गुरुवार, 24 जुलाई 2025

17. चौबीस ठाणा–योग मार्गणा

17. चौबीस ठाणा–योग मार्गणा
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*प्रश्न ०१) योग मार्गणा किसे कहते हैं?*
उत्तर : कर्म (कार्मण) वर्गणा रूप पुद्‌गल स्कन्धों को  "ज्ञानावरण आदि"  आठो कर्म रूप से और 
नोकर्म वर्गणा रूप पुद्‌गल स्कन्ध को  "औदारिक आदि शरीर"  रूप से परिणमन हेतु (भाव योग) जो सामर्थ्य है तथा आत्मप्रदेशों के परिस्पन्द (हलन चलन) को योग (द्रव्ययोग) कहते हैं।
*कर्म वर्गणा* ज्ञानावरणादि आठो कर्म मे
*नोकर्म वर्गणा* औदारिक आदि शरीर रुप मे
*भाव योग* परिणमन की शक्ति को
*द्रव्य योग* आत्म प्रदेशो का परिस्पंदन को
*०१)* जैसे अग्रि के संयोग से लोहे में दहन शक्ति होती है, उसी तरह अंगोपांग नामकर्म और शरीर नामकर्म के उदय से जीव के प्रदेशों में कर्म और नोकर्म को ग्रहण करने की शक्ति उत्पन्न होती है।  *(गो. जी. २१६)*
*०२)* जीवों के प्रदेशों का जो संकोच-विकोच और परिभ्रमण रुप परिस्पन्दन होता है, वह योग कहलाता है।           *(धवला १०/४३७)*
*०३)* मन, वचन, काय वर्गणा निमित्तक आत्म प्रदेशो का परिस्पन्द योग है।  *(धवला १०/४३७)*
*उपर्युक्त योगों में जीवों की खोज करने को योग मार्गणा कहते हैं।*

*प्रश्न ०२) योग कितने होते हैं?*
उत्तर: *योग के दो भेद हैं* द्रव्य योग–भाव योग।
*योग के तीन भेद हैं* मनोयोग, वचनयोग, काययोग
*योग मार्गणा के पन्द्रह भेद होते हैं –*
*मनोयोग ०४* सत्य मनोयोग, असत्य मनोयोग, उभय मनोयोग, अनुभय मनोयोग, 
*वचनयोग ०४* सत्य वचनयोग, असत्य वचनयोग, उभय वचनयोग, अनुभय वचनयोग,
*काययोग ०७* औदारिक-औदारिक मिश्रकाययोग, वैक्रियिक-वैक्रियिक मिश्रकाययोग, आहारक - आहारकमिश्र काययोग, कार्मण काययोग

*प्रश्न ०३) द्रव्ययोग किसे कहते हैं?*
उत्तर : भावयोग रुप शक्ति से विशिष्ट आत्मप्रदेशों में जो कुछ हलन-चलन रूप परिस्पन्द होता है वह द्रव्य योग है।       *( गो.जी. २१६)*

*प्रश्न ०४) भावयोग किसे कहते हैं?*
उत्तर : पुद्‌गल विपाकी अंगोपांग नामकर्म और शरीर नामकर्म के उदय से मन, वचन और काय रुप से परिणत तथा कायवर्गणा, वचनवर्गणा,मनोवर्गणा का अवलम्बन करने वाले संसारी जीव के लोकमात्र प्रदेशों में रहने वाली जो शक्ति कर्मो को ग्रहण करने में कारण है वह भावयोग है।    *(गो.जी.२१६)*

