गुरुवार, 24 जुलाई 2025

17. चौबीस ठाणा–योग मार्गणा

17. चौबीस ठाणा–योग मार्गणा
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*प्रश्न ०१) योग मार्गणा किसे कहते हैं?*
उत्तर : कर्म (कार्मण) वर्गणा रूप पुद्‌गल स्कन्धों को  "ज्ञानावरण आदि"  आठो कर्म रूप से और 
नोकर्म वर्गणा रूप पुद्‌गल स्कन्ध को  "औदारिक आदि शरीर"  रूप से परिणमन हेतु (भाव योग) जो सामर्थ्य है तथा आत्मप्रदेशों के परिस्पन्द (हलन चलन) को योग (द्रव्ययोग) कहते हैं।
*कर्म वर्गणा* ज्ञानावरणादि आठो कर्म मे
*नोकर्म वर्गणा* औदारिक आदि शरीर रुप मे
*भाव योग* परिणमन की शक्ति को
*द्रव्य योग* आत्म प्रदेशो का परिस्पंदन को
*०१)* जैसे अग्रि के संयोग से लोहे में दहन शक्ति होती है, उसी तरह अंगोपांग नामकर्म और शरीर नामकर्म के उदय से जीव के प्रदेशों में कर्म और नोकर्म को ग्रहण करने की शक्ति उत्पन्न होती है।  *(गो. जी. २१६)*
*०२)* जीवों के प्रदेशों का जो संकोच-विकोच और परिभ्रमण रुप परिस्पन्दन होता है, वह योग कहलाता है।           *(धवला १०/४३७)*
*०३)* मन, वचन, काय वर्गणा निमित्तक आत्म प्रदेशो का परिस्पन्द योग है।  *(धवला १०/४३७)*
*उपर्युक्त योगों में जीवों की खोज करने को योग मार्गणा कहते हैं।*

*प्रश्न ०२) योग कितने होते हैं?*
उत्तर: *योग के दो भेद हैं* द्रव्य योग–भाव योग।
*योग के तीन भेद हैं* मनोयोग, वचनयोग, काययोग
*योग मार्गणा के पन्द्रह भेद होते हैं –*
*मनोयोग ०४* सत्य मनोयोग, असत्य मनोयोग, उभय मनोयोग, अनुभय मनोयोग, 
*वचनयोग ०४* सत्य वचनयोग, असत्य वचनयोग, उभय वचनयोग, अनुभय वचनयोग,
*काययोग ०७* औदारिक-औदारिक मिश्रकाययोग, वैक्रियिक-वैक्रियिक मिश्रकाययोग, आहारक - आहारकमिश्र काययोग, कार्मण काययोग

*प्रश्न ०३) द्रव्ययोग किसे कहते हैं?*
उत्तर : भावयोग रुप शक्ति से विशिष्ट आत्मप्रदेशों में जो कुछ हलन-चलन रूप परिस्पन्द होता है वह द्रव्य योग है।       *( गो.जी. २१६)*

*प्रश्न ०४) भावयोग किसे कहते हैं?*
उत्तर : पुद्‌गल विपाकी अंगोपांग नामकर्म और शरीर नामकर्म के उदय से मन, वचन और काय रुप से परिणत तथा कायवर्गणा, वचनवर्गणा,मनोवर्गणा का अवलम्बन करने वाले संसारी जीव के लोकमात्र प्रदेशों में रहने वाली जो शक्ति कर्मो को ग्रहण करने में कारण है वह भावयोग है।    *(गो.जी.२१६)*

*👉विपाकी* कर्मो का विशेष रुप से पक जाने को, उदय मे आने को विपाक कहते है। कर्मो के पक जाना मे विशेषता कषायों की तीव्रता, मन्दता से होता है। यह विपाक चार प्रकार का होता है–जीव विपाकी, पुदग्ल विपाकी, क्षेत्र विपाकी और भव विपाकी
*◆जीव विपाकी (७८)* जिस कर्म का उदय आने पर सीधा फल जीव को मिले, जीव के परिणामो के निमित्त पडे वे सभी जीव विपाकी प्रकृति है।*जैसे* मोहनीय के उदय का फल जीव को मिलता है।
सभी घतिकर्म की ४७ प्रकृति, गोत्रकर्म ०२, वेदनीय कर्म ०२ और नामकर्म २७*
*◆पुदग्ल विपाकी (६२)* जिन प्रकृतियो के उदय का फल शरीर आदि पुदग्ल के साथ होवे वे पुदग्ल विपाकी है। सभी प्रकृति नामकर्म मे ही होती है।
*जैसे* शरीर नामकर्म, बंधन नामकर्म, अंगोपांग नामकर्म आदि
*◆क्षेत्र विपाकी (०४)* जिसका प्रकृतियो का फल एक क्षेत्र विशेष होता है क्षेत्र विपाकी कहते है।इनका उदय विग्रहगति मे होता है। एक भव से दुसरे भव मे जाते हुए मिलता है। ये चार होती है–नरक गत्यानुपूर्वी, तिर्यंच गत्यानुपूर्वी, मनुष्य गत्यानुपूर्वी और देव गत्यानुपूर्वी 
*◆भव विपाकी (०४)* जिन प्रकृतियो के उदय का फल जीव के भव (आयु) अर्थात पर्याय विशेष मे फल देते है उसे भव विपाकी कहते है। ये चार होती है- नरकायु, तिर्यंचायु, मनुष्यायु, देवायु

*प्रश्न ०५) मनोयोग किसे कहते हैं?*
उत्तर : अभ्यन्तर में वीर्यान्तराय और नोन्द्रियावरण कर्म के क्षयोपशम रूप मनोलब्धि के सन्निकट होने पर और बाह्य निमित्त रूप मनोवर्गणा का अवलम्बन होने पर मनःपरिणाम के प्रति अभिमुख हुए आत्मा के प्रदेशों का जो परिस्पन्द होता है उसे मनोयोग कहते हैं।          *(रा. वा. ०६/१०)*
मनोवर्गणा से निष्पन्न हुए द्रव्य के आलम्बन से जो संकोच-विकोच होता है वह मनोयोग है।
*(धवला ०७/७६)*
मन की उत्पत्ति के लिए जो प्रयत्न होता है उसे मनोयोग कहते हैं। 

