गुरुवार, 2 अप्रैल 2026

35. अप्रत्याख्यानावरण चतुष्क मे चौबीस ठाणा

*✍️ अप्रत्याख्यानावरण चतुष्क में २४ स्थान*
*✍️ अप्रत्याख्यानावरण चतुष्क में २४ स्थान*
🕳️🕳️🕳️🕳️🕳️🕳️
*०१) गति       ०४/०४*   चारो गति में
*०२) इन्द्रिय    ०१/०५*   पंचेन्द्रिय जीवो के
*०३) काय       ०१/०६*  त्रसकाय
*०४) योग       १३/१५* (आहारकद्विक नही होता)
*०५) वेद         ०३/०३*  तीनो वेद
*०६) कषाय     १०/२५*  
अप्रत्याख्यानावरण स्वकीय तथा नौ नोकषाय
*०७) ज्ञान         ०३/०८*  
मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान
*०८) संयम       ०१/०७*  असंयम
*०९) दर्शन       ०३/०४*  चक्षु, अचक्षु, अवधि
*१०) लेश्या       ०६/०६*  सभी लेश्या 
कृष्ण, नील, कापोत, पीत, पदम और शुक्ल लेश्या।
*११) भव्यक्त्व   ०१/०२*  भव्य 
*१२) सम्यक्त्व   ०४/०६*  
औपशमिक, क्षायिक, क्षायोपशमिक, मिश्र 
*१३) संज्ञी         ०१/०२*  संज्ञी 
*१४) आहारक   ०२/०२*  आहारक, अनाहारक
ये चतुर्थ गुणस्थान वाले विग्रहगति मे भी जाते है
*१५) गुणस्थान   ०२/१४*  मिश्र, अविरत
*१६) जीवसमास  ०१/१९* सैनी पंचेन्द्रिय
*१७) पर्याप्ति      ०६/०६*  छहो पर्याप्तियाँ
आहार, शरीर, इन्द्रिय,श्वासोच्छ, भाषा,मन:पर्याप्ति
*१८) प्राण           १०/१०*   दसो प्राण
*इन्द्रिय ०५* स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और कर्ण
*बल ०३* कायबल, वचन बल और मनोबल प्राण
आयु प्राण और श्वासोच्छवास प्राण
*१९) संज्ञा         ०४/०४*  सभी संज्ञा
आहार संज्ञा, भय संज्ञा, मैथुन संज्ञा, परिग्रह संज्ञा।
*२०) उपयोग      ०६/१२*  
*ज्ञानोपयोग ०३* मति, श्रुत, अवधिज्ञानोपयोग
*दर्शनोपयोग ०३* चक्षु, अचक्षु, अवधिदर्शनोपयोग
*२१) ध्यान         १०/१६*  
*आर्त* इष्टवियोगज,अनिष्टसंयोगज,वेदना,निदान
*रौद* हिंसानन्दी,मृषानन्दी,चौर्यानन्दी,परिग्रहानन्दी
*धर्मध्यान* आज्ञाविचय, अपायविचय
*२२) आस्रव       ३५/५७*  
*अविरति १२* ०५ इन्द्रिय और मन को वश में नही करने तथा षट्काय के जीवों की रक्षा नहीं करना
*कषाय १०* ०१ स्वकीय कषाय, ०९ नोकषाय
*योग १३* मनोयोग०४, वचनयोग०४, काययोग ०५ 
*२३) जाति   २६ लाख/८४ लाख* 
चारो गति के पंचेन्द्रिय संबंधी जाति
*२४) कुल– १०८.५ ला.क / १९९.५ ला.क.* 
चारो गति के पंचेन्द्रिय संबंधी कुल 
🇬🇦🇬🇦🇬🇦🇬🇦🇬🇦🇬🇦🇬🇦🇬🇦🇬🇦🇬🇦🇬🇦

