बुधवार, 18 मार्च 2026

32. चौबीस ठाणा मे अपगतवेदी जीव

*✍️२४ स्थान अपगतवेद में*
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*०१) गति        ०१/०४*  मनुष्यगति
*०२) इन्द्रिय     ०१/०५*  पंचेन्द्रिय
*०३) काय       ०१/०६*  त्रसकाय
*०४) योग       ११/१५*   मन ०४, वचन ०४, काय ०३ (औदारिकद्विक, कार्मण काययोग) 
*०५) वेद         ००/०३*  कोई नही
केवल द्रव्यवेद होता है पुरुषवेद, भाववेद नही 
*०६) कषाय      ०४/२५*  संज्वलन कषाय
नौवे गुणस्थान ०४, दसवे मे सूक्ष्म लोभ, ११ से १४ गुणस्थान मे कोई भी नही 
*०७) ज्ञान         ०५/०८*  
मति, श्रुत, अवधिज्ञान, मनःपर्यय, केवलज्ञान
*०८) संयम       ०४/०७*  
सामायिक,क्षेदोपस्थापना,सुक्ष्मसाम्पराय,यथाख्यात
*०९) दर्शन       ०४/०४*  
चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन, अवधिदर्शन, केवलदर्शन
*१०) लेश्या       ०१/०६*  शुक्ल लेश्या 
*११) भव्यक्त्व   ०१/०२*  भव्य जीव 
*१२) सम्यक्त्व   ०२/०६* सामायिक, द्वितियोपशम
*१३) संज्ञी         ०१/०२*  संज्ञी 
*१४) आहार      ०२/०२*  आहारक, अनाहारक 
अनहारक समुद्धात अपेक्षा तथा १४ वे गुणस्थान में
*१५) गुणस्थान   ०६/१४*  ०९ से १४ तक
*१६) जीवसमास  ०१/१९*  सैनी पंचेन्द्रिय
*१७) पर्याप्ति    ०६/०६*  
आहार, शरीर, इन्द्रिय,श्वासोच्छ, भाषा,मन:पर्याप्ति
*१८) प्राण         १०/१०*  सभी प्राण
*इन्द्रिय ०५* स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और कर्ण
*बल ०३* कायबल, वचन बल और मनोबल प्राण
आयु प्राण और श्वासोच्छवास प्राण
*१९) संज्ञा         ०१/०४*  परिग्रह संज्ञा 
परिग्रह संज्ञा दसवे गुणस्थान तक है, आगे कोई नही
*२०) उपयोग     ०९/१२*  (०६ + ०३)
*२१) ध्यान         ०४/१६*  चारो शुक्ल ध्यान 
*२२) आस्रव       १५/५७*  
कषाय-०४, योग -११ (१४ वे आस्रव नही होता है) 
*२३) जाति    १४ लाख/८४ लाख*  मनुष्यगति की
*२४) कुल– १४ ला.क. /१९९.५ ला. क.*  
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*प्रश्न ३०) अपगतवेदी किसे कहते हैं?*
उत्तर- जो स्त्री, पुरुष तथा स्त्री-पुरुष दोनों की अभिलाषा रूप परिणामों की तीव्र वेदना से होने वाले संक्लेश से रहित हैं, वे अपगतवेदी हैं। 
जो कारीष, तृण तथा इष्टपाक की अग्रि के समान परिणामों के वेदन से उन्मुक्त हैं और अपनी आत्मा में उत्पन्न हुए श्रेष्ठ अनन्तसुख के धारक भोक्ता हैं वे अपगतवेदी हैं। *(पं. सं. प्रा. ०१/१०८)*
जिनके तीनों प्रकार के वेदों से उत्पन्न होने वाला संताप दूर हो गया है वे वेदरहित जीव हैं। *(धवला ०१ /३४२)*

