*प्रश्न १००) किन-किन योग मे सभी संयम होते है।*
उत्तर - नौ योग मे सभी संयम हो सकते है –
मनोयोग ०४, वचनयोग ०४, औदारिक काययोग
*◆ मनोयोग* के चारो भेदो मे भी सातो संयम होते है। ०१ से ०४ गुणस्थान मे असंयम होगा, ०५ वे गुणस्थान वालो के देश संयम होगा, ०६ से १२ गुणस्थान वालो के सामायिक, छेदोपस्थापना, परिहार विशुद्धि, सुक्ष्म सांपराय और यथाख्यात संयम होगे तथा १३ वे गुणस्थान मे की मनोयोग के दो भेद सत्य और अनुभय होते है।
*◆ वचनयोग* के चारो भेदो मे भी सातो संयम है।
जैसे मनोयोग मे सातो संयम है उसी प्रकार वचन योग मे भी सातो संयम है।
*◆ काययोग* औदारिक काययोग मे भी सातो संयम होते है।
वैक्रियिकद्विक काययोग मे केवल असंयम ही होता है देव हो या नारकी
आहारकद्विक काययोग मे केवल दो संयम है सामायिक और छेदोपस्थापना संयम
कार्मण काययोग मे दो संयम –असंयम और यथाख्यात संयम होते है।
औदारिक मिश्र मे दो संयम – असंयम ०१ से ०४ गुणस्थान अपेक्षा, केवली समुद्धात अपेक्षा यथाख्यात संयम
औदारिक काययोग मे भी सातो संयम होते है।
०१ से ०४ गुणस्थान तक असंयम, ०५ वे गुणस्थान मे संयमासंयम, ०६ से १३ गुणस्थान तक बाकी संयम होते है।
*प्रश्न १०१) किन किन योगो मे यथाख्यात संयम नही हो सकता है?*
उत्तर - चार योगो मे यथाख्यात संयम नही हो सकता है–
आहारक काययोग, आहारक मिश्र काययोग,
वैक्रियक काययोग, वैक्रियक मिश्न काययोग
*प्रश्न १०२) किस योग ने दो-दो संयम होते है?*
उत्तर - चार योग मे दो-दो संयम होते है –
आहारक और आहारक मिश्र – सामायिक और छेदोपस्थाना संयम
औदारिक मिश्र मे –असंयम और यथाख्यात संयम
कार्मण काययोग – असंयम और यथाख्यात संयम
*प्रश्न १०३) किस-किस योग मे शुभ लेश्या ही होती है?*
उत्तर - दो योग- आहारक और आहारक मिश्र मे शुभ लेश्या ही होती है।
*प्रश्न १०४) किन-किन योगों में सैनी जीव ही होते हैं*
उत्तर- ११ योगों में सैनी जीव ही होते हैं-
मनोयोग ०४, वचनयोग ०३, काय ०४ योग मे
◆ मन के चारो योग मे सैनी जीव ही होते हैं।
◆ वचन के चार मे से अनुभयवचनयोग बिना तीन मे सैनी जीव ही होते हैं।
◆ काय के सात मे से वैक्रियकद्विक, आहारकद्विक मे सैनी जीव ही होते हैं।
औदारिकद्विक और कार्मण काययोग मे सैनी और असैनी दोनो प्रकार के जीव हो सकते है।
*प्रश्न १०५) ऐसे कितने योग है जो मात्र असैनी के ही होते है।*
उत्तर - ऐसा कोई भी योग नही है जो मात्र असैनी का ही हो।
*प्रश्न १०६) किस-किस योग मे मात्र चार ही गुणस्थान होते है?*
उत्तर - तीन योगों में ०४ ही गुणस्थान होते हैं –
औदारिकमिश्र काययोग – ०१, ०२, ०४, १३
कार्मण काययोग – ०१, ०२, ०४, १३
वैक्रियक काययोग – ०१, ०२, ०३, ०४
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औदारिक काययोग मे ०१- १३ तक गुणस्थान
वैक्रियकमिश्र काययोग – ०१, ०२, ०४ गुणस्थान
आहारकद्विक काययोग – ०६ गुणस्थान
*प्रश्न १०७) किस- किस योग में १३ गुणस्थान होते हैं?*
उत्तर- पाँच योगों में १३ गुणस्थान होते हैं-
मनोयोग ०२- सत्यमन, अनुभयमन मे ०१- १३
वचनयोग ०२ - सत्यवचन, अनुभयवचन मे ०१- १३
औदारिक काययोग मे ०१- १३ तक गुणस्थान है
*प्रश्न १०८) कितने योगों में सभी जीवसमास होते हैं?*
उत्तर - तीन योगों में सभी जीवसमास होते है।
●औदारिक काययोग मे सभी जीवसमास होते है। यह एकेन्द्रिय से १३ वे गुणस्थान है- १९ जीवसमास
●औदारिकमिश्र काययोग मे भी एकेन्द्रिय से संज्ञी पंचेन्द्रिय जीव है, सभी १९ जीवसमास होते है।
●कार्मणकाययोग मे भी एकेन्द्रिय से संज्ञी पंचेन्द्रिय जीव है, सभी १९ जीवसमास होते है।
*प्रश्न १०९) ऐसे कौनसे योग हैं जिनमें श्वासोच्छास प्राण नहीं पाया जाता है?*