*प्रश्न २८) अप्रत्याख्यानावरण कषाय किसे कहते हैं?*
उत्तर : अ=नही, प्रत्याख्यान=त्याग, आवरण=किंचित त्याग भी नही होने दे, त्याग पर आवरण डाले वह अप्रत्याख्यानावरण कषाय है।
◆ जिसके उदय से यह प्राणी ईषत (न्यून) भी देशविरत (संयमासंयम) नामक व्रत को स्वीकार नही कर सकता है, स्वल्प मात्र भी व्रत धारण नहीं कर सकता है वह देशविरत प्रत्याख्यान का आवरण करने वाली अप्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया और लोभ कषाय है। *(रा.वा. ०८/०९)*
जो देशसंयम को अल्प मात्र भी न होने  उसे अप्रत्याख्यानावरण क्रोधादि कषाय कहते हैं। 
*(गो. क. जी. १३३)*

*प्रश्न २९) अप्रत्याख्यानावरण क्रोधादि को किसकी उपमा दी गई है?*
उत्तर :अप्रत्याख्यानावरण क्रोध =पृथ्वी रेखा सदृश
अप्रत्याख्यानावरण मान = हड्डी के समान, अस्थि स्तम्भ सदृश।
अप्रत्याख्यानावरण माया =बकरी के सींग या मेंढ़े के सींग सदृश।
अप्रत्याख्यानावरण लोभ = नील रंग/अक्षमल या कज्जल सदृश। *(ज.ध.१२/१५३-१५५ वं.चा.)*

*प्रश्न ३०) पृथ्वीरेखा सदृश क्रोध किसे कहते हैं?*
उत्तर : यह क्रोध पूर्व क्रोध (नगराजि सदृश क्रोध) (न=नही, ग=गमन करे, जो गमन ना करे यानि पर्वत, राजी=श्रद्धला यानि पर्वतो की कतार) से मन्द अनुभाग वाला है, क्योंकि चिरकाल तक अवस्थित होने पर भी इसका पुनः दूसरे उपाय से सन्धान (जुड़ना) हो जाता है। यथा ग्रीष्म काल में पृथिवी का भेद हुआ (गाड़ी गड़ार/दरार बन गई) पुनः वर्षा काल में जल के प्रवाह से वह दरार भरकर उसी समय संधान को प्राप्त हो गई। इसी प्रकार जो क्रोध परिणाम चिरकाल तक अवस्थित रहकर भी पुनः दूसरे कारण से तथा गुरु के उपदेश आदि से उपशम भाव को प्राप्त होता है वह इस प्रकार का तीव्र परिणाम भेद पृथिवी रेखा सदृश है। 
*(ज.ध. १२/१५३)*
ये संस्कार काफी समय बीतने पर अथवा शास्त्र रूपी जल वृष्टि से चित्त स्नेहार्द्र हो जाने पर उपशम को प्राप्त हो जाता है। *(व.चा. ४/६७)*

*प्रश्न ३१)अस्थिस्तम्भ सदृश मान किसे कहते है?*
उत्तर : पुराण पुरुष कहते हैं कि दूसरे मान का उदय आत्मा में हड्डी के समान कर्कशता ला देता है, परिणाम यह होता है कि जब जीव ज्ञान रूपी आग में काफी तपाया जाता है तो उसमें कुछ-कुछ विनम्रता आ ही जाती है। *(व.चा. ४/७१)*

*प्रश्न ३२) मेढ़े के सींग सदृश माया किसे कहते हैं?*
उत्तर : इस माया का आत्मा पर पड़ने वाला संस्कार मेढ़े के सींग के समान गुड़ीदार होता है फलतः इस कषाय से आक्रान्त व्यक्ति मन में कुछ सोचता है और जो करता है वह इससे बिल्कुल भिन्न होता है। *(व.चा. ४/७५)*

*प्रश्न ३३) अक्षमल सदृश लोभ किसे कहते हैं?*
उत्तर : अक्ष (रथ का चक्का) का मल अक्षमल है। अक्षांजन के स्नेह से गीला हुआ मषीमल अति चिक्कण होने से उस अक्षमल को सुखपूर्वक दूर करना शक्य नहीं है। उसी प्रकार यह लोभ परिणाम भी  "निधत्त स्वरूप"  होने से जीव के हृदय में अवगाढ़ होता है इसलिए उसे दूर करना शक्य नहीं है। 
*(ज.ध. १२/१५६)* 
जैसे ही जीव अपने आपको ज्ञान रूपी जल में धोता है वैसे ही आत्मा तुरन्त शुचि और स्वच्छ हो जाता है। *(व.चा. ४/७९)*