*प्रश्न ३१) अपगतवेदी जीवों के कितनी कषायें होती हैं?*
उत्तर- अपगतवेदी जीवों के ०४ कषाये होती हैं संज्वलन क्रोध, मान, माया, लोभ।
नवमें गुणस्थान में पहले वेद का अभाव होता है । उसके बाद संज्वलन कषायों का नाश होता है । इसलिए नवमें गुणस्थान में संज्वलन क्रोधादि चारों कषाए पाये जाते हैं तथा दसवें गुणस्थान में केवल सूक्ष्म लोभ पाया जाता है। *(धवला ०२)*
ग्यारहवें से चौदहवें गुणस्थान तक तथा सिद्ध भगवान भी अपगतवेदी होते हैं लेकिन उनके कषाय भी नहीं होती है।

*प्रश्न ३२) अपगतवेद में पाँचों ज्ञान किस अपेक्षा से पाये जाते हैं?*
उत्तर- अपगतवेदी के ०९ वें, १० वें, ११ वें तथा १२ वें गुणस्थान में मति, श्रुत, अवधि और मनःपर्यय ज्ञान होता है। १३ वें और १४ वें गुणस्थान में केवलज्ञान पाया जाता है। *(धवला ०२)* 
सिद्ध भगवान के ज्ञान को भी केवलज्ञान कहते हैं।
नोट – इसी प्रकार चार दर्शनों में भी जानना चाहिए

*प्रश्न ३३) अपगतवेद में संयम की विवेचना किस प्रकार करनी चाहिए?*
उत्तर- अपगतवेद में चार संयम होते है –
सामायिक-छेदोपस्थापना सयम ०९ वे गुणस्थान की अवेद अवस्था में होते है। यानि ०६ से ०९ गुणस्थान
सूक्ष्म साम्पराय संयम – १० वें गुणस्थान में होता है।
यथाख्यात संयम – ११-१२-१३-१४ वें गुणस्थान में पाया जाता है। *(धवला ०२)*

*प्रश्न ३४) अपगतवेद में दो सम्यकत्व किस अपेक्षा से कहे गये हैं?*
उत्तर – अपगतवेदी के उपशम सम्यकत्व – उपशम श्रेणी में स्थित ०९ वे (अवेद भाग में) १० वें तथा ११वें गुणस्थान में पाया जाता है।
क्षायिक सम्यकत्व – उपशम श्रेणी में स्थित ०९ वे से ११ वें गुणस्थान तक तथा क्षपक श्रेणी में स्थित ०९ वे, १० वें, १२ वें गुणस्थान में और १३ वें, १४ वें गुणस्थान तथा सिद्ध भगवान के भी पाया जाता है । *(धवला ०२)*

*प्रश्न ३५) अपगतवेदी के वेद का अभाव भाव की अपेक्षा होता है या द्रव्य की अपेक्षा ?*
उत्तर- (यद्यपि पाँचवें गुणस्थान से आगे भी द्रव्यवेद का सद्‌भाव पाया जाता है, परन्तु केवल द्रव्य वेद से ही विकार उत्पन्न नहीं होता है ।) 
यहाँ पर तो भाववेद का अधिकार है, इसलिए भाववेद के अभाव से ही उन जीवों को अपगतवेदी जानना चाहिए, द्रव्यवेद के अभाव से नहीं। 
*(ध. ०१/३४५)* 
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*✍️समुच्चय प्रश्नोत्तर*
*प्रश्न ३६) किन-किन जीवों के तीनों वेद होते हैं?*
उत्तर-तिर्यंच असंज्ञी पंचेन्द्रिय से लेकर संयतासंयत गुणस्थान तक तीनों वेद से युक्त होते है। इससे पहले सभी नियम से नपुंसक वेद है। 
*(धवला ०१/१०७-१०८)* 
मनुष्य मिथ्यादृष्टि गुणस्थान से लेकर अनिवृत्तिकरण गुणस्थान तक तीनों वेद वाले होते है। आगम में नवमे गुणस्थान के सवेद भाग पर्यन्त द्रव्य से एक पुरुषवेद और भाव से तीनों वेद हैं ऐसा कथन किया है। *(गो. जी. जी. २७१)*