*👉विपाकी* कर्मो का विशेष रुप से पक जाने को, उदय मे आने को विपाक कहते है। कर्मो के पक जाना मे विशेषता कषायों की तीव्रता, मन्दता से होता है। यह विपाक चार प्रकार का होता है–जीव विपाकी, पुदग्ल विपाकी, क्षेत्र विपाकी और भव विपाकी
*◆जीव विपाकी (७८)* जिस कर्म का उदय आने पर सीधा फल जीव को मिले, जीव के परिणामो के निमित्त पडे वे सभी जीव विपाकी प्रकृति है।*जैसे* मोहनीय के उदय का फल जीव को मिलता है।
सभी घतिकर्म की ४७ प्रकृति, गोत्रकर्म ०२, वेदनीय कर्म ०२ और नामकर्म २७*
*◆पुदग्ल विपाकी (६२)* जिन प्रकृतियो के उदय का फल शरीर आदि पुदग्ल के साथ होवे वे पुदग्ल विपाकी है। सभी प्रकृति नामकर्म मे ही होती है।
*जैसे* शरीर नामकर्म, बंधन नामकर्म, अंगोपांग नामकर्म आदि
*◆क्षेत्र विपाकी (०४)* जिसका प्रकृतियो का फल एक क्षेत्र विशेष होता है क्षेत्र विपाकी कहते है।इनका उदय विग्रहगति मे होता है। एक भव से दुसरे भव मे जाते हुए मिलता है। ये चार होती है–नरक गत्यानुपूर्वी, तिर्यंच गत्यानुपूर्वी, मनुष्य गत्यानुपूर्वी और देव गत्यानुपूर्वी 
*◆भव विपाकी (०४)* जिन प्रकृतियो के उदय का फल जीव के भव (आयु) अर्थात पर्याय विशेष मे फल देते है उसे भव विपाकी कहते है। ये चार होती है- नरकायु, तिर्यंचायु, मनुष्यायु, देवायु

*प्रश्न ०५) मनोयोग किसे कहते हैं?*
उत्तर : अभ्यन्तर में वीर्यान्तराय और नोन्द्रियावरण कर्म के क्षयोपशम रूप मनोलब्धि के सन्निकट होने पर और बाह्य निमित्त रूप मनोवर्गणा का अवलम्बन होने पर मनःपरिणाम के प्रति अभिमुख हुए आत्मा के प्रदेशों का जो परिस्पन्द होता है उसे मनोयोग कहते हैं।          *(रा. वा. ०६/१०)*
मनोवर्गणा से निष्पन्न हुए द्रव्य के आलम्बन से जो संकोच-विकोच होता है वह मनोयोग है।
*(धवला ०७/७६)*
मन की उत्पत्ति के लिए जो प्रयत्न होता है उसे मनोयोग कहते हैं। 

*प्रश्न ०६) वचनयोग किसे कहते हैं?*
उत्तर : भाषा वर्गणा सम्बन्धी पुद्‌गल स्कन्धों के अवलम्बन से जीव प्रदेशों का जो संकोच-विकोच होता है वह वचनयोग है।  *(धवला ०७/७६)*
शरीर नामकर्म के उदय से प्राप्त हुई वचन वर्गणाओं का अवलम्बन लेने पर तथा वीर्यान्तराय का क्षयोपशम और मति अक्षरादि (मतिज्ञान आदि) ज्ञानावरण के क्षयोपशम आदि से अभ्यंतर में वचन लब्धि का सान्निध्य होने पर वचन परिणाम के अभिमुख हुए आत्मा के प्रदेशों का जो परिस्पन्दन होता है वह वचनयोग कहलाता है। *(सर्वा. ६१०)*

*प्रश्न ०७) काययोग किसे कहते हैं?*
उत्तर : वीर्यान्तराय कर्म का क्षयोपशम होने पर औदारिक आदि सात प्रकार की कायवर्गणाओं में से किसी एक का उदय होने से जो आत्मा के प्रदेशो में परिस्पन्दन होता है, वह काययोग है 
*(सर्वा.सि. ०६/०१)*
 जो चतुर्विध शरीरों के अवलम्बन से जीवप्रदेशों का संकोच-विकोच होता है, वह काययोग है।
 *(धवला ०७/७६)*
वात, पित्त व कफ आदि के द्वारा उत्पन्न परिश्रम से जीव प्रदेशों का जो परिस्पन्द होता है वह काययोग कहा जाता है।    *(धवला १०/४३७)*

*प्रश्न ०८) योग मार्गणा कितने प्रकार की होती है?*
उत्तर : योग मार्गणा के अनुवाद की अपेक्षा मनोयोगी, वचनयोगी तथा काययोगी तथा अयोगी जीव होते हैं।  *(षट खण्डागम २७२/८०)*
अत: योग मार्गणा तीन प्रकार की होती है – मनोयोग, वचनयोग, काययोग । 
*औदारिक, वैक्रियिक, आहारक, कार्मण व तैजस शरीर के निमित्त से योग नहीं बनता है, इसलिए उसे ग्रहण नहीं किया है।*

