*०६) कषाय     १०/२५*  
*प्रत्याख्यानावरण का स्वकीय तथा नौ नोकषाय*
*०७) ज्ञान         ०३/०८*  
        *मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान*
*०८) संयम       ०१/०७*  संयमासंयम
*०९) दर्शन       ०३/०४*  चक्षु, अचक्षु, अवधि
*१०) लेश्या       ०३/०६*  पीत, पदम, शुक्ल
        *अशुभ लेश्या नही होती*
*११) भव्यक्त्व   ०१/०२*  भव्यजीव
*१२) सम्यक्त्व   ०३/०६* औप,क्षा, क्षायोपशमिक 
*१३) संज्ञी         ०१/०२*  संज्ञी 
*१४) आहारक   ०१/०२*  आहारक
*१५) गुणस्थान   ०१/१४*  पांचवा संयमासंयम
*१६) जीवसमास  ०१/१९* सैनी पंचेन्द्रिय
*१७) पर्याप्ति      ०६/०६*  छहो पर्याप्तियाँ
*आहार,शरीर,इन्द्रिय,श्वासोच्छ,भाषा,मन:पर्याप्ति*
*१८) प्राण           १०/१०*   दसो प्राण
*इन्द्रिय ०५, बल ०३ आयु, श्वासोच्छवास प्राण*
*१९) संज्ञा         ०४/०४*  सभी संज्ञा
*आहार संज्ञा, भय संज्ञा, मैथुन संज्ञा, परिग्रह संज्ञा*
*२०) उपयोग      ०६/१२*  
*ज्ञानोपयोग  ०३* मति, श्रुत, अवधिज्ञानोपयोग
*दर्शनोपयोग ०३* चक्षु, अचक्षु, अवधिदर्शनोपयोग
*२१) ध्यान        ११/१६*  आर्त ०४, रौद ०४ धर्मध्यान ०३ *(संस्थान विचय धर्मध्यान नही हैं)*
*२२) आस्रव       ३०/५७*  
*अविरति ११* ०५ इन्द्रिय और मन को वश में नही करने तथा स्थावरकाय के जीवों की रक्षा नहीं करना
*कषाय १०* ०१ स्वकीय कषाय, ०९ नोकषाय
*योग ०९* मनोयोग०४, वचनयोग०४, काययोग ०१ 
*२३) जाति   १८ लाख/८४ लाख* तिर्यंचगति ०४ लाख, मनुष्यगनि १४ लाख
*एकेन्द्रिय और विकलत्रय नही होती*
*२४) कुल– ५७.५ ला.क / १९९.५ ला.क.* 
*४३.५ लाख करोड तिर्यंच,मनुष्य १४ लाख करोड*
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*प्रश्न ३७) प्रत्याख्यानावरण कषाय किसे कहते हैं*
उत्तर : जिसके उदय से सकल संयम विरति या सकल संयम को धारण नहीं कर सकता, वह समस्त प्रत्याख्यान का आवरण करने वाली प्रत्याख्यानावरण क्रोधादि कषाय है। *(रा.वा.५)* प्रत्याख्यान का अर्थ महाव्रत है। उनका आवरण करने वाला कर्म प्रत्याख्यानावरणीय कषाय है। 
*(ध. १३/३६०)*

*प्रश्न ३८) प्रत्याख्यानावरणीय क्रोधादि को किसकी उपमा दी जा सकती है?*
उत्तर
प्रत्याख्यानावरणीय क्रोध – धूलिरेखा सदृश / बालुकाराजि सदृश।
प्रत्याख्यानावरणीय मान – दारुस्तम्भ सदृश
प्रत्याख्यानावरणीय माया – गोमूत्र सदृश।
प्रत्याख्यानावरणीय लोभ – शरीर के मल के सदृश/पांशु लेप सदृश  *(ज.ध.१२/.१५३-१५५ वं.चा.)*