*प्रश्न ३४) अप्रत्याख्यानावरण कषाय वाले क्षायिक सम्यग्दृष्टि के कितने उपयोग हो सकते हैं?*
उत्तर : अप्रत्याख्यानावरण कषाय वाले क्षायिक सम्यग्दृष्टि के छह (०६) उपयोग हो सकते हैं -
*०३ ज्ञानोपयोग* मति, श्रुत, अवधिज्ञानोपयोग।
*०३ दर्शनोपयोग* चक्षु, अचक्षु, अवधिदर्शनोपयोग

*प्रश्न ३५) अप्रत्याख्यानावरण कषाय वाले कार्मण काययोगी के कितने आस्रव प्रत्यय हो सकते हैं ?*
उत्तर : कार्मण काययोग में स्थित अप्रत्याख्यानावरण कषाय वाले के बाईस (२२) आस्रव के प्रत्यय होते हैं -
९ कषाय = ८ नोकषाय (स्त्री वेद बिना), १ स्वकीय अर्थात् क्रोधादि में से एक 
०१ योग = कार्मण काययोग
१२ अविरति = छहकाय व पांच इन्द्रिय और मन के संबंधी अविरति

*प्रश्न ३६) अप्रत्याख्यानावरण कषाय वाले व्यंतर देव के कितने आस्रव के प्रत्यय होते हैं?*
उत्तर : अप्रत्याख्यानावरण कषाय वाले व्यंतरदेव के उनतीस २९ आस्रव के प्रत्यय होते हैं -
१२ अविरति =
०८ कषाय - ०७ नोकषाय (देव है इसलिए स्त्रीवेद नहीं है) तथा ०१ स्वकीय कषाय है।
०९ योग - (०४ मनोयोग, ०४ वचनयोग, वैक्रियिक काययोग)    *(१२+८+९ = २९ आस्रव प्रत्यय)*
(यहा मिथ्यात्व को नही लिया है क्योकि यह सम्यग्दर्शन वाला जीव है)
*नोट* स्वकीय कषाय के साथ प्रत्याख्यानावरण तथा संज्वलन क्रोधादि को भी ग्रहण करने पर आस्रव के दो प्रत्यय और हो जाते हैं।
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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*

