https://youtu.be/kmW0dRvFzX4?si=cjRzMCSYTYpzeITz
*प्रश्न ०१) कषाय और कषाय मार्गणा किसे कहते हैं?*
उत्तर : जो तत्वार्थश्रद्धान रूप सम्यक्त्त्व, अणुव्रत रूप देशचारित्र, महाव्रत रूप सकल चारित्र और यथाख्यात चारित्र रूप आत्मा के विशुद्ध परिणामों को कषती अर्थात् घातती है उसे कषाय कहते हैं। *(गो.जी. २८२-८३)*
जो संसारी जीव के ज्ञानावरण आदि 08 मूल प्रकृति और 148 उत्तर प्रकृति के भेद से भिन्न शुभ-अशुभ कर्म रूप क्षेत्र को कषति अर्थात् जोतती हैं वे कषायें हैं।
क्रोधादि कषायों में अथवा कषाय और अकषाय में जीवों की खोज करने को कषाय मार्गणा कहते हैं।
*प्रश्न ०२) कषाय मार्गणा कितने प्रकार की होती है?*
उत्तर : कषाय मार्गणा चार प्रकार की होती है -क्रोध, मान, माया, लोभ। *(बृ.द्र.सं. १३ टीका)*
अथवा कषायें पच्चीस होती हैं -
अनन्तानुबन्धी–क्रोध, मान, माया, लोभ।
अप्रत्याख्यानावरण – क्रोध, मान, माया, लोभ।
प्रत्याख्यानावरण – क्रोध, मान, माया, लोभ।
संज्वलन – क्रोध, मान, माया, लोभ। = कुल १६
नौ नोकषाय - हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, स्त्रीवेद, पुरुषवेद और नपुंसकवेद। =०९
१६ + ०९ = २५ कषाय
कषाय मार्गणा के अनुवाद से क्रोधकषायी, मान कषायी, मायाकषायी, लोभकषायी तथा कषाय रहित जीव होते हैं। *(धवला ०१/३४८)*
*प्रश्न ०३) क्या कषायरहित जीव भी होते हैं?*
उत्तर : हाँ, कषायरहित जीव भी होते हैं। ११ वें, १२ वें, १३ वें, १४ वें गुणस्थान वाले तथा सिद्ध भगवान कषाय से रहित होते हैं।
*प्रश्न ०४) नोकषाय किसे कहते हैं ?*
उत्तर : ईषत् कषाय को नोकषाय कहते हैं। यहाँ ईषत् अर्थात् किंचित् यानि अल्प (न्यून) को नोकषाय कहा है। *(सर्वा. ०८/०९ )*
जिस प्रकार कुत्ता स्वामी का इशारा पाकर बलवन्त हो जाता है और जीवों को मारने के लिए प्रवृत्ति करता है तथा स्वामी के इशारों से वापिस आ जाता है; उसी प्रकार क्रोधादि कषाओ के बल पर ही ईषत् प्रतिषेध होने पर हास्यादि नोकषायों की प्रवृत्ति होती है। क्रोधादि कषायों के अभाव में निर्बल रहती है इसलिए हास्यादि को ईषत्-कषाय, अकषाय या नोकषाय कहते हैं। *(रा.वा.०८/०९)*
*प्रश्न ०५) ये चारों चौकड़ी किसका घात करती हैं?*
उत्तर : ◆ अनन्तानुबन्धी क्रोधादि कषायें सम्यक्त्व एवं चारित्र का घात करती हैं।
चतुर्थादि गुणस्थान मे जो प्रथमोपशम, द्वितियोपशम सम्यक्त्व वाले होते है, उनके जब अनंतानुबंधी का उदय आता है, वहा सम्यक्त्व की विराधना हो जाती है। तथा जो विराधना हुई तो इसी से पता चलता है कि अनंतानुबंधी के उदय से सम्यक्त्व नष्ट होता है, विराधित होता है।
◆ अप्रत्याख्यानावरण क्रोधादि कषायें देशसंयम (अणुव्रतों) का घात करती हैं। गुणस्थान ०५ वा
◆ प्रत्याख्यानावरण क्रोधादि कषायें सकल संयम (महाव्रतो) का घात करती हैं। गुणस्थान ०६-१०
◆ संज्वलन क्रोधादि कषायें यथाख्यात संयम का घात करती हैं। गुणस्थाना ११, १२, १३, १४
*प्रश्न ०६) क्रोध कषाय किसे कहते हैं?*
उत्तर : युक्तायुक्त विचार से रहित दूसरे के घात की वृत्ति, शरीर में कम्पन, दाह, नेत्रों में लालिमा तथा मुख की विवर्णता लक्षण वाला क्रोध है।
अपने या पर के अपराध से अपना या दूसरों का नाश होना या नाश करना क्रोध है।