*प्रश्न ०६) वचनयोग किसे कहते हैं?*
उत्तर : भाषा वर्गणा सम्बन्धी पुद्‌गल स्कन्धों के अवलम्बन से जीव प्रदेशों का जो संकोच-विकोच होता है वह वचनयोग है।  *(धवला ०७/७६)*
शरीर नामकर्म के उदय से प्राप्त हुई वचन वर्गणाओं का अवलम्बन लेने पर तथा वीर्यान्तराय का क्षयोपशम और मति अक्षरादि (मतिज्ञान आदि) ज्ञानावरण के क्षयोपशम आदि से अभ्यंतर में वचन लब्धि का सान्निध्य होने पर वचन परिणाम के अभिमुख हुए आत्मा के प्रदेशों का जो परिस्पन्दन होता है वह वचनयोग कहलाता है। *(सर्वा. ६१०)*

*प्रश्न ०७) काययोग किसे कहते हैं?*
उत्तर : वीर्यान्तराय कर्म का क्षयोपशम होने पर औदारिक आदि सात प्रकार की कायवर्गणाओं में से किसी एक का उदय होने से जो आत्मा के प्रदेशो में परिस्पन्दन होता है, वह काययोग है 
*(सर्वा.सि. ०६/०१)*
 जो चतुर्विध शरीरों के अवलम्बन से जीवप्रदेशों का संकोच-विकोच होता है, वह काययोग है।
 *(धवला ०७/७६)*
वात, पित्त व कफ आदि के द्वारा उत्पन्न परिश्रम से जीव प्रदेशों का जो परिस्पन्द होता है वह काययोग कहा जाता है।    *(धवला १०/४३७)*

*प्रश्न ०८) योग मार्गणा कितने प्रकार की होती है?*
उत्तर : योग मार्गणा के अनुवाद की अपेक्षा मनोयोगी, वचनयोगी तथा काययोगी तथा अयोगी जीव होते हैं।  *(षट खण्डागम २७२/८०)*
अत: योग मार्गणा तीन प्रकार की होती है – मनोयोग, वचनयोग, काययोग । 
*औदारिक, वैक्रियिक, आहारक, कार्मण व तैजस शरीर के निमित्त से योग नहीं बनता है, इसलिए उसे ग्रहण नहीं किया है।*

*प्रश्न ०९) योगमार्गणा में द्रव्य योग को ग्रहण करना चाहिए या भावयोग को?*
उत्तर : योगमार्गणा में भावयोग को ही ग्रहण करना चाहिए। 
सूत्र में आये हुए ‘ इमानि’ पद से प्रत्यक्षीभूत भावमार्गणा स्थानों का ग्रहण करना चाहिए। द्रव्य मार्गणाओं का ग्रहण नहीं किया गया है, क्योंकि द्रव्य मार्गणाएँ देश, काल और स्वभाव की अपेक्षा दूरवर्ती हैं, अतएव अल्पज्ञानियों को उनका प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है । ( ध.१७/१३१)

*प्रश्न १०) योग क्षायोपशमिक है तो केवली भगवान के योग कैसे हो सकता है?*
उत्तर : वीर्यान्तराय और ज्ञानावरण कर्म के क्षय हो जाने पर भी सयोगकेवली के जो तीन प्रकार की वर्गणाओं की अपेक्षा आत्मप्रदेश पीरस्पन्दन होता है वह भी योग है, ऐसा जानना चाहिए *(सर्वा.६१०)*
सयोग केवली में योग के अभाव का प्रसग नहीं आता, योग में क्षायोपशमिक भाव तो उपचार से हैं । असल में तो योग औदयिक भाव ही है और औदयिक योग का सयोग केवली में अभाव मानने में विरोध आता है।   *(धवला ०७/७६)*
शरीर नामकर्म के उदय से उत्पन्न योग भी तो लेश्या माना गया है, क्योंकि वह भी कर्मबंध में निमित्त होता है। इस कारण कषाय के नष्ट हो जाने पर भी योग रहता है।   *(धवला ०७/१०५)*
*नोट* शरीर नामकर्म की उदीरणा व उदय से योग उत्पन्न होता है इसलिए योग मार्गणा औदयिक है।?(धवला ०९/३१६)* 

*प्रश्न ११) अयोग केवली (योग रहित जीव) कैसे होते हैं?*
उत्तर : जिन आत्माओं के पुण्य-पाप रूप प्रशस्त और अप्रशस्त कर्मबन्ध के कारण मन, वचन, काय की क्रिया रूप शुभ और अशुभ योग नहीं हैं वे आत्माएँ चरम गुणस्थानवर्ती अयोगकेवली और उसके अनन्तर गुणस्थानों से रहित सिद्ध पर्याय रूप परिणत मुक्त जीव होते हैं।   *(गो. जी. २४३)*) 
जो मन, वचन, काय वर्गणा के अवलम्बन से कर्मों के ग्रहण करने में कारण आत्मा के प्रदेशों का पीरस्पन्दन रूप जो योग है, उससे रहित चौदहवें गुणस्थानवर्ती अयोगी जिन होते हैं। 
*(बृ.द्र.स.टीका १३)*
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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*

गुरुवार, 10 जुलाई 2025

16. चौबीस ठाणा-त्रसकायिक व समुच्चय प्रश्न

16. चौबीस ठाणा-त्रसकायिक व समुच्चय प्रश्न*
https://youtu.be/peMV_pkYUOs?si=eRg8l4CQApeQqfkN