*प्रश्न ०९) योगमार्गणा में द्रव्य योग को ग्रहण करना चाहिए या भावयोग को?*
उत्तर : योगमार्गणा में भावयोग को ही ग्रहण करना चाहिए। 
सूत्र में आये हुए ‘ इमानि’ पद से प्रत्यक्षीभूत भावमार्गणा स्थानों का ग्रहण करना चाहिए। द्रव्य मार्गणाओं का ग्रहण नहीं किया गया है, क्योंकि द्रव्य मार्गणाएँ देश, काल और स्वभाव की अपेक्षा दूरवर्ती हैं, अतएव अल्पज्ञानियों को उनका प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है । ( ध.१७/१३१)

*प्रश्न १०) योग क्षायोपशमिक है तो केवली भगवान के योग कैसे हो सकता है?*
उत्तर : वीर्यान्तराय और ज्ञानावरण कर्म के क्षय हो जाने पर भी सयोगकेवली के जो तीन प्रकार की वर्गणाओं की अपेक्षा आत्मप्रदेश पीरस्पन्दन होता है वह भी योग है, ऐसा जानना चाहिए *(सर्वा.६१०)*
सयोग केवली में योग के अभाव का प्रसग नहीं आता, योग में क्षायोपशमिक भाव तो उपचार से हैं । असल में तो योग औदयिक भाव ही है और औदयिक योग का सयोग केवली में अभाव मानने में विरोध आता है।   *(धवला ०७/७६)*
शरीर नामकर्म के उदय से उत्पन्न योग भी तो लेश्या माना गया है, क्योंकि वह भी कर्मबंध में निमित्त होता है। इस कारण कषाय के नष्ट हो जाने पर भी योग रहता है।   *(धवला ०७/१०५)*
*नोट* शरीर नामकर्म की उदीरणा व उदय से योग उत्पन्न होता है इसलिए योग मार्गणा औदयिक है।?(धवला ०९/३१६)* 

*प्रश्न ११) अयोग केवली (योग रहित जीव) कैसे होते हैं?*
उत्तर : जिन आत्माओं के पुण्य-पाप रूप प्रशस्त और अप्रशस्त कर्मबन्ध के कारण मन, वचन, काय की क्रिया रूप शुभ और अशुभ योग नहीं हैं वे आत्माएँ चरम गुणस्थानवर्ती अयोगकेवली और उसके अनन्तर गुणस्थानों से रहित सिद्ध पर्याय रूप परिणत मुक्त जीव होते हैं।   *(गो. जी. २४३)*) 
जो मन, वचन, काय वर्गणा के अवलम्बन से कर्मों के ग्रहण करने में कारण आत्मा के प्रदेशों का पीरस्पन्दन रूप जो योग है, उससे रहित चौदहवें गुणस्थानवर्ती अयोगी जिन होते हैं। 
*(बृ.द्र.स.टीका १३)*
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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*

गुरुवार, 10 जुलाई 2025

16. चौबीस ठाणा-त्रसकायिक व समुच्चय प्रश्न

16. चौबीस ठाणा-त्रसकायिक व समुच्चय प्रश्न*
https://youtu.be/peMV_pkYUOs?si=eRg8l4CQApeQqfkN