*प्रश्न ३७) कौन सी गति के जीवों में एक, दो, तीन वेद तथा वेद रहित अवस्था भी होती है?*
उत्तर- मनुष्यगति के जीवों में एक वेद, दो वेद, तीन वेद तथा वेद रहित अवस्था भी होती है-
*◆ एक पुरुष वेद* आहारक ऋद्धि, मनःपर्ययज्ञान, परिहार विशुद्धि संयम तथा सभी ६३ शलाका पुरुषों के एक मात्र पुरुषवेद होता है। ये द्रव्य से तो पुरुष होते है भाव से भी पुरुष होते है।
*◆ एक नपुंसक* वे सभी सम्मूर्च्छन नपुंसक वेद होता है क्योकि ये अपर्याप्तक होते है, श्वास के १८ वे भाग मे इनका मरण हो जाता है। इनकी संख्या भी असंख्यात है।
*◆ दो वेद वाले* भोगभूमि, कुभोगभूमि तथा सर्व म्लेच्छ खण्डों में रहने वाले जीवो के दो वेद होते है - स्त्रीवेद और पुरुषवेद (इनका द्रव्यवेद और भाववेद दोनो समान होते है)
*◆तीन वेद वाले* कर्मभूमिया मनुष्य इनके तीनो वेद होते है।
*◆अपगतवेदी* नवमें गुणस्थान के अवेद भाग से आगे चौदहवे गुणस्थान तक के मनुष्य।

*प्रश्न ३८) ऐसे कौन-कौन से योग हैं जो तीनों वेद वालों के भी होते हैं और अपगतवेदीके भी होते हैं?*
उत्तर- ११ योग तीनों वेदों में भी होते हैं तथा अपगतवेदी के भी होते हैं –
मनोयोग-०४, वचनयोग-०४ तथा काययोग -०३ (औदारिकद्विक तथा कार्मण) 

*प्रश्न ३९) ऐसा कौन- कौनसा वेद है जिसकी अनाहारक अवस्था में तीन ही गतियाँ होती है?*
उत्तर- तीनों ही वेदों की अनाहारक अवस्था में तीन गतियाँ ही होती हैं –
*स्त्रीवेद में* तिर्यंचगति, मनुष्यगति, देवगति।
*पुरुषवेद में* तिर्यंचगति, मनुष्यगति, देवगति।
*नपुंसक वेद में* नरकगति, तिर्यंचगति, मनुष्यगति

*प्रश्न ४०) नरकगति में जाते समय द्रव्य स्त्री और पुरुष वेदी के कम-से-कम कितने आस्रव के प्रत्यय हो सकते हैं?*
उत्तर- *द्रव्य स्त्रीवेदी* जो यहाँ से नरकगति में जा रहा है उसके विग्रहगति में कम-से-कम आस्रव के ४१ प्रत्यय हो सकते हैं–०५ मिथ्यात्व,१२ अविरति, २३ कषाय तथा ०१ योग। 
*द्रव्य पुरुषवेदी* के नरक में जाते समय कम से कम ३२ आस्रव के प्रत्यय हैं –१२ अविरति, १९ कषाय तथा ०१ योग। 
नोट: द्रव्य पुरुषवेदी ही सम्यग्दर्शन को लेकर नरक गति में जा सकता है क्योंकि क्षायिक सम्यग्दर्शन तथा कृतकृत्य वेदक सम्यक द्रव्य पुरुष-वेदी के ही होते हैं। इसलिए उसके ०५ मिथ्यात्व तथा अनन्तानुबन्धी सम्बन्धी आस्रव के प्रत्यय निकल जावेंगे।

*प्रश्न ४१) क्या अपगतवेदी आस्रव रहित भी होते हैं?*
उत्तर- हाँ, चौदहवें गुणस्थानवर्ती अपगतवेदी आस्रव रहित ही होते हैं। सिद्ध भगवान भी आस्रव रहित ही होते हैं।

*प्रश्न ४२) किस-किस स्थान के सभी उत्तर भेदों में तीनों वेद पाये जाते हैं?*
उत्तर- आठ स्थानों के सभी उत्तर भेदों में तीनों वेद पाये जाते हैं- लेश्या, भव्यत्व, सम्बक्च, संज्ञी, आहार, पर्याप्ति,  प्राण,  संज्ञा।
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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*

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