गुरुवार, 25 दिसंबर 2025

25) चौबीस ठाणा आहारकद्विक काययोग

25) चौबीस ठाणा आहारकद्विक काययोग
https://youtu.be/l7PwFJwPDw4?si=V8I2Q6L_mb_YlX90

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*द्विक यानि दो, आहारकद्विक का अर्थ है आहारक काययोग और आहारक मिश्न काययोग*

*✍️२४ स्थान आहारकद्विक काययोग*
*०१) गति      ०१/०४*   मनुष्य गति
*०२) इन्द्रिय    ०१/०५*   पंचेन्द्रिय
*०३) काय      ०१/०६*   त्रसकाय
*०४) योग   स्वकीय/१५* आहारकद्विक
*०५) वेद         ०१/०३*  पुरुषवेद 
*०६) कषाय     ११/२५* कषाय ०४ नोकषाय ०७
(संजवलन चतुष्क तथा स्त्रीवेद नपुंसकवेद को छोडकर बाकी ०७ नोकषाय)
*०७) ज्ञान        ०३/०८* मति, श्रुत, अवधिज्ञान
*०८) संयम     ०२/०७*  सामायिक, छेदोपस्थापना
*०९) दर्शन      ०३/०४*  तीन दर्शन
      (चक्षुदर्शन,अचक्षुदर्शन,अवधिदर्शन)
*१०) लेश्या     ०३/०६*  पीत, पदम, शुक्ल लेश्या
*११) भव्यक्त्व   ०१/०२*  भव्य 
*१२) सम्यक्त्व   ०२/०६*  क्षायिक, क्षायोपशमिक
*१३) संज्ञी         ०१/०२*  सैनी
*१४) आहारक   ०१/०२*  आहारक
      मिश्न मे भी आहारक, आहारक मे भी आहारक
*१५) गुणस्थान   ०१/१४*  छठा गुणस्थान
*१६) जीवसमास  ०१/१९*  सैनी पंचेन्द्रिय
*१७) पर्याप्ति       ०६/०६*  
         मिश्र मे ०२, आहारक मे ०६
*१८) प्राण           १०/१०*  दसो प्राण 
      मिश्न अपेक्षा ०७, आहारक अपेक्षा १० प्राण
*१९) संज्ञा           ०४/०४*  चारो  संज्ञा
आहार संज्ञा, भय संज्ञा, मैथुन संज्ञा, परिग्रह संज्ञा।
*२०) उपयोग      ०६/१२*  मति, श्रुत, अवधिज्ञान, चक्षुदर्शन,अचक्षुदर्शन, अवधिदर्शन
*२१) ध्यान         ०७/१६*  
       आर्त ०३ (निदान बिना), धर्मध्यान ०४
*२२) आस्रव     १२/५७*  कषाय ११, योग स्वकीय
*२३) जाति   १४ लाख/८४ लाख* मनुष्यगति की
*२४) कुल-१४ लाख करोड/१९९.५ लाख़ करोड*
       (मनुष्य गति संबधी कुल)
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*प्रश्न ८६) आहारक काययोग किसे कहते हैं?*
उत्तर- आहारक शरीर के निमित्त से आत्मा के प्रदेशो मे कम्पन होना आहारक काययोग है। यह छठवे गुणस्थानवर्ती मुनिराज जो आहारक ऋद्धि के धारक हो, असंयम का परिहार, आगम के किसी विषय मे शंका हो, जिज्ञासा होने पर उनके मस्तक से एक हाथ प्रमाण पुतला निकलता है, यह पुतला है आहारक शरीर तथा इसमे जो हाथ पैर आदि निकलना आहारक अंगोपांग कहलाता है। इस आहारक शरीर के निमित्त से आत्मा के प्रदेशो मे होने वाला कम्पन आहारक काययोग है। यह आहारक शरीर तीर्थयात्रा के लिए भी निकलता है। यह अंतरमुहूर्त के लिए होता है।  *(गो. जी. २३५)* 
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*विशेष* आहारक शरीर किसी सूक्ष्म तत्व के विषय मे जिसको कुछ संशय उत्पन्न हुआ हो, उस परम ऋषि के मस्तक में-से मूल शरीर को न छोड़कर, निर्मल स्फटिक के रंग का (सफेद वर्ण का), हस्त प्रमाण सर्वांग सुंदर, पुरुषाकार, समचतुरस्र-संस्थान से युक्त, रस, रूधिर, मांस, मेदा, अस्थि, मज्जा और शुक्र इन सात धातुओं से रहित, विष अग्नि एवं शस्त्रादि समस्त बाधाओं से मुक्त, वज्र, शिला, स्तंभ, जल व पर्वतों में से गमन करने मे दक्ष अर्थात मनुष्य लोक मे अप्रतिघाती, जहाँ कही भी केवली य़ा श्रुतकेवली को देखता है वही उनके पादमूल मे जाकर तीन प्रदक्षिणा करता है तथा प्रदक्षिणा करके ही संशय दूर हो जाता है और अंतर्मुहूर्त मे वापिस लौटकर मूल शरीर मे प्रवेश कर जावे सो आहारक शरीर है। आहारक शरीर (पुतला) सूक्ष्म तत्व के विषय मे संशय होने के साथ साथ तीर्थंकरो के अंतिम तीन कल्याणको मे, जिन बिम्ब, जिन गृह वन्दना हेतु भी निकलता है।