*२४ स्थान त्रसकायिक*
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 *०१) गति      ०४/०४*   
नरक, तिर्यंच, मनुष्य और देवगति
*०२) इन्द्रिय    ०४/०५*   
द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, पंचेन्द्रिय
*०३) काय      ०१/०६*  त्रसकाय
*०४) योग       १५/१५*  सभी
*०५) वेद         ०३/०३*  तीनों
*०६) कषाय     २५/२५* कषाय १६ नोकषाय ०९
*०७) ज्ञान        ०८/०८* आठो ज्ञान
*०८) संयम      ०७/०७*  सातो संयम
*०९) दर्शन      ०४/०४*  चारो दर्शन
चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन, अवधिदर्शन, केवलदर्शन
*१०) लेश्या      ०६/०६*  छहो लेश्या
कृष्ण, नील, कापोत, पीत, पदम और शुक्ल
*११) भव्यक्त्व   ०२/०२*  भव्य और अभव्य
*१२) सम्यक्त्व   ०६/०६*  छहो
मिथ्यात्त्व, सासादन, मिश्र, औपशमिक, क्षायिक, क्षयोपशमिक सम्यक्त्व
*१३) संज्ञी         ०२/०२*  संज्ञी, असंज्ञी
*१४) आहारक   ०२/०२*  आहारक ,अनाहारक
*१५) गुणस्थान   १४/१४*  सभी चौदह गुणस्थान
*१६) जीवसमास  ०५/१९*  पाँच
द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, असैनी पंचेन्द्रिय, सैनी पंचेन्द्रिय
*१७) पर्याप्ति       ०६/०६*  छहो
आहार,शरीर,इन्द्रिय,श्वासोच्छवा,भाषा,मनःपर्याप्ति
*१८) प्राण           १०/१०*  दसो प्राण
*१९) संज्ञा           ०४/०४*  सभी संज्ञा
आहार संज्ञा, भय संज्ञा, मैथुन संज्ञा, परिग्रह संज्ञा।
*२०) उपयोग      १२/१२*  सभी बारह
*२१) ध्यान         १६/१६*  सभी सोलह
*२२) आस्रव       ५७/५७*  
मिथ्यात्व ०५, अविरति १२, कषाय २५, योग १५
*२३) जाति   ३२ लाख/८४ लाख*  
*२४) कुल–१३२.५ लाख करोड/१९९.५ लाख करोड* 
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✍️ त्रस जीव के प्रकार :-
त्रस जीव दो प्रकार के हैं-  विकलेन्द्रिय, सकलेन्द्रिय
*∆ विकलेन्द्रिय* द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय तथा चतुरिन्द्रिय जीवों को विकलेन्द्रिय जीव जानना चाहिए ।
*∆ सकलेन्द्रिय* सिंह आदि थलचर, मच्छादि जलचर, हँस आदि आकाशचर तिर्यंच, देव, नारकी, मनुष्य ये सब पंचेन्द्रिय जीव हैं  *(मूलाचार २१८/११ आ.)*
*अथवा* त्रस जीव पर्याप्त तथा अपर्याप्त के भेद से भी दो प्रकार के हैं। *(धवला १२/३७१)* 
*त्रस जीव चार प्रकार के हैं* द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, पंचेन्द्रिय।   *(नयचक्र १२२)*

*प्रश्न ३०) ऐसे कौनसे त्रस जीव हैं जिनके औदारिक काययोग नहीं होता है?*
उत्तर:  वे त्रस जीव जिनके औदारिक काययोग नहीं होता है-
*०१)* विग्रहगति, निर्वृत्यपर्याप्त, लब्ध्यपर्याप्तक अवस्था में स्थित त्रस जीव के नही है।
औदारिक काययोग पर्याप्तक होने पर ही शुरु होता है, निर्वृत्यपर्याप्तक मे भी नही होता, क्याकि शरीर पर्याप्ति पूर्ण होने पर ही औदारिक काययोग होता है। लब्ध्यपर्याप्तक के तो एक भी पर्याप्ति पूर्ण नही होती है।
*०२)* चौदहवें गुणस्थान वाले अयोग केवली भगवान के भी कोई योग ही नहीं होता है।
*०३)* देव-नारकी के भी औदारिक काययोग नही होता क्योकी इनके वैक्रियक काययोग होता है।
*०४)* एक समय में एक जीव के एक ही योग होता है इसलिए किसी भी योग के साथ कोई भी योग नहीं होता है।

*प्रश्न ३१) क्या ऐसे कोई त्रस जीव हैं जिनके वेद का अभाव हो गया हो?*
उत्तर: हाँ है, नवम गुणस्थान की अवेद अवस्था से लेकर चौदहवें गुणस्थान तक स्थित त्रस जीवों के वेद का अभाव हो जाता है।

*प्रश्न ३२) त्रस जीवों की निर्वृत्यपर्याप्त अवस्था मे कितने प्राण होते हैं?*
उत्तर: त्रस जीवों की निर्वृत्यपर्याप्त अवस्था में कम- से -कम ०३ प्राण, (स्पर्श इन्द्रिय, कायबल और आयु) अधिक से अधिक सात प्राण होते है जिसमे इन्द्रिय बढती जाती है।
★समुद्धात केवली के दो प्राण–कायबल, आयुप्राण
★त्रस जीवो की पर्याप्तक अवस्था मे कम से कम एक आयु प्राण होता है अयोग केवली गुणस्थान है।

