37. कषाय मार्गणा - संज्वलन क्रोध मान माया में चौबीस ठाणा*
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संयम के साथ अवस्थान होने पर एक होकर जो ज्वलित होते हैं अर्थात् चमकते हैं अथवा जिनके सद्भाव में संयम चमकता रहता है उसे संज्वलन कषाय कहते हैं। *(सर्वार्थसिद्धि 8/9)*
∆ संज्वलन क्रोधादिक सकल कषाय के अभाव रूप यथाख्यात चारित्र का घात करते हैं।
∆ जो संयम के साथ-साथ प्रकाशमान रहे एवं जिनके उदय से यथाख्यात चारित्र न हो वे संज्वलन कषायें हैं। *(हरिवंश पुराण 58/241)*
*✍️ संज्वलन क्रोध मान माया में चतुष्क में 24 स्थान :-*
01. गति – 04 में 01 भेद: मनुष्य।
02. इन्द्रिय – 05 में से 01 भेद: पंचेन्द्रिय जीव।
03. काय – 06 में से 01 भेद: त्रसकाय।
04. योग – 15 में से 11 योग:
मनोयोग 04, वचनयोग 04, काययोग 03, (औदारिक काययोग, आहारक द्विक काययोग)
05. वेद – 03 में से 03 वेद: तीनों वेदों में। (भाववेद अपेक्षा)
06. कषाय – 25 में से 10 कषाय: स्वकीय कषाय तथा नौ नोकषाय।
07. ज्ञान – 08 में से 04 ज्ञान: मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्यय ज्ञान।
08. संयम – 07 में से 03 भेद: सामायिक, छेदोपस्थाना, परिहार विशुद्धि
09. दर्शन – 04 में 03 दर्शन: चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन, अवधिदर्शन।
10. लेश्या – 06 में 03 लेश्या: पीत, पद्म, शुक्ल।
11. भव्यत्व – 02 में से 01 भेद: भव्य।
12. सम्यक्त्व – 06 में से 03 भेद: औपशमिक, क्षायिक, क्षायोपशमिक।
13. संज्ञी – 02 में से 01 भेद: संज्ञी।
14. आहारक – 02 में से 01 भेद: आहारक।
15. गुणस्थान – 14 में 04 भेद: छठे से नौवे तक।
16. जीवसमास – 19 में से 01 भेद: सैनी पंचेन्द्रिय।
17. पर्याप्ति – 06 में से 06 भेद: आहार, शरीर, इन्द्रिय, श्वासोच्छ्वास, भाषा, मन:पर्याप्ति।
18. प्राण – 10 में से 10 प्राण: सभी दसों प्राण।
19. संज्ञा – 04 में 04 भेद: आहार, भय, मैथुन, परिग्रह।
20. उपयोग – 12 में से 07 भेद:
3 ज्ञानोपयोग – मतिज्ञानोपयोग, श्रुतज्ञानोपयोग, अवधिज्ञानोपयोग, मनःपर्यय ज्ञानोपयोग
3 दर्शनोपयोग – चक्षुदर्शनोपयोग, अचक्षुदर्शनोपयोग, अवधिदर्शनोपयोग।
21. ध्यान – 16 में से 08 भेद:
आर्त ध्यान (3) – इष्टवियोगज, अनिष्टसंयोगज, वेदना।
धर्मध्यान (4) – आज्ञाविचय, अपायविचय, विपाकविचय, संस्थान विचय धर्मध्यान।
22. आस्रव – 57 में से 21 भेद: कषाय 10, योग 11।
23. जाति – 84 लाख में से सभी 14 लाख जातियाँ।
(मनुष्यगति संबंधि जाति)
24. कुल – 199.5 लाख करोड़ में से 14 लाख करोड़ कुल। (मनुष्य संबंधी कुल)
*✍️ संज्वलन क्रोधादि की उपमा :-*
संज्वलन क्रोध को उदकराजि सदृश। (जल की पंक्ति के समान)
संज्वलन मान को लता सदृश वा बेंत के सदृश।
संज्वलन माया को अवलेखनी के सदृश या चामर के सदृश। *(जय धवला 12/152 से 155 वारंग चारित्र्)*
*◆ उदकराजि सदृश क्रोध :-*
यह क्रोध पर्वतशिला के भेद से मन्दतर अनुभाग वाला और स्तोकतर काल तक रहने वाला है क्योंकि पानी के भीतर उत्पन्न हुई रेखा का बिना दूसरे उपाय के तत्क्षण विनाश देखा जाता है। *(जय धवला 12/154)*
*◆ लता सदृश मान :-*
अन्तिम संज्वलन मान के संस्कार की तुलना "बालों की घुंघराली लट" से की है। आपाततः जैसे ही उसे शास्त्र ज्ञान रूपी हाथ से स्पर्श करते हैं वैसे ही वह क्षणभर में ही सीधा और सरल हो जाता है। (वारंग चारित्र् 4/73)
*◆ अवलेखनी (ब्रश) सदृश माया :-*
यह माया आत्मा को चमरी मृग के रोम के समान कर देती है। अतएव जैसे ही आत्मा रूपी रोम को आत्म-ज्ञान यंत्र में रखकर दबाते हैं तो तत्काल वह बिना विलम्ब अपने शुद्ध स्वभाव को प्राप्त कर लेता है। ((वारंग चारित्र् 4/77)*
*✍️ संज्वलन मान वाले के अवधिदर्शन के गुणस्थान :-*
संज्वलन मान वाले के अवधिदर्शन 4 गुणस्थानों में होता है - छठे, सातवें, आठवें तथा नौवें। इसी प्रकार क्रोध एवं माया में जानना चाहिए।
*◆ संज्वलन माया के शुक्ललेश्या के गुणस्थान :-*
संज्वलन माया वाले के शुक्ल लेश्या 4 गुणस्थानों में होती है -छठे से नौवे गुणस्थान तक। इसी प्रकार क्रोध एवं मान में जानना चाहिए।
*◆ संज्वलन त्रिक में क्षायिक सम्यक्त्व :-*
संज्वलन त्रिक में क्षायिक सम्यक्त्व छठे, सातवें, आठवें और नौवें - इन चार गुणस्थानों में होता है।
*◆ संज्वलन माया में संज्ञाओं का अभाव :-*
संज्वलन माया में तीन संज्ञाओं का अभाव हो सकता है - आहार संज्ञा, भयसंज्ञा तथा मैथुन संज्ञा।
∆ परिग्रह संज्ञा का अभाव नहीं हो सकता है क्योंकि संज्वलन माया का उदय नौवें गुणस्थान तक होता है और चौथी संज्ञा दसवें गुणस्थान तक पायी जाती है। इसी प्रकार क्रोध एवं मान में जानना चाहिए।
*✍️ संज्वलन मान में कम-से-कम कितने उपयोग हो सकते हैं ?*
संज्वलन मान में कम-से-कम चार उपयोग हो सकते हैं-
मतिज्ञानोपयोग, श्रुतज्ञानोपयोग, चक्षुदर्शनोपयोग तथा अचक्षुदर्शनोपयोग। इसी प्रकार कोध माया एवं लोभ में भी जानना चाहिए।
*कषाय मार्गणा से संज्वलन क्रोध मान माया में चौबीस ठाणा का वर्णन पूर्ण हुआ।*
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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*
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