29. वेद मार्गणा, २४ ठाणा मे स्त्रीवेद
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*प्रश्न ०१) वेद मार्गणा किसे कहते हैं?*
उत्तर- वेद कर्म के उदय से होने वाले भाव को वेद कहते हैं। *(धवला ०१/१४१)*
आत्मा की चैतन्य रूप पर्याय में मैथुनरूप चित्त विक्षेप के उत्पन्न होने को वेद कहते है।
*(गो. जी.२७२)*
वेदों में जीवों की खोज करने को वेदमार्गणा कहते हैं
◆ वेद चारित्र मोहनीय कर्म का भेद है और लिंग शरीर नाम कर्म के उदय से होने वाली शारीरीक रचना है, शरीर के चिन्ह विशेष है पूरी तरह पुदग्लमय है।
वेद जीव के भाव रुप है इसलिए इसे चेतनमय भी कहते है क्योकी वेद रुप भाव जीव के ही होते है।
*प्रश्न ०२) वेदमार्गणा कितने प्रकार की है?*
उत्तर- वेद मार्गणा तीन प्रकार की है- स्त्रीवेद, पुरुषवेद, नपुंसकवेद। *(बृ द्र संग्रह १३ टीका)*
वेद मार्गणा के अनुवाद से स्त्रीवेद, पुरुषवेद, नपुंसकवेद तथा अपगतवेद वाले जीव होते *(धवला ०१/३४०)*
अथवा – वेद दो प्रकार के हैं- द्रव्य वेद, भाव वेद ।
*प्रश्न ०३) स्वीवेद किसे कहते हैं?*
उत्तर- जिसके उदय से जीव पुरुष में अभिलाषा रूप मैथुन सज्ञा से आक्रान्त होता है वह स्त्रीवेद है।
जिसके उदय से पुरुष के साथ रमने के भाव हों वह स्त्रीवेद है। *(गो. जी. २७१)*
*प्रश्न ०४) पुरुषवेद किसे कहते हैं?*
उत्तर - जिसके उदय से जीव स्त्री में अभिलाषा रूप मैथुन सज्ञा से आक्रान्त होता है वह पुरुषवेद हे। जिसके उदय से स्त्री के साथ रमने के भाव हों वह पुरुषवेद है। *(गो. जी. २७१)*
*प्रश्न ०५) नपुंसकवेद किसे कहते हैं?*
उत्तर - जिसके उदय से जीव के स्त्री और पुरुष की अभिलाषा रूप तीव्र कामवेदना उत्पन्न होती है वह नपुंसकवेद है।
जिसके उदय से स्त्री तथा पुरुष दोनों के साथ रमने के भाव हों वह नपुसक वेद है। *(गो. जी. २७१)*
*प्रश्न ०६) द्रव्यवेद किसे कहते हैं?*
उत्तर- जो योनि, मेहन आदि नामकर्म के उदय से रचा जाता है वह द्रव्यवेद है। *(सर्वा ०२/५२)*
*प्रश्न ०७) भाववेद किसे कहते ई?*
उत्तर - भाव लिंग आत्मपरिणाम स्वरूप है। वह स्त्री पुरुष, नपुंसक इन तीनों में एक-दूसरे की अभिलाषा लक्षण वाला है और वह चारित्रमोह के विकल्परूप स्त्री, पुरुष तथा नपुंसक वेद नामके नोकषाय के उदय से होता है। *(रा.वा. ०२/०६)*
*प्रश्न ०८) वेद मार्गणा में किस वेद को ग्रहण करना चाहिए?*
उत्तर- वेद मार्गणा में भाववेद को ग्रहण करना चाहिए क्योंकि यदि यहाँ द्रव्यवेद से प्रयोजन होता तो मनुष्य स्त्रियों के अपगतवेद स्थान नहीं बन सकता, क्योंकि द्रव्यवेद चौदहवें गुणस्थान् के अन्त तक पाया जाता है। परन्तु अपगतवेद भी होता है। इस प्रकार वचन निर्देश नौवें गुणस्थान के अवेद भाग से किया गया है।