*प्रश्न ३३) क्या ऐसे कोई त्रस जीव हैं जिनके संज्ञाएँ नहीं होती हैं?*
उत्तर: हाँ है, ग्यारहवें गुणस्थान से लेकर चौदहवें गुणस्थान तक के त्रस जीवों के आहारादि कोई संज्ञाएँ नहीं होती हैं।   *(गोम्मटसार जीवकाण्ड जीवतत्व ७०२)*

*प्रश्न ३४) क्या ऐसा कोई त्रस जीव है, जिसके जीवन में सभी उपयोग हो जाते हो?*
उत्तर :हाँ, किसी एक तद्‌भव मोक्षगामी मनुष्य के अपने जीवनकाल में सभी उपयोग हो सकते हैं, अन्य किसी जीव के नहीं हो सकते ।
किसी मनुष्य के मिथ्यात्व सहित जन्म लेने पर कुमति और कुश्रुतज्ञानो होगा तथा चक्षु और अचक्षु दर्शनोपयोग सभी मनुष्यों के होते ही हैं। 
मिथ्यात्व अवस्था मे अवधिज्ञान भी हो सकता जिससे उसके कुवधिज्ञानोपयोग हो सकता है।
इस जीव के बाद मे सम्यक्त्व हो जाए तो उसके तीनो मिथ्यात्व सम्यक्त्व मे बदल जाएगे–मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञानोपयोग तथा अवधिज्ञान होने पर उसके अवधिदर्शनापयोग भी हो जाता है।बाद में दिक्षा लेने पर मनःपर्यय ज्ञान भी हो सकता है।उसके बाद वह जीव केवलज्ञान भी प्राप्त कर सकता हैं। केवलज्ञान के साथ-साथ केवलदर्शनोपयोग भी हो जाता हैं।
इस प्रकार से एक जीव को एक ही भव मे सभी बारह उपयोग हो सकते है।
यह स्थिति मनुष्यगति जीव को पहले गुणस्थान से तेरहवे (०१–१३) गुणस्थान तक घटित होते है।
*नोट* कुमति, कुश्रुत, कुअवधिज्ञानो सम्यक्त्व प्राप्त होने के बाद भी हो सकते हैं, अगर वह सम्यक्त्व के बाद मिथ्यात्व मे आ जाए।

*प्रश्न ३५) त्रस जीवों के कम- से-कम कितने आस्रव के प्रत्यय होते हैं।?*
उत्तर: त्रस जीवों के कम-से-कम सात आस्रव के प्रत्यय होते हैं। ये तेरहवें गुणस्थान में होते हैं।
मनोयोग ०२ (सत्य-अनुभय), वचनयोग ०२ (सत्य अनुभय), औदारिक काययोग, औदारिक मिश्र काययोग, कार्मण काययोग।
सूक्ष्मदृष्टि से देखा जाय तो मनोयोग और वचनयोग का निरोध हो जाने पर (उस अवस्था में स्थित सभी जीवों के) मात्र एक औदारिक काययोग ही आस्रव का कारण बचता है। इस अपेक्षा त्रस जीवों के कम- से-कम एक आस्रव प्रत्यय होता है। 
अयोगी भगवान भी त्रसकाय हैं, उनके एक भी आस्रव का प्रत्यय शेष नहीं है ।

*प्रश्न ३६) क्या सभी त्रस जीवों के ५७ आस्रव के प्रत्यय हो सकते हैं?*
उत्तर: नहीं हो सकते, नाना जीवों की अपेक्षा त्रस जीवों के कुल सत्तावन आस्रव के प्रत्यय होते हैं–