*प्रश्न ३९) धूलिरेखा सदृश क्रोध कैसा होता है?*
उत्तर: यथा नदी के पुलिन आदि में बालुकाराजि के मध्य पुरुष के प्रयोग से या अन्य किसी कारण से उत्पन्न हुई रेखा जिस प्रकार हवा के अभिघात आदि दूसरे कारण द्वारा शीघ्र ही पुनः समान हो जाती है अर्थात् रेखा मिट जाती है। इसी प्रकार यह क्रोध परिणाम भी मन्द रूप से उत्पन्न होकर गुरु के उपदेश रूपी पवन से प्रेरित होता हुआ अति शीघ्र उपशम को प्राप्त हो जाता है। *(ज.ध.१२/१५४)*
*(पुलिन=नदी का तट)*
अधिकत्तम - १५ दिन, जघन्य - अन्तरमुहूर्त

*प्रश्न ४०) दारु स्तम्भ सदृश मान कैसा होता है?*
उत्तर : इस मान में इतनी कठोरता आ जाती है जितनी गीली लकड़ी में आती है। फलतः जब ऐसा जीव रूपी काष्ठ ज्ञान रूपी तेल से सराबोर कर दिया जाता है, उसके उपरान्त ही वह सरलता से झुक सकता है। *(व.चा. ०४/७२)*

*प्रश्न ४१) गोमूत्र सदृश माया कैसी होती है?*
उत्तर : इस माया की तुलना चलते हुए बैल के मूत्र से बनी टेढ़ी-मेढ़ी रेखा से होती है। परिणाम यह होता है कि उसकी सभी चेष्टाएँ बैल के मूत्र के समान आधी-सीधी और आधी कुटिल एवं कपटपूर्ण होती हैं। *(व.चा. ०४/७६)*

*प्रश्न ४२) पांशु लेप सदृश लोभ कैसा होता है?*
उत्तर : पांशु का अर्थ होता है पैर
जिस प्रकार पैर में लगा धूलि का लेप पानी के द्वारा धोने आदि उपायों द्वारा सुखपूर्वक दूर कर दिया जाता है वह चिरकाल तक नहीं ठहरता। उसी के समान उत्तरोत्तर मन्द स्वभाव वाला वह लोभ का भेद भी चिरकाल तक नहीं ठहरता। यह अप्रत्याख्यानावरण लोभ से अनन्तगुणा हीन सामर्थ्य वाला होता हुआ थोड़े से प्रयत्न द्वारा दूर हो जाता है। *(ज.ध. १२/१५६)*
इस लोभ वाला प्राणी जैसे ही आत्मा को शास्त्राभ्यास रूपी जल से भली-भाँति धोता है तत्काल इस लोभ का नामोनिशान ही नष्ट हो जाता है। *(वरांग चारित्र ०४/७९)*

*प्रश्न ४३) क्या प्रत्याख्यानावरण कषाय वाले तिर्यंच मनुष्य दोनों के क्षायिक सम्यक्त्व होता है?*
उत्तर : नहीं, प्रत्याख्यानावरण कषाय के उदय वाले तिर्यञ्चों के क्षायिक सम्यक्त्व नहीं हो सकता है। केवल मनुष्यों में ही क्षायिक सम्यग्दृष्टि पंचम गुणस्थान को प्राप्त कर सकते हैं क्योंकि तिर्यंचो में क्षायिक सम्यक्त्व भोगभूमि में ही होता है अर्थात् कर्मभूमि तिर्यंचों के क्षायिक सम्यक्त्व नहीं होता है। भोगभूमि में संयम नहीं है इसलिए प्रत्याख्यानावरण कषाय वाले तिर्यंच के क्षायिक सम्यक्त्व नहीं हो सकता है।

*प्रश्न ४४) क्या ऐसे कोई प्रत्याख्यानावरण कषाय के उदय वाले तिर्यंच हैं जिनके उपशम सम्यक्त्व नहीं हो सकता है?*
उत्तर: हाँ, सम्मूर्च्छन जन्म वाले पंचेन्द्रिय तिर्यंच जो प्रत्याख्यानावरण कषाय के उदय वाले हैं उनके उपशम सम्यक्त्व नहीं हो सकता है।
*(क्योंकि उपशम सम्यक्त्व गर्भजो के ही होता है)* *(धवला ०६/४२९)*