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*०१) गति       ०४/०४*   चारो गति में
*०२) इन्द्रिय    ०१/०५*   पंचेन्द्रिय जीवो के
*०३) काय       ०१/०६*  त्रसकाय
*०४) योग       १३/१५* (आहारकद्विक नही होता)
*०५) वेद         ०३/०३*  तीनो वेद
*०६) कषाय     १०/२५*  
अप्रत्याख्यानावरण स्वकीय तथा नौ नोकषाय
*०७) ज्ञान         ०३/०८*  
मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान
*०८) संयम       ०१/०७*  असंयम
*०९) दर्शन       ०३/०४*  चक्षु, अचक्षु, अवधि
*१०) लेश्या       ०६/०६*  सभी लेश्या 
कृष्ण, नील, कापोत, पीत, पदम और शुक्ल लेश्या।
*११) भव्यक्त्व   ०१/०२*  भव्य 
*१२) सम्यक्त्व   ०४/०६*  
औपशमिक, क्षायिक, क्षायोपशमिक, मिश्र 
*१३) संज्ञी         ०१/०२*  संज्ञी 
*१४) आहारक   ०२/०२*  आहारक, अनाहारक
ये चतुर्थ गुणस्थान वाले विग्रहगति मे भी जाते है
*१५) गुणस्थान   ०२/१४*  मिश्र, अविरत
*१६) जीवसमास  ०१/१९* सैनी पंचेन्द्रिय
*१७) पर्याप्ति      ०६/०६*  छहो पर्याप्तियाँ
आहार, शरीर, इन्द्रिय,श्वासोच्छ, भाषा,मन:पर्याप्ति
*१८) प्राण           १०/१०*   दसो प्राण
*इन्द्रिय ०५* स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और कर्ण
*बल ०३* कायबल, वचन बल और मनोबल प्राण
आयु प्राण और श्वासोच्छवास प्राण
*१९) संज्ञा         ०४/०४*  सभी संज्ञा
आहार संज्ञा, भय संज्ञा, मैथुन संज्ञा, परिग्रह संज्ञा।
*२०) उपयोग      ०६/१२*  
*ज्ञानोपयोग ०३* मति, श्रुत, अवधिज्ञानोपयोग
*दर्शनोपयोग ०३* चक्षु, अचक्षु, अवधिदर्शनोपयोग
*२१) ध्यान         १०/१६*  
*आर्त* इष्टवियोगज,अनिष्टसंयोगज,वेदना,निदान
*रौद* हिंसानन्दी,मृषानन्दी,चौर्यानन्दी,परिग्रहानन्दी
*धर्मध्यान* आज्ञाविचय, अपायविचय
*२२) आस्रव       ३५/५७*  
*अविरति १२* ०५ इन्द्रिय और मन को वश में नही करने तथा षट्काय के जीवों की रक्षा नहीं करना
*कषाय १०* ०१ स्वकीय कषाय, ०९ नोकषाय
*योग १३* मनोयोग०४, वचनयोग०४, काययोग ०५ 
*२३) जाति   २६ लाख/८४ लाख* 
चारो गति के पंचेन्द्रिय संबंधी जाति
*२४) कुल– १०८.५ ला.क / १९९.५ ला.क.* 
चारो गति के पंचेन्द्रिय संबंधी कुल 
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*प्रश्न २८) अप्रत्याख्यानावरण कषाय किसे कहते हैं?*
उत्तर : अ=नही, प्रत्याख्यान=त्याग, आवरण=किंचित त्याग भी नही होने दे, त्याग पर आवरण डाले वह अप्रत्याख्यानावरण कषाय है।
◆ जिसके उदय से यह प्राणी ईषत (न्यून) भी देशविरत (संयमासंयम) नामक व्रत को स्वीकार नही कर सकता है, स्वल्प मात्र भी व्रत धारण नहीं कर सकता है वह देशविरत प्रत्याख्यान का आवरण करने वाली अप्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया और लोभ कषाय है। *(रा.वा. ०८/०९)*
जो देशसंयम को अल्प मात्र भी न होने  उसे अप्रत्याख्यानावरण क्रोधादि कषाय कहते हैं। 
*(गो. क. जी. १३३)*

*प्रश्न २९) अप्रत्याख्यानावरण क्रोधादि को किसकी उपमा दी गई है?*
उत्तर :अप्रत्याख्यानावरण क्रोध =पृथ्वी रेखा सदृश
अप्रत्याख्यानावरण मान = हड्डी के समान, अस्थि स्तम्भ सदृश।
अप्रत्याख्यानावरण माया =बकरी के सींग या मेंढ़े के सींग सदृश।
अप्रत्याख्यानावरण लोभ = नील रंग/अक्षमल या कज्जल सदृश। *(ज.ध.१२/१५३-१५५ वं.चा.)*

*प्रश्न ३०) पृथ्वीरेखा सदृश क्रोध किसे कहते हैं?*
उत्तर : यह क्रोध पूर्व क्रोध (नगराजि सदृश क्रोध) (न=नही, ग=गमन करे, जो गमन ना करे यानि पर्वत, राजी=श्रद्धला यानि पर्वतो की कतार) से मन्द अनुभाग वाला है, क्योंकि चिरकाल तक अवस्थित होने पर भी इसका पुनः दूसरे उपाय से सन्धान (जुड़ना) हो जाता है। यथा ग्रीष्म काल में पृथिवी का भेद हुआ (गाड़ी गड़ार/दरार बन गई) पुनः वर्षा काल में जल के प्रवाह से वह दरार भरकर उसी समय संधान को प्राप्त हो गई। इसी प्रकार जो क्रोध परिणाम चिरकाल तक अवस्थित रहकर भी पुनः दूसरे कारण से तथा गुरु के उपदेश आदि से उपशम भाव को प्राप्त होता है वह इस प्रकार का तीव्र परिणाम भेद पृथिवी रेखा सदृश है। 
*(ज.ध. १२/१५३)*
ये संस्कार काफी समय बीतने पर अथवा शास्त्र रूपी जल वृष्टि से चित्त स्नेहार्द्र हो जाने पर उपशम को प्राप्त हो जाता है। *(व.चा. ४/६७)*