सत्य मनो-वचन, असत्य वचन– संज्ञीपंचेन्द्रिय के
०२-१३ गुणस्थान तक
असत्य उभय मन-वचन–          संज्ञीपंचेन्द्रिय के
०२-१२ गुणस्थान तक
अनुभय वचन योग –          द्वीन्द्रिय से पंचेन्द्रिय के
०१–१३ गुणस्थान तक
औदारिकद्विक काययोग –      मनुष्य व तिर्यंचो के 
०१ से १३ गुणस्थान तक
वैक्रियिकद्विक काययोग –     देव व नारकियों के
आहारकद्विक काययोग –छठे गुणस्थानवर्ती मुनी के
कार्मणकाययोग –           चारो गतियो मे
स्त्रीवेद पुरुषवेद –देव, मनुष्य, पंचेन्द्रिय तिर्यंचो के
०५ मिथ्यात्व, २३ कषाय –मिथ्यादृष्टि विकलत्रय के
१२ अविरति–       मात्र संज्ञी पंचेन्द्रि के ही होती हैं
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एकेन्द्रिय़ के ०७ अविरति, द्वीन्द्रिय के ०८ अविरति, त्रीन्द्रिय के ०९ अविरति,चतुरिन्द्रिय के १० अविरति, असैनी पंचेन्द्रिय जीव के ११ अविरति होती हैं।

*प्रश्न ३७) त्रस जीवों की ३२ लाख जातियों कौन- कौन सी हैं?*
उत्तर: त्रस जीवों की बैत्तीस(३२) लाख जातियाँ है-
द्वीन्द्रिय की    ०२ लाख,  त्रीन्द्रिय की ०२ लाख
चतुरिन्द्रिय की ०२ लाख, पंचेन्द्रिय तिर्यंच ०४ लाख
नारकियों की   ०४ लाख, देवों की  ०४ लाख,
मनुष्य की १४ लाख जातियाँ है।

*प्रश्न ३८) त्रस जीवों के १३२.५ लाख करोड़ कुल कौन-कौन से हैं?*
उत्तर : त्रस जीवों के १३२.५  लाख करोड कुल-
द्वीन्द्रियों के –०७ लाख करोड़ कुल
त्रीन्द्रियोंके के– ०८ लाख करोड कुल
चतुरिन्द्रिय के –०९ लाख करोड़ कुल
नारकियों के –  २५ लाख करोड़ कुल
देवों के –         २६ लाख करोड कुल  
मनुष्यों के –     १४ लाख करोड़ कुल
*पंचेन्द्रिय तिर्यंच मे–*
जलचरों के १२.५ लाख करोड़ कुल
थलचरों के १९ लाख करोड़ कुल
नभचरों के १२ लाख करोड़ कुल
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*– समुच्चय प्रश्नोत्तर –*
*प्रश्न ३९) ऐसी कौनसी कषायें हैं जो त्रस्र जीवों के तो होती हैं लेकिन स्थावर जीवों के नहीं होती हैं?*
उत्तर :मात्र दो कषायें ऐसी हैं जो त्रस जीवों के होती हैं लेकिन स्थावर जीवों के नहीं होती- स्त्रीवेद और पुरुषवेद नोकषाय।

*प्रश्न ४०) ऐसी कौनसी अविरति हैं जो त्रस तथा स्थावर दोनों के होती हैं?*
उत्तर : सात (०७) अविरतियाँ त्रस तथा स्थावर दोनों जीवों के होती हैं- षट्‌काय जीवो की हिंसा सम्बन्धी तथा स्पर्शन इन्द्रिय सम्बन्धी अविरति

*प्रश्न ४१) चौबीस स्थानों में से ऐसे कौन से स्थान हैं जिनके सभी उत्तरभेद त्रसों में पाये जाते है?*
उत्तर :चौबीस स्थानों में से १९ स्थान ऐसे हैं जिनके सभी उत्तर भेद त्रसों में पाये जाते हैं- 
०१) गति, ०२) योग, ०३) वेद, ०४) कषाय, ०५) ज्ञान, ०६) संयम, ०७) दर्शन, ०८) लेश्या, ०९) भव्य, १०) सम्यक्त्व, ११) संज्ञी, १२) आहारक, १३) गुणस्थान, १४) पर्याप्ति, १५) प्राण, १६) सज्ञा, १७) उपयोग, १८) ध्यान, १९) आसव के प्रत्यय