*२४ स्थान त्रसकायिक*
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 *०१) गति      ०४/०४*   
नरक, तिर्यंच, मनुष्य और देवगति
*०२) इन्द्रिय    ०४/०५*   
द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, पंचेन्द्रिय
*०३) काय      ०१/०६*  त्रसकाय
*०४) योग       १५/१५*  सभी
*०५) वेद         ०३/०३*  तीनों
*०६) कषाय     २५/२५* कषाय १६ नोकषाय ०९
*०७) ज्ञान        ०८/०८* आठो ज्ञान
*०८) संयम      ०७/०७*  सातो संयम
*०९) दर्शन      ०४/०४*  चारो दर्शन
चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन, अवधिदर्शन, केवलदर्शन
*१०) लेश्या      ०६/०६*  छहो लेश्या
कृष्ण, नील, कापोत, पीत, पदम और शुक्ल
*११) भव्यक्त्व   ०२/०२*  भव्य और अभव्य
*१२) सम्यक्त्व   ०६/०६*  छहो
मिथ्यात्त्व, सासादन, मिश्र, औपशमिक, क्षायिक, क्षयोपशमिक सम्यक्त्व
*१३) संज्ञी         ०२/०२*  संज्ञी, असंज्ञी
*१४) आहारक   ०२/०२*  आहारक ,अनाहारक
*१५) गुणस्थान   १४/१४*  सभी चौदह गुणस्थान
*१६) जीवसमास  ०५/१९*  पाँच
द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, असैनी पंचेन्द्रिय, सैनी पंचेन्द्रिय
*१७) पर्याप्ति       ०६/०६*  छहो
आहार,शरीर,इन्द्रिय,श्वासोच्छवा,भाषा,मनःपर्याप्ति
*१८) प्राण           १०/१०*  दसो प्राण
*१९) संज्ञा           ०४/०४*  सभी संज्ञा
आहार संज्ञा, भय संज्ञा, मैथुन संज्ञा, परिग्रह संज्ञा।
*२०) उपयोग      १२/१२*  सभी बारह
*२१) ध्यान         १६/१६*  सभी सोलह
*२२) आस्रव       ५७/५७*  
मिथ्यात्व ०५, अविरति १२, कषाय २५, योग १५
*२३) जाति   ३२ लाख/८४ लाख*  
*२४) कुल–१३२.५ लाख करोड/१९९.५ लाख करोड* 
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✍️ त्रस जीव के प्रकार :-
त्रस जीव दो प्रकार के हैं-  विकलेन्द्रिय, सकलेन्द्रिय
*∆ विकलेन्द्रिय* द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय तथा चतुरिन्द्रिय जीवों को विकलेन्द्रिय जीव जानना चाहिए ।
*∆ सकलेन्द्रिय* सिंह आदि थलचर, मच्छादि जलचर, हँस आदि आकाशचर तिर्यंच, देव, नारकी, मनुष्य ये सब पंचेन्द्रिय जीव हैं  *(मूलाचार २१८/११ आ.)*
*अथवा* त्रस जीव पर्याप्त तथा अपर्याप्त के भेद से भी दो प्रकार के हैं। *(धवला १२/३७१)* 
*त्रस जीव चार प्रकार के हैं* द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, पंचेन्द्रिय।   *(नयचक्र १२२)*

*प्रश्न ३०) ऐसे कौनसे त्रस जीव हैं जिनके औदारिक काययोग नहीं होता है?*
उत्तर:  वे त्रस जीव जिनके औदारिक काययोग नहीं होता है-
*०१)* विग्रहगति, निर्वृत्यपर्याप्त, लब्ध्यपर्याप्तक अवस्था में स्थित त्रस जीव के नही है।
औदारिक काययोग पर्याप्तक होने पर ही शुरु होता है, निर्वृत्यपर्याप्तक मे भी नही होता, क्याकि शरीर पर्याप्ति पूर्ण होने पर ही औदारिक काययोग होता है। लब्ध्यपर्याप्तक के तो एक भी पर्याप्ति पूर्ण नही होती है।
*०२)* चौदहवें गुणस्थान वाले अयोग केवली भगवान के भी कोई योग ही नहीं होता है।
*०३)* देव-नारकी के भी औदारिक काययोग नही होता क्योकी इनके वैक्रियक काययोग होता है।
*०४)* एक समय में एक जीव के एक ही योग होता है इसलिए किसी भी योग के साथ कोई भी योग नहीं होता है।

*प्रश्न ३१) क्या ऐसे कोई त्रस जीव हैं जिनके वेद का अभाव हो गया हो?*
उत्तर: हाँ है, नवम गुणस्थान की अवेद अवस्था से लेकर चौदहवें गुणस्थान तक स्थित त्रस जीवों के वेद का अभाव हो जाता है।

*प्रश्न ३२) त्रस जीवों की निर्वृत्यपर्याप्त अवस्था मे कितने प्राण होते हैं?*
उत्तर: त्रस जीवों की निर्वृत्यपर्याप्त अवस्था में कम- से -कम ०३ प्राण, (स्पर्श इन्द्रिय, कायबल और आयु) अधिक से अधिक सात प्राण होते है जिसमे इन्द्रिय बढती जाती है।
★समुद्धात केवली के दो प्राण–कायबल, आयुप्राण
★त्रस जीवो की पर्याप्तक अवस्था मे कम से कम एक आयु प्राण होता है अयोग केवली गुणस्थान है।

*प्रश्न ३३) क्या ऐसे कोई त्रस जीव हैं जिनके संज्ञाएँ नहीं होती हैं?*
उत्तर: हाँ है, ग्यारहवें गुणस्थान से लेकर चौदहवें गुणस्थान तक के त्रस जीवों के आहारादि कोई संज्ञाएँ नहीं होती हैं।   *(गोम्मटसार जीवकाण्ड जीवतत्व ७०२)*