*(जिससे प्रतीत होता है कि यहाँ भाववेद से प्रयोजन है, द्रव्यवेद से नहीं) (धवला ०२/५१३)*
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*✍️ स्त्रीवेद मे २४ स्थान*
*०१) गति ०३/०४* देव, मनुष्य, तिर्यंचगति,
*०२) इन्द्रिय ०१/०५* पंचेन्द्रिय
*०३) काय ०१/०६* त्रसकाय
*०४) योग १३/१५* (आहारकद्विक नही होता)
*०५) वेद ०१/०३* स्वकीय (स्त्रीवेद)
*०६) कषाय २३/२५*
*(पुरुषवेद, नपुंसक वेद नोकषाय को छोडकर)*
*०७) ज्ञान ०६/०८*
*कुज्ञान ०३* कुमतिज्ञान, कुश्रुतज्ञान, कुअवधिज्ञान
*सुज्ञान ०३* मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान,
*(मनःपर्यय तथा केवलज्ञान नहीं होता है)*
*०८) संयम ०४/०७*
असंयम, संयमासंयम, सामायिक, छेदोपस्थापना
*०९) दर्शन ०३/०४* चक्षु,अचक्षु,अवधिदर्शन
*१०) लेश्या ०६/०६* सभी लेश्या
कृष्ण, नील, कापोत, पीत, पदम और शुक्ल लेश्या।
*११) भव्यक्त्व ०२/०२* भव्य और अभव्य।
*१२) सम्यक्त्व ०६/०६*
मिथ्यात्व,सासादन,मिश्र,उपशम,क्षयोपशम, क्षायिक
(क्षायिक लेने का कारण है यहा भाव स्त्री को लिया)
*१३) संज्ञी ०२/०२* संज्ञी और असंज्ञी।
*१४) आहारक ०२/०२* आहारक, अनाहारक
*१५) गुणस्थान ०९/१४* ०१ से ०९ तक
*१६) जीवसमास ०२/१९* असंज्ञी-संज्ञी पंचेन्द्रिय
*१७) पर्याप्ति ०६/०६*
आहार, शरीर, इन्द्रिय,श्वासोच्छ, भाषा,मन:पर्याप्ति
*१८) प्राण १०/१०* सभी प्राण
*इन्द्रिय ०५* स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और कर्ण
*बल ०३* कायबल, वचन बल और मनोबल प्राण
आयु प्राण और श्वासोच्छवास प्राण
*१९) संज्ञा ०४/०४* सभी संज्ञा
आहार संज्ञा, भय संज्ञा, मैथुन संज्ञा, परिग्रह संज्ञा।
*२०) उपयोग ०९/१२*
*ज्ञानोपयोग ०६* मति, श्रुत, अवधि, कुमति, कुश्रुत, कुअवधिज्ञानोपयोग
*दर्शनोपयोग ०३* चक्षु, अचक्षु, अवधिदर्शनोपयोग
*२१) ध्यान १३/१६*
*आर्त* इष्टवियोगज,अनिष्टसंयोगज,वेदना,निदान
*रौद* हिंसानन्दी,मृषानन्दी,चौर्यानन्दी,परिग्रहानन्दी
*धर्म* आज्ञाविचय,अपायविचय, विपाकविचय, संस्थानविचय *शुक्ल* पृथक्त्ववितर्क वीचार
*२२) आस्रव ५३/५७*
*मिथ्यात्व०५* विपरीत,एकान्त,विनय,संशय,अज्ञान
*अविरति १२* ०५ इन्द्रिय और मन को वश में नही करने तथा षट्काय के जीवों की रक्षा नहीं करना
*कषाय २३* १६ अनन्तानुबन्धी आदि ०७नोकषाय
*योग १३* मनोयोग०४, वचनयोग०४, काययोग ०५
*२३) जाति २२ लाख/८४ लाख*
तिर्यंच ०४ लाख, मनुष्य १४ लाख, देव ०४ लाख
*२४) कुल–८३-१/२ ला.क. /१९९.५ ला क*
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*प्रश्न ०९) स्त्रीवेद किसके समान होता है?*
उत्तर - स्त्रीवेद के उदय में जीव पुरुष को देखते ही उसी प्रकार द्रवित हो उठता है जिस प्रकार आग को छूते ही लाख पिघल जाती है। *(व.चा. ४/८९)*
स्त्रीवेद कण्डे की अग्रि के समान माना गया है।