*जो मात्र त्रसो मे नही है स्थावरो मे है उनमे–*
*०१) इन्द्रिय* यहा एकेन्द्रिय भेद त्रसो मे नही पाया जाता स्थावरो मे होता है।
*०२) काय* स्थावर काय त्रसो मे नही होती, एकेन्द्रिय मे होती है।
*०३) जीव समास* के १९ भेदो मे से १४ भेद ऐकेन्द्रियो मे होते है।
*०४) जाति* के सभी भेदो के लिए ऐकेन्द्रियो में (स्थावरो मे) जाना पडेगा।
*०५) कुल* के सभी भेदो के लिए ऐकेन्द्रियो में (स्थावरो मे) जाना पडेगा।

*प्रश्न ४२) स्थावर जीवों में किस- किस स्थान के सभी उत्तर भेद नहीं पाये जाते हैं?*
उत्तर :स्थावर जीवों में इक्कीस(२१)स्थानों के सभी उत्तर भेद नहीं पाये जाते हैं- भव्य, आहारक, संज्ञा इन तीन स्थानों को छोड्‌कर शेष सभी स्थानों के सभी उत्तर भेद स्थावर जीवों में नहीं पाये जाते हैं अर्थात् गति, इन्द्रिय, काय, योग, वेद, कषाय, ज्ञान, संयम, दर्शन, लेश्या, सम्यक्त्व, संज्ञी, गुणस्थान, जीवसमास, पर्याप्ति, प्राण, उपयोग, ध्यान, आस्रव के प्रत्यय, जाति तथा कुल इन २१ स्थानों के सभी उत्तर भेद नहीं होते हैं।
*०१) भव्य* के दोनो भेद भव्य और अभव्य स्थावरो मे होते है।
*०२) आहारक* के दोनो भेद आहारक अनाहारक स्थावरो मे भी होते है, क्योकी स्थावरो मे भी विग्रहगति होती है, और विग्रहगति के समय जीव अनाहारक रहता है।
*०३) संज्ञा* स्थावरो मे संज्ञा के चारो भेद होते है।
ये तीन स्थान ऐसे है जिनके सभी भेद स्थावरो मे पाये जाते है बाकी जो इक्कीस (२१) भेदो है उनके सभी भेद स्थावरो मे नही पाए जाते
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*०१) गति* चारो गति मे से स्थावरो मे केवल तिर्यंच गति होती है।
*०२) इन्द्रिय* के पाँच भेदो मे से स्थावरो मे केवल स्पर्शन इन्द्रिय होती है।
*०३) काय* के छह भेदो मे से केवल पाँच भेद स्थावरो में पाए जाते है, त्रसो मे नही।
*०४) योग* १५ भेदो मे से स्थावरो में तीन भेद है
*०५) वेद* तीन भेदो मे से स्थावरो मे नपुंसक वेद है
*०६) कषाय* २५ भेद मे से २३ भेद ही स्थावरों मे है। स्त्रीवेद और पुरुषवेद नोकषाय नही होती है।
*०७) ज्ञान* आठ ज्ञानो मे से स्थावरो मे कुमति और कुश्रुत ज्ञान दो हीं भेद होते है।
*०८) संयम* सात भेदो मे से स्थावरो मे असंयम है।
*०९) दर्शन* चार भेदो मे से स्थावरो मे एक अचक्षुदर्शन होता है।
*१०) लेश्या* छ्ह भेदो में से स्थावरो मे तीन अशुभ लेश्या कृष्ण-नील-कापत लेश्या होती है।
*११) सम्यक्त्व* सात सम्यक्त्व मे से स्थावरो मे मिथ्यात्व और सासादन सम्यक्त्व होता है।
*१२) संज्ञी* दो भेदो मे से स्थावर असंज्ञी होते है।
*१३) गुणस्थान* चौदह भेदो मे से स्थावरो के मिथ्यात्व और सासादन गुणस्थान होता है।
*१४) जीवसमास* उन्नीस मे से चौदह जीवसमास स्थावरो में होते है 
*१५) पर्याप्ति* छह पर्याप्ति मे से स्थावरो में चार पर्याप्ति होती है।
*१६) प्राण* दस प्राण मे से स्थावरो के चार होते है।
*१७) उपयोग* बारह मे से तीन उपयोग स्थावरो मे होते है।
*१८) ध्यान* सोलाह भेदो मे से स्थावरो मे आठ ध्यान होते है-आर्त ०४, रौद्र ०४
*१९) आस्रव के प्रत्यय* ५७ प्रत्यय मे से स्थावरो मे ३८ प्रत्यय होते है।
*२०) जाति* ८४ लाख मे से स्थावरो मे ५२ लाख जाति है।
*२१) कुल* स्थावरो मे ६७ लाख करोड कुल है।