*प्रश्न ३४) क्या ऐसा कोई त्रस जीव है, जिसके जीवन में सभी उपयोग हो जाते हो?*
उत्तर :हाँ, किसी एक तद्‌भव मोक्षगामी मनुष्य के अपने जीवनकाल में सभी उपयोग हो सकते हैं, अन्य किसी जीव के नहीं हो सकते ।
किसी मनुष्य के मिथ्यात्व सहित जन्म लेने पर कुमति और कुश्रुतज्ञानो होगा तथा चक्षु और अचक्षु दर्शनोपयोग सभी मनुष्यों के होते ही हैं। 
मिथ्यात्व अवस्था मे अवधिज्ञान भी हो सकता जिससे उसके कुवधिज्ञानोपयोग हो सकता है।
इस जीव के बाद मे सम्यक्त्व हो जाए तो उसके तीनो मिथ्यात्व सम्यक्त्व मे बदल जाएगे–मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञानोपयोग तथा अवधिज्ञान होने पर उसके अवधिदर्शनापयोग भी हो जाता है।बाद में दिक्षा लेने पर मनःपर्यय ज्ञान भी हो सकता है।उसके बाद वह जीव केवलज्ञान भी प्राप्त कर सकता हैं। केवलज्ञान के साथ-साथ केवलदर्शनोपयोग भी हो जाता हैं।
इस प्रकार से एक जीव को एक ही भव मे सभी बारह उपयोग हो सकते है।
यह स्थिति मनुष्यगति जीव को पहले गुणस्थान से तेरहवे (०१–१३) गुणस्थान तक घटित होते है।
*नोट* कुमति, कुश्रुत, कुअवधिज्ञानो सम्यक्त्व प्राप्त होने के बाद भी हो सकते हैं, अगर वह सम्यक्त्व के बाद मिथ्यात्व मे आ जाए।

*प्रश्न ३५) त्रस जीवों के कम- से-कम कितने आस्रव के प्रत्यय होते हैं।?*
उत्तर: त्रस जीवों के कम-से-कम सात आस्रव के प्रत्यय होते हैं। ये तेरहवें गुणस्थान में होते हैं।
मनोयोग ०२ (सत्य-अनुभय), वचनयोग ०२ (सत्य अनुभय), औदारिक काययोग, औदारिक मिश्र काययोग, कार्मण काययोग।
सूक्ष्मदृष्टि से देखा जाय तो मनोयोग और वचनयोग का निरोध हो जाने पर (उस अवस्था में स्थित सभी जीवों के) मात्र एक औदारिक काययोग ही आस्रव का कारण बचता है। इस अपेक्षा त्रस जीवों के कम- से-कम एक आस्रव प्रत्यय होता है। 
अयोगी भगवान भी त्रसकाय हैं, उनके एक भी आस्रव का प्रत्यय शेष नहीं है ।

*प्रश्न ३६) क्या सभी त्रस जीवों के ५७ आस्रव के प्रत्यय हो सकते हैं?*
उत्तर: नहीं हो सकते, नाना जीवों की अपेक्षा त्रस जीवों के कुल सत्तावन आस्रव के प्रत्यय होते हैं–

सत्य मनो-वचन, असत्य वचन– संज्ञीपंचेन्द्रिय के
०२-१३ गुणस्थान तक
असत्य उभय मन-वचन–          संज्ञीपंचेन्द्रिय के
०२-१२ गुणस्थान तक
अनुभय वचन योग –          द्वीन्द्रिय से पंचेन्द्रिय के
०१–१३ गुणस्थान तक
औदारिकद्विक काययोग –      मनुष्य व तिर्यंचो के 
०१ से १३ गुणस्थान तक
वैक्रियिकद्विक काययोग –     देव व नारकियों के
आहारकद्विक काययोग –छठे गुणस्थानवर्ती मुनी के
कार्मणकाययोग –           चारो गतियो मे
स्त्रीवेद पुरुषवेद –देव, मनुष्य, पंचेन्द्रिय तिर्यंचो के
०५ मिथ्यात्व, २३ कषाय –मिथ्यादृष्टि विकलत्रय के
१२ अविरति–       मात्र संज्ञी पंचेन्द्रि के ही होती हैं
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एकेन्द्रिय़ के ०७ अविरति, द्वीन्द्रिय के ०८ अविरति, त्रीन्द्रिय के ०९ अविरति,चतुरिन्द्रिय के १० अविरति, असैनी पंचेन्द्रिय जीव के ११ अविरति होती हैं।

*प्रश्न ३७) त्रस जीवों की ३२ लाख जातियों कौन- कौन सी हैं?*
उत्तर: त्रस जीवों की बैत्तीस(३२) लाख जातियाँ है-
द्वीन्द्रिय की    ०२ लाख,  त्रीन्द्रिय की ०२ लाख
चतुरिन्द्रिय की ०२ लाख, पंचेन्द्रिय तिर्यंच ०४ लाख
नारकियों की   ०४ लाख, देवों की  ०४ लाख,
मनुष्य की १४ लाख जातियाँ है।

*प्रश्न ३८) त्रस जीवों के १३२.५ लाख करोड़ कुल कौन-कौन से हैं?*
उत्तर : त्रस जीवों के १३२.५  लाख करोड कुल-
द्वीन्द्रियों के –०७ लाख करोड़ कुल
त्रीन्द्रियोंके के– ०८ लाख करोड कुल
चतुरिन्द्रिय के –०९ लाख करोड़ कुल
नारकियों के –  २५ लाख करोड़ कुल
देवों के –         २६ लाख करोड कुल  
मनुष्यों के –     १४ लाख करोड़ कुल
*पंचेन्द्रिय तिर्यंच मे–*
जलचरों के १२.५ लाख करोड़ कुल
थलचरों के १९ लाख करोड़ कुल
नभचरों के १२ लाख करोड़ कुल
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*– समुच्चय प्रश्नोत्तर –*
*प्रश्न ३९) ऐसी कौनसी कषायें हैं जो त्रस्र जीवों के तो होती हैं लेकिन स्थावर जीवों के नहीं होती हैं?*
उत्तर :मात्र दो कषायें ऐसी हैं जो त्रस जीवों के होती हैं लेकिन स्थावर जीवों के नहीं होती- स्त्रीवेद और पुरुषवेद नोकषाय।