*प्रश्न ८७) आहारक मिश्र काययोग किसे कहते हैं?*
उत्तर- जब तक आहारक शरीर पर्याप्त नहीं होता है तब तक उसको आहारक मिश्र कहते हैं और उसके द्वारा होने वाले योग को आहारकमिश्र काययोग कहते हैं । *(धवला ०१/२९७)*
*कार्मण वर्गणा और आहारक वर्गणा के मिश्रण से आहारक मिश्न होता है।*

*प्रश्न ८८) आहारक काययोग में कितने संयम होते हैं?*
उत्तर- आहारक काययोग में दो संयम होते हैं– सामायिक और छेदोपस्थापना। 
परीहारविशुद्धि संयम के साथ आहारकऋद्धि नहीं होती तथा शेष संयम छठे गुणस्थान में नहीं हो सकते हैं इसलिए यहाँ दो संयम कहे गये हैं ।

*प्रश्न ८९) आहारकमिश्र काययोग में कौन-कौनसे सम्यक्त्व नहीं हो सकते हैं?*
उत्तर-आहारकमिश्र काययोग में चार सम्यक्त्व नहीं हो सकते हैं- मिथ्यात्व, सासादन, मिश्र और उपशम सम्यक। 
उपशम सम्यक के साथ आहारक ऋद्धि नहीं होती है इसलिए यहाँ उसका ग्रहण नहीं किया है।

*प्रश्न ९०) आहारकमिश्र काययोग में कितने ध्यान हो सकते हैं?*
उत्तर- आहारकमिश्र काययोग में सात ध्यान पाये जाते हैं- तीन आर्त्तध्यान (निदान के बिना), चार धर्मध्यान होते हैं ।

*प्रश्न ९१) आहारक शरीर की कौन-कौन सी विशेषताएँ हैं?*
उत्तर-आहारक शरीर की विशेषताएँ- 
*०१)* रस आदि सात धातुओं से रहित होता है।
*०२)* समचतुरस संस्थान वाला होता है। 
*०३)* अस्थिबन्धन से रहित अर्थात् संहनन से रहित होता है। 
*०४)* चन्द्रकान्तमणि से निर्मित की तरह अत्यन्त स्वच्छ होता है। (धवल वर्ण)
*०५)* एक हस्त प्रमाण अर्थात् चौबीस व्यवहार अंगुल परिमाण वाला होता है। 
*०६)* उत्तमांग मस्तक से उत्पन्न होता है।
*०७)* पर से अपनी और अपने से पर की बाधा से रहित होता है।
*०८)* आहारक शरीर छठे गुणस्थान वाले मुनिराज के ही होता है।   *(गो. जी. २३७)*
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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*

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