*प्रश्न ४५) प्रत्याख्यानावरण कषाय में कम-से-कम कितने प्राण हैं?*
उत्तर : प्रत्याख्यानावरण कषाय में कम-से-कम भी १० प्राण ही होते हैं क्योंकि इस कषाय का उदय पंचम गुणस्थान में कहा गया है। वह पंचम गुणस्थान पर्याप्त जीवों के ही होता है।
◆ अगर अप्रत्याख्यानावरण कषाय का उदय हो तो कम से कम सात (०७) होते है।
◆ निवृत्यपर्याप्तक अवस्था मे भी चौथा गुणस्थान होता है और वहा सात (०७) प्राण होते है।
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आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)

गुरुवार, 2 अप्रैल 2026

35. अप्रत्याख्यानावरण चतुष्क मे चौबीस ठाणा

*✍️ अप्रत्याख्यानावरण चतुष्क में २४ स्थान*
*✍️ अप्रत्याख्यानावरण चतुष्क में २४ स्थान*
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*०१) गति       ०४/०४*   चारो गति में
*०२) इन्द्रिय    ०१/०५*   पंचेन्द्रिय जीवो के
*०३) काय       ०१/०६*  त्रसकाय
*०४) योग       १३/१५* (आहारकद्विक नही होता)
*०५) वेद         ०३/०३*  तीनो वेद
*०६) कषाय     १०/२५*  
अप्रत्याख्यानावरण स्वकीय तथा नौ नोकषाय
*०७) ज्ञान         ०३/०८*  
मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान
*०८) संयम       ०१/०७*  असंयम
*०९) दर्शन       ०३/०४*  चक्षु, अचक्षु, अवधि
*१०) लेश्या       ०६/०६*  सभी लेश्या 
कृष्ण, नील, कापोत, पीत, पदम और शुक्ल लेश्या।
*११) भव्यक्त्व   ०१/०२*  भव्य 
*१२) सम्यक्त्व   ०४/०६*  
औपशमिक, क्षायिक, क्षायोपशमिक, मिश्र 
*१३) संज्ञी         ०१/०२*  संज्ञी 
*१४) आहारक   ०२/०२*  आहारक, अनाहारक
ये चतुर्थ गुणस्थान वाले विग्रहगति मे भी जाते है
*१५) गुणस्थान   ०२/१४*  मिश्र, अविरत
*१६) जीवसमास  ०१/१९* सैनी पंचेन्द्रिय
*१७) पर्याप्ति      ०६/०६*  छहो पर्याप्तियाँ
आहार, शरीर, इन्द्रिय,श्वासोच्छ, भाषा,मन:पर्याप्ति
*१८) प्राण           १०/१०*   दसो प्राण
*इन्द्रिय ०५* स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और कर्ण
*बल ०३* कायबल, वचन बल और मनोबल प्राण
आयु प्राण और श्वासोच्छवास प्राण
*१९) संज्ञा         ०४/०४*  सभी संज्ञा
आहार संज्ञा, भय संज्ञा, मैथुन संज्ञा, परिग्रह संज्ञा।
*२०) उपयोग      ०६/१२*  
*ज्ञानोपयोग ०३* मति, श्रुत, अवधिज्ञानोपयोग
*दर्शनोपयोग ०३* चक्षु, अचक्षु, अवधिदर्शनोपयोग
*२१) ध्यान         १०/१६*  
*आर्त* इष्टवियोगज,अनिष्टसंयोगज,वेदना,निदान
*रौद* हिंसानन्दी,मृषानन्दी,चौर्यानन्दी,परिग्रहानन्दी
*धर्मध्यान* आज्ञाविचय, अपायविचय
*२२) आस्रव       ३५/५७*  
*अविरति १२* ०५ इन्द्रिय और मन को वश में नही करने तथा षट्काय के जीवों की रक्षा नहीं करना
*कषाय १०* ०१ स्वकीय कषाय, ०९ नोकषाय
*योग १३* मनोयोग०४, वचनयोग०४, काययोग ०५ 
*२३) जाति   २६ लाख/८४ लाख* 
चारो गति के पंचेन्द्रिय संबंधी जाति
*२४) कुल– १०८.५ ला.क / १९९.५ ला.क.* 
चारो गति के पंचेन्द्रिय संबंधी कुल 
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*प्रश्न २८) अप्रत्याख्यानावरण कषाय किसे कहते हैं?*
उत्तर : अ=नही, प्रत्याख्यान=त्याग, आवरण=किंचित त्याग भी नही होने दे, त्याग पर आवरण डाले वह अप्रत्याख्यानावरण कषाय है।
◆ जिसके उदय से यह प्राणी ईषत (न्यून) भी देशविरत (संयमासंयम) नामक व्रत को स्वीकार नही कर सकता है, स्वल्प मात्र भी व्रत धारण नहीं कर सकता है वह देशविरत प्रत्याख्यान का आवरण करने वाली अप्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया और लोभ कषाय है। *(रा.वा. ०८/०९)*
जो देशसंयम को अल्प मात्र भी न होने  उसे अप्रत्याख्यानावरण क्रोधादि कषाय कहते हैं। 
*(गो. क. जी. १३३)*