*प्रश्न ४३) ऐसे कौन- कौनसे उत्तर भेद हैं जो त्रसों में होते हैं लेकिन स्थावरों में नहीं होते हैं?*
उत्तर: २१ स्थान ऐसे है जो त्रसों में होते हैं लेकिन स्थावरों में नहीं होते हैं-
*०१)* गतियाँ ०३* नरक, मनुष्य, देव
*०२)* इंद्रियाँ ०४* दो, तीन, चार, पाँच इन्द्रि
*०३)* काय ०१*   त्रसकाय
*०४)* योग १२*    मन०४ वचन ०४ काय ०४
*०५)* वेद ०२*     स्त्रीवेद, पुरुषवेद
*०६)* कषाय ०२*  स्त्रीवेद, पुरुषवेद नोकषाय
*०७)* ज्ञान ०६*     ज्ञान ०५ कुज्ञान ०१
*०८)* सयंम ०६* असंयम को छोडकर बाकी छहो
*०९)* दर्शन ०३* चक्षु, अवधि, केवलदर्शन
*१०)* लेश्या ०३* तीन लेश्या–पीत-पदम-शुक्ल
*११)* सम्यक्त्व ०४* 
मिथ्यात्व-सासादन को छोडकर बाकी चार
*१२)* संज्ञी ०१*  संज्ञी जीव ये स्थावरो मे नही
*१३)* ग़ुणस्थान १२* 
मिथ्यात्व सासादन के अलावा बाकी १२ गुणस्थान
*१४)* जीवसमास ०५* स्थावरो मे नही है
*१५)* पर्याप्ति ०२* भाषा और मनपर्याप्ति
*१६)* प्राण०२* भाषा और मनःपर्याप्ति
*१७)* उपयोग ०९* 
ज्ञानोपयोग ०६, दर्शनापयोग ०३
*१८)* ध्यान ०८* धर्मध्यान ०४, शुक्लध्यान ०४
*१९)* आस्रव १९* अविरति ०५, वेद ०२, योग १२
*२०)* जाति ३२ लाख  त्रस मे है
*२१)* १३२.५ लाख करोड त्रस मे है स्थावरो मे नही    *ये सभी त्रस मे होते है स्थावरो मे नही*

*प्रश्न ४४) त्रस काय की जाति एवं पंचेन्द्रिय की जाति में क्या अन्तर है?*
उत्तर: त्रस काय की जातियों से पंचेन्द्रिय जीवों में ०६ लाख जातियों का अन्तर है। 
अर्थात् त्रसकाय में ३२ लाख जातियाँ हैं तथा पंचेन्द्रिय जीवों की मात्र २६ लाख जातियाँ हैं। 
त्रस जीवों में विकलत्रय की जातियाँ भी होती हैं, पंचेन्द्रियों में नहीं ।

*प्रश्न ४५) किस काय वाले के सबसे ज्यादा कुल होते हैं?*
उत्तर: त्रसकायिक जीवों के कुल सबसे ज्यादा हैं क्योंकि उनमें द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, देव, नारकी, मनुष्य तथा पंचेन्द्रिय तिर्यंच सबके कुलों का ग्रहण होता है। 
स्थावरकाय में केवल एकेन्द्रिय जीवों के कुलों का ही ग्रहण होता है। त्रसों के १३२.५ लाख करोड़ तथा पृथ्वीकायिकादि पाँचो स्थावरो के ६७ लाख करोड कुल होते है।

*प्रश्न ४६) जलकायिक के कुल के बराबर कुल कौन सी कायवालों के होते हैं?*
उत्तर: जलकायिक के कुल के बराबर वायुकायिक के कुल के होते है। दोनों में प्रत्येक के ०७ लाख करोड़ कुल होते हैं ।
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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*

37. कषाय मार्गणा - संज्वलन क्रोध मान माया में चौबीस ठाणा

37. कषाय मार्गणा - संज्वलन क्रोध मान माया में चौबीस ठाणा* https://youtu.be/ZHJN-2cfr-A?si=Npk8VDvtFyYEHuaM 🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴 संयम के साथ ...