*(य.ति.च. ०८/४६७)*
जिसके उदय से अपने और पर के घात करने के परिणाम हों तथा पर के उपकार करने के अभाव रूप भाव अर्थात् पर का उपकार करने के भाव न होना वा क्रूर भाव हो सो क्रोध कषाय है।
*प्रश्न ०७) मान कषाय किसे कहते हैं?*
उत्तर : मन में कठोरता, ईर्षा, दया का अभाव, दूसरों के मर्दन का भाव, अपने से बड़ों को नमस्कार नहीं करना, अहंकार, दूसरों की उन्नति को सहन नहीं करना लक्षण मान हैं।
जाति आदि के मद से दूसरे के तिरस्कार रूप भाव को मान कषाय कहते हैं। युक्ति दिखा देने पर भी दुराग्रह नहीं छोड़ना मान है। *(रा.वा. ०८/०९)*
रोष से या विद्या आदि के मद से दूसरे के तिरस्कार रूप भाव को मान कषाय कहते हैं। *(ध.१/३४९)*
*प्रश्न ०८) माया कषाय किसे कहते हैं?*
उत्तर : नाना प्रकार के प्रतारण के उपायों द्वारा ठगने के लिए आकुलित मति और विनय, विश्वासाभास से चित्त को हरण करने के लिए बनी आकृति माया है।
दूसरों को ठगने के लिए जो छल-कपट और कुटिल भाव होता है वह माया है। *(रा.वा. ०८/०९)*
अपने हृदय में विचारो को छिपाने की जो चेष्ठा की जाती है वह माया है। *(धवला १२)*
*प्रश्न ०९) लोभ कषाय किसे कहते हैं?*
उत्तर : परिग्रह के ग्रहण में अतीव लालायित मानसिक भावना, परिग्रह के लाभ से अतिप्रसन्नता, ग्रहण किये हुए परिग्रह के रक्षण से उत्पन्न आर्त्तध्यान लोभ है।
चेतन स्त्री-पुत्रादिक में और अचेतन धन-धान्यादिक पदार्थों में ये "मेरे हैं" इस प्रकार की चित्त में उत्पन्न हुई विशेष तृष्णा को लोभ कहते हैं। अथवा
इन पदार्थों की वृद्धि होने पर जो विशेष संतोष होता है, इनके विनाश होने पर महान् असंतोष होता है वह लोभ है। *(य. ति. च. ८/४६७)*
*प्रश्न १०) वासना काल किसे कहते हैं ?*
उत्तर : उदय का अभाव होते हुए भी कषाय का संस्कार जितने काल तक रहता है, उसे वासना काल कहते हैं। *(गो.क.जी. ४६-४७)* जैसे किसी पुरुष ने क्रोध किया। फिर क्रोध छूट कर वह अपने काम में लग गया। वहाँ क्रोध का उदय तो नहीं है परन्तु वासना काल है इसलिए जिस पर क्रोध किया था, उस पर क्षमा रूप भाव उत्पन्न नहीं हुआ है। इसी प्रकार सभी कषायों का वासना काल जानना चाहिए।
*प्रश्न ११) कषायों का वासना काल कितना है ?*
उत्तर : कषायों का वासना काल -
*कषाय वासना काल*
संज्वलन चतुष्क का : एक अन्तर्मुहूर्त
प्रत्याख्यानावरण चतुष्क का : एक पक्ष
अप्रत्याख्यानावरण चतुष्क का छह माह
अनन्तानुबन्धी चतुष्क का : संख्यात भव, असंख्यात भव, अनन्त भव। *(गो.क.जी. ४६-४७)*
*प्रश्न १२) किस गति के प्रथम समय में कौनसी कषाय की प्रधानता है ?*
उत्तर : नरक गति में उत्पन्न जीवों के प्रथम समय में क्रोध का उदय,
मनुष्यगति में मान का उदय,
तिर्यंचगति में माया का उदय,
देवगति में लोभ के उदय का नियम है। ऐसा आचार्य परम्परागत उपदेश है। *(धवला ०४/४४५)*
🗣️विशेष : महाकर्मप्रकृति प्राभृत प्रथम सिद्धान्त के कर्त्ता भूतबली आचार्य के अभिप्रायानुसार किसी भी गति मे कोई भी कषाय का उदय हो सकता है।
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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*
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