*प्रश्न ३१)अस्थिस्तम्भ सदृश मान किसे कहते है?*
उत्तर : पुराण पुरुष कहते हैं कि दूसरे मान का उदय आत्मा में हड्डी के समान कर्कशता ला देता है, परिणाम यह होता है कि जब जीव ज्ञान रूपी आग में काफी तपाया जाता है तो उसमें कुछ-कुछ विनम्रता आ ही जाती है। *(व.चा. ४/७१)*

*प्रश्न ३२) मेढ़े के सींग सदृश माया किसे कहते हैं?*
उत्तर : इस माया का आत्मा पर पड़ने वाला संस्कार मेढ़े के सींग के समान गुड़ीदार होता है फलतः इस कषाय से आक्रान्त व्यक्ति मन में कुछ सोचता है और जो करता है वह इससे बिल्कुल भिन्न होता है। *(व.चा. ४/७५)*

*प्रश्न ३३) अक्षमल सदृश लोभ किसे कहते हैं?*
उत्तर : अक्ष (रथ का चक्का) का मल अक्षमल है। अक्षांजन के स्नेह से गीला हुआ मषीमल अति चिक्कण होने से उस अक्षमल को सुखपूर्वक दूर करना शक्य नहीं है। उसी प्रकार यह लोभ परिणाम भी  "निधत्त स्वरूप"  होने से जीव के हृदय में अवगाढ़ होता है इसलिए उसे दूर करना शक्य नहीं है। 
*(ज.ध. १२/१५६)* 
जैसे ही जीव अपने आपको ज्ञान रूपी जल में धोता है वैसे ही आत्मा तुरन्त शुचि और स्वच्छ हो जाता है। *(व.चा. ४/७९)*

*प्रश्न ३४) अप्रत्याख्यानावरण कषाय वाले क्षायिक सम्यग्दृष्टि के कितने उपयोग हो सकते हैं?*
उत्तर : अप्रत्याख्यानावरण कषाय वाले क्षायिक सम्यग्दृष्टि के छह (०६) उपयोग हो सकते हैं -
*०३ ज्ञानोपयोग* मति, श्रुत, अवधिज्ञानोपयोग।
*०३ दर्शनोपयोग* चक्षु, अचक्षु, अवधिदर्शनोपयोग

*प्रश्न ३५) अप्रत्याख्यानावरण कषाय वाले कार्मण काययोगी के कितने आस्रव प्रत्यय हो सकते हैं ?*
उत्तर : कार्मण काययोग में स्थित अप्रत्याख्यानावरण कषाय वाले के बाईस (२२) आस्रव के प्रत्यय होते हैं -
९ कषाय = ८ नोकषाय (स्त्री वेद बिना), १ स्वकीय अर्थात् क्रोधादि में से एक 
०१ योग = कार्मण काययोग
१२ अविरति = छहकाय व पांच इन्द्रिय और मन के संबंधी अविरति

*प्रश्न ३६) अप्रत्याख्यानावरण कषाय वाले व्यंतर देव के कितने आस्रव के प्रत्यय होते हैं?*
उत्तर : अप्रत्याख्यानावरण कषाय वाले व्यंतरदेव के उनतीस २९ आस्रव के प्रत्यय होते हैं -
१२ अविरति =
०८ कषाय - ०७ नोकषाय (देव है इसलिए स्त्रीवेद नहीं है) तथा ०१ स्वकीय कषाय है।
०९ योग - (०४ मनोयोग, ०४ वचनयोग, वैक्रियिक काययोग)    *(१२+८+९ = २९ आस्रव प्रत्यय)*
(यहा मिथ्यात्व को नही लिया है क्योकि यह सम्यग्दर्शन वाला जीव है)
*नोट* स्वकीय कषाय के साथ प्रत्याख्यानावरण तथा संज्वलन क्रोधादि को भी ग्रहण करने पर आस्रव के दो प्रत्यय और हो जाते हैं।
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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*

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37. कषाय मार्गणा - संज्वलन क्रोध मान माया में चौबीस ठाणा

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