*प्रश्न २९) अप्रत्याख्यानावरण क्रोधादि को किसकी उपमा दी गई है?*
उत्तर :अप्रत्याख्यानावरण क्रोध =पृथ्वी रेखा सदृश
अप्रत्याख्यानावरण मान = हड्डी के समान, अस्थि स्तम्भ सदृश।
अप्रत्याख्यानावरण माया =बकरी के सींग या मेंढ़े के सींग सदृश।
अप्रत्याख्यानावरण लोभ = नील रंग/अक्षमल या कज्जल सदृश। *(ज.ध.१२/१५३-१५५ वं.चा.)*

*प्रश्न ३०) पृथ्वीरेखा सदृश क्रोध किसे कहते हैं?*
उत्तर : यह क्रोध पूर्व क्रोध (नगराजि सदृश क्रोध) (न=नही, ग=गमन करे, जो गमन ना करे यानि पर्वत, राजी=श्रद्धला यानि पर्वतो की कतार) से मन्द अनुभाग वाला है, क्योंकि चिरकाल तक अवस्थित होने पर भी इसका पुनः दूसरे उपाय से सन्धान (जुड़ना) हो जाता है। यथा ग्रीष्म काल में पृथिवी का भेद हुआ (गाड़ी गड़ार/दरार बन गई) पुनः वर्षा काल में जल के प्रवाह से वह दरार भरकर उसी समय संधान को प्राप्त हो गई। इसी प्रकार जो क्रोध परिणाम चिरकाल तक अवस्थित रहकर भी पुनः दूसरे कारण से तथा गुरु के उपदेश आदि से उपशम भाव को प्राप्त होता है वह इस प्रकार का तीव्र परिणाम भेद पृथिवी रेखा सदृश है। 
*(ज.ध. १२/१५३)*
ये संस्कार काफी समय बीतने पर अथवा शास्त्र रूपी जल वृष्टि से चित्त स्नेहार्द्र हो जाने पर उपशम को प्राप्त हो जाता है। *(व.चा. ४/६७)*

*प्रश्न ३१)अस्थिस्तम्भ सदृश मान किसे कहते है?*
उत्तर : पुराण पुरुष कहते हैं कि दूसरे मान का उदय आत्मा में हड्डी के समान कर्कशता ला देता है, परिणाम यह होता है कि जब जीव ज्ञान रूपी आग में काफी तपाया जाता है तो उसमें कुछ-कुछ विनम्रता आ ही जाती है। *(व.चा. ४/७१)*

*प्रश्न ३२) मेढ़े के सींग सदृश माया किसे कहते हैं?*
उत्तर : इस माया का आत्मा पर पड़ने वाला संस्कार मेढ़े के सींग के समान गुड़ीदार होता है फलतः इस कषाय से आक्रान्त व्यक्ति मन में कुछ सोचता है और जो करता है वह इससे बिल्कुल भिन्न होता है। *(व.चा. ४/७५)*

*प्रश्न ३३) अक्षमल सदृश लोभ किसे कहते हैं?*
उत्तर : अक्ष (रथ का चक्का) का मल अक्षमल है। अक्षांजन के स्नेह से गीला हुआ मषीमल अति चिक्कण होने से उस अक्षमल को सुखपूर्वक दूर करना शक्य नहीं है। उसी प्रकार यह लोभ परिणाम भी  "निधत्त स्वरूप"  होने से जीव के हृदय में अवगाढ़ होता है इसलिए उसे दूर करना शक्य नहीं है। 
*(ज.ध. १२/१५६)* 
जैसे ही जीव अपने आपको ज्ञान रूपी जल में धोता है वैसे ही आत्मा तुरन्त शुचि और स्वच्छ हो जाता है। *(व.चा. ४/७९)*