*प्रश्न ४०) ऐसी कौनसी अविरति हैं जो त्रस तथा स्थावर दोनों के होती हैं?*
उत्तर : सात (०७) अविरतियाँ त्रस तथा स्थावर दोनों जीवों के होती हैं- षट्‌काय जीवो की हिंसा सम्बन्धी तथा स्पर्शन इन्द्रिय सम्बन्धी अविरति

*प्रश्न ४१) चौबीस स्थानों में से ऐसे कौन से स्थान हैं जिनके सभी उत्तरभेद त्रसों में पाये जाते है?*
उत्तर :चौबीस स्थानों में से १९ स्थान ऐसे हैं जिनके सभी उत्तर भेद त्रसों में पाये जाते हैं- 
०१) गति, ०२) योग, ०३) वेद, ०४) कषाय, ०५) ज्ञान, ०६) संयम, ०७) दर्शन, ०८) लेश्या, ०९) भव्य, १०) सम्यक्त्व, ११) संज्ञी, १२) आहारक, १३) गुणस्थान, १४) पर्याप्ति, १५) प्राण, १६) सज्ञा, १७) उपयोग, १८) ध्यान, १९) आसव के प्रत्यय

*जो मात्र त्रसो मे नही है स्थावरो मे है उनमे–*
*०१) इन्द्रिय* यहा एकेन्द्रिय भेद त्रसो मे नही पाया जाता स्थावरो मे होता है।
*०२) काय* स्थावर काय त्रसो मे नही होती, एकेन्द्रिय मे होती है।
*०३) जीव समास* के १९ भेदो मे से १४ भेद ऐकेन्द्रियो मे होते है।
*०४) जाति* के सभी भेदो के लिए ऐकेन्द्रियो में (स्थावरो मे) जाना पडेगा।
*०५) कुल* के सभी भेदो के लिए ऐकेन्द्रियो में (स्थावरो मे) जाना पडेगा।

*प्रश्न ४२) स्थावर जीवों में किस- किस स्थान के सभी उत्तर भेद नहीं पाये जाते हैं?*
उत्तर :स्थावर जीवों में इक्कीस(२१)स्थानों के सभी उत्तर भेद नहीं पाये जाते हैं- भव्य, आहारक, संज्ञा इन तीन स्थानों को छोड्‌कर शेष सभी स्थानों के सभी उत्तर भेद स्थावर जीवों में नहीं पाये जाते हैं अर्थात् गति, इन्द्रिय, काय, योग, वेद, कषाय, ज्ञान, संयम, दर्शन, लेश्या, सम्यक्त्व, संज्ञी, गुणस्थान, जीवसमास, पर्याप्ति, प्राण, उपयोग, ध्यान, आस्रव के प्रत्यय, जाति तथा कुल इन २१ स्थानों के सभी उत्तर भेद नहीं होते हैं।
*०१) भव्य* के दोनो भेद भव्य और अभव्य स्थावरो मे होते है।
*०२) आहारक* के दोनो भेद आहारक अनाहारक स्थावरो मे भी होते है, क्योकी स्थावरो मे भी विग्रहगति होती है, और विग्रहगति के समय जीव अनाहारक रहता है।
*०३) संज्ञा* स्थावरो मे संज्ञा के चारो भेद होते है।
ये तीन स्थान ऐसे है जिनके सभी भेद स्थावरो मे पाये जाते है बाकी जो इक्कीस (२१) भेदो है उनके सभी भेद स्थावरो मे नही पाए जाते
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*०१) गति* चारो गति मे से स्थावरो मे केवल तिर्यंच गति होती है।
*०२) इन्द्रिय* के पाँच भेदो मे से स्थावरो मे केवल स्पर्शन इन्द्रिय होती है।
*०३) काय* के छह भेदो मे से केवल पाँच भेद स्थावरो में पाए जाते है, त्रसो मे नही।
*०४) योग* १५ भेदो मे से स्थावरो में तीन भेद है
*०५) वेद* तीन भेदो मे से स्थावरो मे नपुंसक वेद है
*०६) कषाय* २५ भेद मे से २३ भेद ही स्थावरों मे है। स्त्रीवेद और पुरुषवेद नोकषाय नही होती है।
*०७) ज्ञान* आठ ज्ञानो मे से स्थावरो मे कुमति और कुश्रुत ज्ञान दो हीं भेद होते है।
*०८) संयम* सात भेदो मे से स्थावरो मे असंयम है।
*०९) दर्शन* चार भेदो मे से स्थावरो मे एक अचक्षुदर्शन होता है।
*१०) लेश्या* छ्ह भेदो में से स्थावरो मे तीन अशुभ लेश्या कृष्ण-नील-कापत लेश्या होती है।
*११) सम्यक्त्व* सात सम्यक्त्व मे से स्थावरो मे मिथ्यात्व और सासादन सम्यक्त्व होता है।
*१२) संज्ञी* दो भेदो मे से स्थावर असंज्ञी होते है।
*१३) गुणस्थान* चौदह भेदो मे से स्थावरो के मिथ्यात्व और सासादन गुणस्थान होता है।
*१४) जीवसमास* उन्नीस मे से चौदह जीवसमास स्थावरो में होते है 
*१५) पर्याप्ति* छह पर्याप्ति मे से स्थावरो में चार पर्याप्ति होती है।
*१६) प्राण* दस प्राण मे से स्थावरो के चार होते है।
*१७) उपयोग* बारह मे से तीन उपयोग स्थावरो मे होते है।
*१८) ध्यान* सोलाह भेदो मे से स्थावरो मे आठ ध्यान होते है-आर्त ०४, रौद्र ०४
*१९) आस्रव के प्रत्यय* ५७ प्रत्यय मे से स्थावरो मे ३८ प्रत्यय होते है।
*२०) जाति* ८४ लाख मे से स्थावरो मे ५२ लाख जाति है।
*२१) कुल* स्थावरो मे ६७ लाख करोड कुल है।