उत्तर - चार योगों औदारिकमिश्र, वैक्रियिकमिश्र, आहारक मिश्र, कार्मण काययोग में श्वासोच्चवास प्राण नहीं पाया जाता है।
*प्रश्न ११०) ऐसे कौन-कौन से योग हैं जिनमें संज्ञाओं का अभाव भी हो सकता है?*
उत्तर - ११ योग मे संज्ञा का अभाव भी हो सकता है
मन ०४, वचन ०४, औदारिकद्विक काययोग, कार्मण काययोग मे संज्ञाओं का अभाव भी हो सकता है।
कार्मण काययोग मे १३ वे गुणस्थान की अपेक्षा संज्ञाओं का अभाव भी हो सकता है।
*प्रश्न १११) किस-किस योग में संज्ञातीत जीव नहीं होते हैं?*
उत्तर - चार योगों वैक्रियिकद्विक और आहारक द्विक में संज्ञातीत जीव नहीं होते हैं।
*वैक्रियिकद्विक* क्योंकि देव-नारकी चतुर्थ गुणस्थान से आगे नहीं जा सकते हैं।
*आहारकद्विक* छठे गुणस्थान में ही होता है।
*प्रश्न ११२) कौन-कौन से योग में आस्रव के ४३ प्रत्यय होते हैं?*
उत्तर - आहारकद्विक काययोग को छोड्कर शेष १३ योगों में अर्थात् मन ०४, वचन ०४, औदारिकद्बिक, वैक्रियिकद्विक तथा कार्मण काययोग में आस्रव के ४३ प्रत्यय होते हैं। (मिथ्यात्व ०५,अविरति १२, कषाय २५, योग स्वकीय=४३)
●आहारकद्विक मे आस्रव के प्रत्यय– मिथ्यात्व ००, अविरति १२, कषाय ११ (संज्वलन ०४, नोकषाय ०७), योग स्वकीय = २४ आस्रव प्रत्यय
*प्रश्न ११३) सबसे कम आस्रव के प्रत्यय किस योग में होते हैं?*
उत्तर - सबसे कम आस्रव के प्रत्यय आहारकद्बिक काययोग में होते हैं- इन में आस्रव के १२ प्रत्यय हैं। संज्वलन कषाय ०४, नोकषाय ०६ + पुरुषवेद तथा स्वकीय योग।
आहारक काययोग में आहारक तथा आहारकमिश्र में आहारकमिश्र काययोग होता है ।
● जहाँ केवल औदारिक काययोग ही शेष रहता है ऐसे अरहन्त केवली भगवान के आस्रव का मात्र एक (औदारिक काययोग रूप) प्रत्यय शेष रहता है।
इसी प्रकार औदारिक मिश्र तथा कार्मण काययोग में भी केवली भगवान के एक ही स्वकीय योग रूप आस्रव का प्रत्यय होता है।
● औदारिकमिश्न केवली भगवान के समुद्धात मे कपात-प्रतर-लोकपूरण अवस्था मे होता है। वहा एक ही योग होता है कार्मण काययोग
◆ केवली भगवान के आस्रव के अधिक से अधिक ०७ आस्रव के प्रत्यय होते है –
मन ०२ (सत्य, अनुभय), वचन ०२ (सत्य, अनुभय), औदारिकद्विक काययोग, कार्मण काययोग।
*(●केवली भगवान के सयोग केवली मे अधिक से अधिक ०७ आस्रव के प्रत्यय, और कम से कम ०१ आस्रव का प्रत्यय होता हैं)*
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*प्रश्न ५६१) किस-किस योग में किस अपेक्षा से नपुंसक वेद होता है?*
उत्तर- चार मनोयोगों एव तीन वचन योगों में (अनुभय वचन को छोडकर) इनमे पर्याप्त नारकी, पर्याप्त तिर्यंच तथा पर्याप्त मनुष्यों में नपुंसक वेद होता है।
◆ अनुभय वचन योग– पर्याप्त द्विन्द्रिय से लेकर पर्याप्त पंचेन्द्रिय तिर्यंच, पर्याप्त मनुष्य तथा पर्याप्त नारकियों के नपुंसक वेद होता है।
◆ औदारिक काययोग – पर्याप्त एकेन्द्रिय से लेकर नवम गुणस्थान के सवेद भाग तक नपुंसक वेद होता है।
◆ औदारिक मिश्र काययोग – निर्वृत्यपर्यातक तथा लब्ध्यपर्यातक मनुष्य-तिर्यंचों में नपुंसक वेद होता है।
◆ वैक्रियिक काययोग – पर्याप्त नारकियों के नपुंसक वेद होता है।
◆ वैक्रियिक मिश्रकाययोग – निर्वृत्यपर्यातक नारकियों के नपुंसक वेद होता है।
◆ कार्मण काययोग – अनाहारक नारकी, मनुष्य तथा तिर्यंचों के यानि जो विग्रहगति से जा रहे है उनमे भी नपुंसक वेद रह सकता है।
विशेष : आहारकद्विक काययोग में नपुंसक वेद नहीं होता है ।
औदारिक मिश्र काययोग, कार्मण काययोग तथा सत्य अनुभय मन वचन योग में केवली भगवान को ग्रहण नहीं करना चाहिए, क्योंकि वे वेदातीत होते हैं ।
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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*
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