*प्रश्न ३४) अप्रत्याख्यानावरण कषाय वाले क्षायिक सम्यग्दृष्टि के कितने उपयोग हो सकते हैं?*
उत्तर : अप्रत्याख्यानावरण कषाय वाले क्षायिक सम्यग्दृष्टि के छह (०६) उपयोग हो सकते हैं -
*०३ ज्ञानोपयोग* मति, श्रुत, अवधिज्ञानोपयोग।
*०३ दर्शनोपयोग* चक्षु, अचक्षु, अवधिदर्शनोपयोग

*प्रश्न ३५) अप्रत्याख्यानावरण कषाय वाले कार्मण काययोगी के कितने आस्रव प्रत्यय हो सकते हैं ?*
उत्तर : कार्मण काययोग में स्थित अप्रत्याख्यानावरण कषाय वाले के बाईस (२२) आस्रव के प्रत्यय होते हैं -
९ कषाय = ८ नोकषाय (स्त्री वेद बिना), १ स्वकीय अर्थात् क्रोधादि में से एक 
०१ योग = कार्मण काययोग
१२ अविरति = छहकाय व पांच इन्द्रिय और मन के संबंधी अविरति

*प्रश्न ३६) अप्रत्याख्यानावरण कषाय वाले व्यंतर देव के कितने आस्रव के प्रत्यय होते हैं?*
उत्तर : अप्रत्याख्यानावरण कषाय वाले व्यंतरदेव के उनतीस २९ आस्रव के प्रत्यय होते हैं -
१२ अविरति =
०८ कषाय - ०७ नोकषाय (देव है इसलिए स्त्रीवेद नहीं है) तथा ०१ स्वकीय कषाय है।
०९ योग - (०४ मनोयोग, ०४ वचनयोग, वैक्रियिक काययोग)    *(१२+८+९ = २९ आस्रव प्रत्यय)*
(यहा मिथ्यात्व को नही लिया है क्योकि यह सम्यग्दर्शन वाला जीव है)
*नोट* स्वकीय कषाय के साथ प्रत्याख्यानावरण तथा संज्वलन क्रोधादि को भी ग्रहण करने पर आस्रव के दो प्रत्यय और हो जाते हैं।
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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*