*प्रश्न ४३) ऐसे कौन- कौनसे उत्तर भेद हैं जो त्रसों में होते हैं लेकिन स्थावरों में नहीं होते हैं?*
उत्तर: २१ स्थान ऐसे है जो त्रसों में होते हैं लेकिन स्थावरों में नहीं होते हैं-
*०१)* गतियाँ ०३* नरक, मनुष्य, देव
*०२)* इंद्रियाँ ०४* दो, तीन, चार, पाँच इन्द्रि
*०३)* काय ०१*   त्रसकाय
*०४)* योग १२*    मन०४ वचन ०४ काय ०४
*०५)* वेद ०२*     स्त्रीवेद, पुरुषवेद
*०६)* कषाय ०२*  स्त्रीवेद, पुरुषवेद नोकषाय
*०७)* ज्ञान ०६*     ज्ञान ०५ कुज्ञान ०१
*०८)* सयंम ०६* असंयम को छोडकर बाकी छहो
*०९)* दर्शन ०३* चक्षु, अवधि, केवलदर्शन
*१०)* लेश्या ०३* तीन लेश्या–पीत-पदम-शुक्ल
*११)* सम्यक्त्व ०४* 
मिथ्यात्व-सासादन को छोडकर बाकी चार
*१२)* संज्ञी ०१*  संज्ञी जीव ये स्थावरो मे नही
*१३)* ग़ुणस्थान १२* 
मिथ्यात्व सासादन के अलावा बाकी १२ गुणस्थान
*१४)* जीवसमास ०५* स्थावरो मे नही है
*१५)* पर्याप्ति ०२* भाषा और मनपर्याप्ति
*१६)* प्राण०२* भाषा और मनःपर्याप्ति
*१७)* उपयोग ०९* 
ज्ञानोपयोग ०६, दर्शनापयोग ०३
*१८)* ध्यान ०८* धर्मध्यान ०४, शुक्लध्यान ०४
*१९)* आस्रव १९* अविरति ०५, वेद ०२, योग १२
*२०)* जाति ३२ लाख  त्रस मे है
*२१)* १३२.५ लाख करोड त्रस मे है स्थावरो मे नही    *ये सभी त्रस मे होते है स्थावरो मे नही*

*प्रश्न ४४) त्रस काय की जाति एवं पंचेन्द्रिय की जाति में क्या अन्तर है?*
उत्तर: त्रस काय की जातियों से पंचेन्द्रिय जीवों में ०६ लाख जातियों का अन्तर है। 
अर्थात् त्रसकाय में ३२ लाख जातियाँ हैं तथा पंचेन्द्रिय जीवों की मात्र २६ लाख जातियाँ हैं। 
त्रस जीवों में विकलत्रय की जातियाँ भी होती हैं, पंचेन्द्रियों में नहीं ।

*प्रश्न ४५) किस काय वाले के सबसे ज्यादा कुल होते हैं?*
उत्तर: त्रसकायिक जीवों के कुल सबसे ज्यादा हैं क्योंकि उनमें द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, देव, नारकी, मनुष्य तथा पंचेन्द्रिय तिर्यंच सबके कुलों का ग्रहण होता है। 
स्थावरकाय में केवल एकेन्द्रिय जीवों के कुलों का ही ग्रहण होता है। त्रसों के १३२.५ लाख करोड़ तथा पृथ्वीकायिकादि पाँचो स्थावरो के ६७ लाख करोड कुल होते है।

*प्रश्न ४६) जलकायिक के कुल के बराबर कुल कौन सी कायवालों के होते हैं?*
उत्तर: जलकायिक के कुल के बराबर वायुकायिक के कुल के होते है। दोनों में प्रत्येक के ०७ लाख करोड़ कुल होते हैं ।
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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*