यह वेद स्त्री और पुरुष दोनो के हो सकता है।
*प्रश्न १०) स्त्रीवेदी जीव कहाँ-कहाँ पाये जाते हैं?*
उत्तर - मनुष्यगति, तिर्यंचगति तथा देवों में सोलहवें स्वर्ग तक स्त्रीवेदी जीव पाये जाते हैं।
लेकिन सम्मूर्च्छन, लब्ध्यपर्यातक मनुष्य-तिर्यंचो में स्त्रियाँ नहीं होती हैं क्योंकि सम्मूर्च्छन जीव नपुंसक वेद वाले ही होते हैं ।
*प्रश्न ११) स्त्रीवेदी के आहारकद्विक काययोग क्यों नहीं होते हैं?*
उत्तर - अप्रशस्त वेदों के साथ आहारक ऋद्धि उत्पन्न नहीं होती है। *(धवला २/६६७)*
अप्रशस्त वेदों यानि स्त्रीवेद और नपुंसक वेद
*प्रश्न १२) क्या स्त्रीवेदी की निर्वृत्यपर्याप्तक अवस्था में भी अवधिदर्शन हो सकता है?*
उत्तर - नहीं, क्योंकि सम्यग्दृष्टि जीव स्त्रीवेदी में उत्पन्न नहीं होता है। ना द्रव्यवेद मे ना भाववेद मे।
अवधिदर्शन सम्यग्दृष्टि तथा सम्यग्मिथ्यादृष्टि के होता है। तीसरे गुणस्थान वाले का मरण नहीं होता, इसलिए स्त्रीवेदी के निर्वृत्यपर्यातक अवस्था में अवधिदर्शन नहीं हो सकता।
इसी प्रकार नपुंसक वेद में जानना चाहिए लेकिन नरक की अपेक्षा नपुंसकवेदी की निर्वृत्यपर्यातक अवस्था में भी अवधिदर्शन होता है।
*प्रश्न १३) स्त्रीवेद वाले के कौन-कौन से संयम नहीं हो सकते हैं?*
उत्तर - स्त्रीवेद वाले के तीन सयम नहीं हो सकते हैं- परिहारविशुद्धि, सूक्ष्म साम्पराय, यथाख्यात सयम।
परिहारविशुद्धि संयम पुरुषवेद वाले के ही होता है । सूक्ष्म साम्पराय तथा यथाख्यात संयम अवेदी जीवों के ही होते हैं, इसलिए स्त्रीवेद में ये तीनों संयम नहीं होते हैं। इसी प्रकार नपुंसक वेद में भी ये संयम नहीं हो सकते हैं ।
*प्रश्न १४) स्त्रीवेदी के निर्वृत्यपर्याप्तक अवस्था में कितने सम्यक्त्व हो सकते हैं?*
उत्तर - स्त्रीवेदी के निर्वृत्यपर्यातक अवस्था में दो सम्यक्त्व हो सकते हैं- मिथ्यात्व और सासादन।
स्त्रीवेद की पर्याप्त अवस्था में सभी सम्यक्त्व हों सकते हैं क्योंकि भावस्त्री वेदी मोक्ष जा सकते हैं।
*प्रश्न १५) स्त्रीवेद में कौन-कौन सी संज्ञाओं का अभाव हो सकता है?*
उत्तर - स्त्रीवेद में दो संज्ञाओं का अभाव हो सकता है- आहार संज्ञा तथा भय संज्ञा।
आहार संज्ञा छठे गुणस्थान तक होती है सातवे गुणस्थान मे चली जाती है।
भय संज्ञा आठवे गुणस्थान तक होती है नौवे गुणस्थान मे चली जाती है।
सातवे गुणस्थान मे वेद अतिमंद हो जाते है, छठे मे तो तीव्र भी हो सकते है।
भाववेद स्त्री हो द्रव्य से पुरुष हो ऐसे लोग मोक्ष जा सकते है, लेकिन जो तीर्थंकर होते है वे द्रव्य से भी और भाव से भी पुरुष वेद वाले होते है।
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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*
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