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*०१) गति       ०४/०४*   चारो गति में
*०२) इन्द्रिय    ०१/०५*   पंचेन्द्रिय जीवो के
*०३) काय       ०१/०६*  त्रसकाय
*०४) योग       १३/१५* (आहारकद्विक नही होता)
*०५) वेद         ०३/०३*  तीनो वेद
*०६) कषाय     १०/२५*  
अप्रत्याख्यानावरण स्वकीय तथा नौ नोकषाय
*०७) ज्ञान         ०३/०८*  
मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान
*०८) संयम       ०१/०७*  असंयम
*०९) दर्शन       ०३/०४*  चक्षु, अचक्षु, अवधि
*१०) लेश्या       ०६/०६*  सभी लेश्या 
कृष्ण, नील, कापोत, पीत, पदम और शुक्ल लेश्या।
*११) भव्यक्त्व   ०१/०२*  भव्य 
*१२) सम्यक्त्व   ०४/०६*  
औपशमिक, क्षायिक, क्षायोपशमिक, मिश्र 
*१३) संज्ञी         ०१/०२*  संज्ञी 
*१४) आहारक   ०२/०२*  आहारक, अनाहारक
ये चतुर्थ गुणस्थान वाले विग्रहगति मे भी जाते है
*१५) गुणस्थान   ०२/१४*  मिश्र, अविरत
*१६) जीवसमास  ०१/१९* सैनी पंचेन्द्रिय
*१७) पर्याप्ति      ०६/०६*  छहो पर्याप्तियाँ
आहार, शरीर, इन्द्रिय,श्वासोच्छ, भाषा,मन:पर्याप्ति
*१८) प्राण           १०/१०*   दसो प्राण
*इन्द्रिय ०५* स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और कर्ण
*बल ०३* कायबल, वचन बल और मनोबल प्राण
आयु प्राण और श्वासोच्छवास प्राण
*१९) संज्ञा         ०४/०४*  सभी संज्ञा
आहार संज्ञा, भय संज्ञा, मैथुन संज्ञा, परिग्रह संज्ञा।
*२०) उपयोग      ०६/१२*  
*ज्ञानोपयोग ०३* मति, श्रुत, अवधिज्ञानोपयोग
*दर्शनोपयोग ०३* चक्षु, अचक्षु, अवधिदर्शनोपयोग
*२१) ध्यान         १०/१६*  
*आर्त* इष्टवियोगज,अनिष्टसंयोगज,वेदना,निदान
*रौद* हिंसानन्दी,मृषानन्दी,चौर्यानन्दी,परिग्रहानन्दी
*धर्मध्यान* आज्ञाविचय, अपायविचय
*२२) आस्रव       ३५/५७*  
*अविरति १२* ०५ इन्द्रिय और मन को वश में नही करने तथा षट्काय के जीवों की रक्षा नहीं करना
*कषाय १०* ०१ स्वकीय कषाय, ०९ नोकषाय
*योग १३* मनोयोग०४, वचनयोग०४, काययोग ०५ 
*२३) जाति   २६ लाख/८४ लाख* 
चारो गति के पंचेन्द्रिय संबंधी जाति
*२४) कुल– १०८.५ ला.क / १९९.५ ला.क.* 
चारो गति के पंचेन्द्रिय संबंधी कुल 
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*प्रश्न २८) अप्रत्याख्यानावरण कषाय किसे कहते हैं?*
उत्तर : अ=नही, प्रत्याख्यान=त्याग, आवरण=किंचित त्याग भी नही होने दे, त्याग पर आवरण डाले वह अप्रत्याख्यानावरण कषाय है।
◆ जिसके उदय से यह प्राणी ईषत (न्यून) भी देशविरत (संयमासंयम) नामक व्रत को स्वीकार नही कर सकता है, स्वल्प मात्र भी व्रत धारण नहीं कर सकता है वह देशविरत प्रत्याख्यान का आवरण करने वाली अप्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया और लोभ कषाय है। *(रा.वा. ०८/०९)*
जो देशसंयम को अल्प मात्र भी न होने  उसे अप्रत्याख्यानावरण क्रोधादि कषाय कहते हैं। 
*(गो. क. जी. १३३)*

*प्रश्न २९) अप्रत्याख्यानावरण क्रोधादि को किसकी उपमा दी गई है?*
उत्तर :अप्रत्याख्यानावरण क्रोध =पृथ्वी रेखा सदृश
अप्रत्याख्यानावरण मान = हड्डी के समान, अस्थि स्तम्भ सदृश।
अप्रत्याख्यानावरण माया =बकरी के सींग या मेंढ़े के सींग सदृश।
अप्रत्याख्यानावरण लोभ = नील रंग/अक्षमल या कज्जल सदृश। *(ज.ध.१२/१५३-१५५ वं.चा.)*

*प्रश्न ३०) पृथ्वीरेखा सदृश क्रोध किसे कहते हैं?*
उत्तर : यह क्रोध पूर्व क्रोध (नगराजि सदृश क्रोध) (न=नही, ग=गमन करे, जो गमन ना करे यानि पर्वत, राजी=श्रद्धला यानि पर्वतो की कतार) से मन्द अनुभाग वाला है, क्योंकि चिरकाल तक अवस्थित होने पर भी इसका पुनः दूसरे उपाय से सन्धान (जुड़ना) हो जाता है। यथा ग्रीष्म काल में पृथिवी का भेद हुआ (गाड़ी गड़ार/दरार बन गई) पुनः वर्षा काल में जल के प्रवाह से वह दरार भरकर उसी समय संधान को प्राप्त हो गई। इसी प्रकार जो क्रोध परिणाम चिरकाल तक अवस्थित रहकर भी पुनः दूसरे कारण से तथा गुरु के उपदेश आदि से उपशम भाव को प्राप्त होता है वह इस प्रकार का तीव्र परिणाम भेद पृथिवी रेखा सदृश है। 
*(ज.ध. १२/१५३)*
ये संस्कार काफी समय बीतने पर अथवा शास्त्र रूपी जल वृष्टि से चित्त स्नेहार्द्र हो जाने पर उपशम को प्राप्त हो जाता है। *(व.चा. ४/६७)*