गुरुवार, 26 जून 2025

15. चौबीस ठाणा- वनस्पतिकायिक

15. चौबीस ठाणा- वनस्पतिकायिक*
https://youtu.be/8a9e_yMahdQ?si=q6pwJwf8qH0O_1-c
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*२४ स्थान वनस्पतिकायिक*
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*०१) गति       ०१/०४*   तिर्यंचगति, 
*०२) इन्द्रिय    ०१/०५*   एकेन्द्रिय (स्पर्शनेन्द्रिय)
*०३) काय      ०१/०६*  स्थावरकाय
स्वकिय काय (वनस्पतिकायिक)
*०४) योग        ०३/१५*  
औदारिकद्विक काययोग, कार्मण काययोग
*०५) वेद          ०१/०३*  नपुंसकवेद
*०६) कषाय     २३/२५* कषाय १६ नोकषाय ०७
स्त्रीवेद नोकषाय और पुरुषवेद नोकषाय नही होता
*०७) ज्ञान         ०२/०८*  कुमतिज्ञान, कुश्रुतज्ञान
*०८) संयम        ०१/०७*  असंयम
*०९) दर्शन        ०१/०४*  अचक्षुदर्शन
*१०) लेश्या        ०३/०६*  कृष्ण, नील, कापोत
*११) भव्यक्त्व    ०२/०२*  भव्य और अभव्य
*१२) सम्यक्त्व    ०२/०६*  मिथ्यात्व,सासादन
*१३) संज्ञी          ०१/०२*  असंज्ञी
*१४) आहारक    ०२/०२*  आहारक ,अनाहारक
*१५) गुणस्थान    ०२/१४*  मिथ्यात्व,सासादन
*१६) जीवसमास  ०६/१९*  वनस्पति संबंघी
नित्यनिगोद सूक्ष्म-बादर, इतरनिगोद सूक्ष्म-बादर, सप्रतिष्ठित प्रत्येक-अप्रतिष्ठित प्रत्येक वनस्पति
*१७) पर्याप्ति    ०४/०६*  
आहार, शरीर, इन्द्रिय, श्वासोच्छवास पर्याप्ति।
*१८) प्राण         ०४/१०*  
स्पर्शन इन्द्रिय, कायबल, आयु, श्वासोच्छवास प्राण
*१९) संज्ञा         ०४/०४*  सभी चारो संज्ञा
आहार संज्ञा, भय संज्ञा, मैथुन संज्ञा, परिग्रह संज्ञा।
*२०) उपयोग      ०३/१२*  
कुमतिज्ञान, कुश्रुतज्ञानापयोग, अचक्षुदर्शनोपयोग
*२१) ध्यान         ०८/१६*  आर्त ०४, रौद्र ४
*आर्त* इष्टवियोगज,अनिष्टसंयोगज,वेदना,निदान
*रौद* हिंसानन्दी,मृषानन्दी,चौर्यानन्दी,परिग्रहानन्दी
*२२) आस्रव       ३८/५७*  
मिथ्यात्व ०५, अविरति ०७, कषाय २३, योग ०३
*मिथ्यात्व०५* विपरीत,एकान्त,विनय,संशय,अज्ञान
*अविरति ०७* स्पर्शन इन्द्रिय को वश नही करना तथा षट्काय के जीवों की रक्षा नहीं करना
*कषाय २३* १६ अनन्तानुबन्धी आदि ०९नोकषाय
*योग ०३* औदारिकद्विक तथा कार्मण काययोग
*२३) जाति   २४ लाख/८४ लाख*  
नित्यनिगोद ०७ लाख, इतरनिगोद ०७ लाख जाति, 
वनस्पति कायिक की १० लाख जातियाँ है।
*२४) कुल–२८ लाख करोड/१९९.५ लाख करोड* 
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*प्रश्न २०) वनस्पति जीव कितने प्रकार के होते हैं?*
उत्तर-वनस्पति जीव चार प्रकार के हैं–वनस्पति, वनस्पतिकाय, वनस्पतिकायिक, वनस्पति जीव।
*वनस्पति* जिसका अभयन्तर भाग जीवयुक्त है, और बाह्य भाग जीव रहित है, ऐसे वृक्ष आदि को वनस्पति कहते है।
*वनस्पतिकाय* छिन्न-भिन्न किये गये तृण आदि को वनस्पतिकाय कहते हैं।
*वनस्पतिकायिक* जिसमें वनस्पतिकायिक जीव पाये जाते हैं उन्हें वनस्पतिकायिक जीव कहते हैं।
*वनस्पतिजीव* विग्रहगति में स्थित जीव जो वनस्पति मे जन्म लेने जा रहा है।
 *(सि.सा.दी. ११/२२-२५)*

*प्रश्न २१) उत्पत्ती अपेक्षा वनस्पति जीव कौन-कौन से होते हैं?*
उत्तर-पर्व, बीज, कन्द, स्कन्ध तथा बीजबीज, इनसे उत्पन्न होने वाली वनस्पति और सम्मूर्च्छन वनस्पति कही गयी है जो प्रत्येक और साधारण (अनन्तकाय) दो भेद रूप है । मूल में उत्पन्न होने वाली वनस्पतियाँ बीज हैं। *जैसे* हल्दी आदि । *(गो. जी. १८६)*
पर्व=गाँठ (पोर), बीज=धान आदि, कंद=पिण्डालु, 
 
*प्रश्न २२) वनस्पति कितने प्रकार की होती है?*
उत्तर-वनस्पति दो प्रकार की होती है-साधारण (अनंतकाय) वनस्पति और प्रत्येक वनस्पति।

*प्रश्न २३) साधारण वनस्पति किसे कहते हैं?*
उत्तर-जो साधारण नाम कर्म के उदय से होती है वह साधारण वनस्पति है।
जिस कर्म के उदय से जीव साधारण शरीर होता है उस कर्म कि साधारण शरीर यह संज्ञा है। 
*(धवला ०६/६३)*
जिस कर्म के उदय से एक ही शरीर वाले होकर अनन्त जीव रहते हैं,वह साधारण शरीर नामकर्म है।
*(धबला १३/३६५)*
साधारण यानि काँमन, जो अनेक जीवो (अनंत जीव) के लिए काँमन है वह साधारण वनस्पति है।
यह साधारण वनस्पति निगोदिया जीव है।
मूल मे जो जीव है उस जीव का जो शरीर होता है वह एक ही शरीर है और इस शरीर के स्वामी अनंत होते है ये निगोदिया जीव होते है।
*यानि शरीर एक आत्मा अनंत*
साधारण वनस्पति जीवो में अनंत जीवो का भोजन  भी एक साथ, श्वास भी एक साथ, जन्म मरण भी एक साथ करते है। इनकी अवगाहना अंगुल के असंख्यातवें भाग प्रमाण होती है अर्थात् निगोद जीवों की अवगाहना होती है *इसके भी दो भेद है–नित्य निगोद और इतर निगोद*
*नित्य निगोद* जिन जीवों ने आज तक निगोद के अतिरिक्त अन्य कोई पर्याय नहीं पाई उन्हें नित्य निगोद कहते हैं*
*नित्य निगोद के दो भेद होते है- अनादि अनंत नित्यनिगोद, अनादि सांत नित्यनिगोद*
*इतर निगोद* जो जीव निगोद से निकल त्रस पर्याप प्राप्त कर पुनः निगोद मे चले जाते वे इतर निगोद कहलाते है
*नित्य व इतर निगोद दोनो के भी दो -दो भेद है सुक्ष्म और बादर*