*प्रश्न ३१)अस्थिस्तम्भ सदृश मान किसे कहते है?*
उत्तर : पुराण पुरुष कहते हैं कि दूसरे मान का उदय आत्मा में हड्डी के समान कर्कशता ला देता है, परिणाम यह होता है कि जब जीव ज्ञान रूपी आग में काफी तपाया जाता है तो उसमें कुछ-कुछ विनम्रता आ ही जाती है। *(व.चा. ४/७१)*

*प्रश्न ३२) मेढ़े के सींग सदृश माया किसे कहते हैं?*
उत्तर : इस माया का आत्मा पर पड़ने वाला संस्कार मेढ़े के सींग के समान गुड़ीदार होता है फलतः इस कषाय से आक्रान्त व्यक्ति मन में कुछ सोचता है और जो करता है वह इससे बिल्कुल भिन्न होता है। *(व.चा. ४/७५)*

*प्रश्न ३३) अक्षमल सदृश लोभ किसे कहते हैं?*
उत्तर : अक्ष (रथ का चक्का) का मल अक्षमल है। अक्षांजन के स्नेह से गीला हुआ मषीमल अति चिक्कण होने से उस अक्षमल को सुखपूर्वक दूर करना शक्य नहीं है। उसी प्रकार यह लोभ परिणाम भी  "निधत्त स्वरूप"  होने से जीव के हृदय में अवगाढ़ होता है इसलिए उसे दूर करना शक्य नहीं है। 
*(ज.ध. १२/१५६)* 
जैसे ही जीव अपने आपको ज्ञान रूपी जल में धोता है वैसे ही आत्मा तुरन्त शुचि और स्वच्छ हो जाता है। *(व.चा. ४/७९)*

*प्रश्न ३४) अप्रत्याख्यानावरण कषाय वाले क्षायिक सम्यग्दृष्टि के कितने उपयोग हो सकते हैं?*
उत्तर : अप्रत्याख्यानावरण कषाय वाले क्षायिक सम्यग्दृष्टि के छह (०६) उपयोग हो सकते हैं -
*०३ ज्ञानोपयोग* मति, श्रुत, अवधिज्ञानोपयोग।
*०३ दर्शनोपयोग* चक्षु, अचक्षु, अवधिदर्शनोपयोग

*प्रश्न ३५) अप्रत्याख्यानावरण कषाय वाले कार्मण काययोगी के कितने आस्रव प्रत्यय हो सकते हैं ?*
उत्तर : कार्मण काययोग में स्थित अप्रत्याख्यानावरण कषाय वाले के बाईस (२२) आस्रव के प्रत्यय होते हैं -
९ कषाय = ८ नोकषाय (स्त्री वेद बिना), १ स्वकीय अर्थात् क्रोधादि में से एक 
०१ योग = कार्मण काययोग
१२ अविरति = छहकाय व पांच इन्द्रिय और मन के संबंधी अविरति

*प्रश्न ३६) अप्रत्याख्यानावरण कषाय वाले व्यंतर देव के कितने आस्रव के प्रत्यय होते हैं?*
उत्तर : अप्रत्याख्यानावरण कषाय वाले व्यंतरदेव के उनतीस २९ आस्रव के प्रत्यय होते हैं -
१२ अविरति =
०८ कषाय - ०७ नोकषाय (देव है इसलिए स्त्रीवेद नहीं है) तथा ०१ स्वकीय कषाय है।
०९ योग - (०४ मनोयोग, ०४ वचनयोग, वैक्रियिक काययोग)    *(१२+८+९ = २९ आस्रव प्रत्यय)*
(यहा मिथ्यात्व को नही लिया है क्योकि यह सम्यग्दर्शन वाला जीव है)
*नोट* स्वकीय कषाय के साथ प्रत्याख्यानावरण तथा संज्वलन क्रोधादि को भी ग्रहण करने पर आस्रव के दो प्रत्यय और हो जाते हैं।
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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*

37. कषाय मार्गणा - संज्वलन क्रोध मान माया में चौबीस ठाणा

37. कषाय मार्गणा - संज्वलन क्रोध मान माया में चौबीस ठाणा* https://youtu.be/ZHJN-2cfr-A?si=Npk8VDvtFyYEHuaM 🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴 संयम के साथ ...