*प्रश्न २४) प्रत्येक वनस्पति किसे कहते हैं?*
उत्तर-जो प्रत्येक नाम कर्म के उदय से होती है वह प्रत्येक वनस्पति है। प्रत्येक यानि अपना-अपना शरीर (मालिक) *यानि शरीर एक स्वामी भी एक*
*(धवला ०१/२७०)*
जिस जीव ने एक शरीर में स्थित होकर अकेले ही सुख-दुःख के अनुभव रूप कर्म उपार्जित किया है वह जीव प्रत्येक शरीर है। *(धवला ०३/३३३)*
*प्रत्येक वनस्पति की जघन्य अवगाहना अंगुल के संख्यातवें भाग, उत्कृष्ठ अवगाहना एक हजार योजन तक की अवगाहना होती है। एक हजार की अवगाहना स्वयंभूरमणसमुद्र में कमल की है*
*प्रत्येक वनस्पति के दो भेद है सप्रतिष्ठित प्रत्येक और अप्रतिष्ठित प्रत्येक*
*✍️सप्रतिष्ठित प्रत्येक* शरीर एक स्वामी एक लेकिन इसके आश्रय से अनन्त जीव रहते है।
*जैसे* जितने भी जमीकंद है सभी सप्रतिष्ठित प्रत्येक है। सभी सप्रतिष्ठित वनस्पती अभक्ष्य है। इनमे अनंत जीव पाए जाते है ये अभक्ष्य है।
*जिसका कंद, मूल क्षुद्र शाखा या स्कंध की छाल मोटी हो, जिनकी शिरा, संधि, पर्व अप्रकट हों, जिनका भंग करने पर समान भंग हो, छेदन करने पर भी जो उग आवें, वे सभी सप्रतिष्ठित प्रत्येक वनस्पतिकाय है*
*विशेष* आलू, प्याज, मूली आदि ये सभी प्रत्येक वनस्पति है लेकिन इनके आश्रय से अनेक साधारण निगोदिया जीव रहते है। इसलिए उपचार से इसे साधारण वनस्पति कह देते है। शास्त्र मे इसका नाम सप्रतिष्ठित प्रत्येक वनस्पति कहलाता है। 
*अप्रतिष्ठित प्रत्येक वनस्पति* जिनका शरीर एक, स्वामी एक और आश्रय से कोई जीव नही रहता है उनको अप्रतिष्ठित प्रत्येक वनस्पति कहते है।
*जैसे* लौकी, करेला, गिलकी, शिमला मिर्च, खीरा, केला, सेव, अनार, आम आदि सभी अप्रतिष्ठित प्रत्येक वनस्पति कहलाती है।

*प्रश्न २५) स्थावर और एकेन्द्रिय में क्या अन्तर है?*
उत्तर-एकेन्द्रिय नामकर्म में इन्द्रिय की मुख्यता है और स्थावर नामकर्म में काय की मुख्यता है। एकेन्द्रिय जीवों के एक स्पर्शन इन्द्रिय होती है और स्थावर जीवों के पृथ्वीकायिक आदि नामकर्म का उदय होता है।

*प्रश्न २६) वनस्पति-कायिक सम्बन्धी कितने जीवसमास हैं?*
उत्तर-वनस्पतिकायिक सम्बन्धी छह जीवसमास हैं-
नित्यनिगोद सूक्ष्म, नित्यनिगोद बादर, 
इतरनिगोद सूक्ष्म, इतरनिगोद बादर, 
सप्रतिष्ठित प्रत्येक, अप्रतिष्ठित प्रत्येक

*प्रश्न २७) वनस्पति सम्बन्धी २४ लाख जातियाँ कौन-कौन सी हैं?*
उत्तर-वनस्पति सम्बन्धी २४ लाख जातियाँ-
नित्यनिगोद की ०७ लाख जाति,
इतरनिगोद की ०७ लाख जाति, 
वनस्पति कायिक की १० लाख जातियाँ है।
*नोट* नित्यनिगोद एवं इतर निगोद को वनस्पतिकायिक में ग्रहण नहीं करने पर १० लाख जातियाँ ही होती हैं।

*प्रश्न २८) क्या ऐसे कोई वनस्पतिकायिक जीव हैं, जिनके कार्मण काययोग होता ही नहीं है ?*
उत्तर-हाँ है, जो वनस्पतिकायिक जीव ऋजुगति से जाते हैं, उनके कार्मण काययोग नहीं होता है।
*नोट* इसी प्रकार ऋजुगति से जाने वाले सभी जीवों के जानना चाहिए ।
कार्मण काययोग अनाहारक अवस्था मे होता है, तथा ऋजुगति से जाने पर वह एक ही समय की होती है तथा वहा पर पहले उसी समय मे भी आहार वर्गणा का ग्रहण होता रहता है, अनाहारक नहीं रहते तो कार्मण काययोग कैसे होगा यानि नही होगा।
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*शलभ*

गुरुवार, 12 जून 2025

14. चौबीस ठाणा-काय मार्गणा 24 स्थान- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु जीव

*14. चौबीस ठाणा-काय मार्गणा-२४ स्थान- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु जीव*
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https://youtu.be/kL5jDXdd94E?si=4ULOrJLSYll3R8lS

✍️ काय मार्गणा :-
आत्मा की प्रवृति द्वारा संचित किये गये पुदग्ल पिण्ड को काय कहते है।
जाति नामकर्म के उदय से अविनाभावी त्रस और स्थावर नामकर्म के उदय से उत्पन्न आत्मा को त्रस तथा स्थावर रूप पर्याय को काय कहते हैं।
कर्म आठ होते है, उसमे से एक नामकर्म है जिसके 93 भेद है और इन मे एक कर्म है जाति नामकर्म,  जाति यानि इन्द्रिया–जो पाँच इन्द्रिय है वे पाँच जातियाँ है।
अविनाभावी यानि इसके होने पर इसका होना और इसके ना होने पर इसका नही होना यह अविनाभावी कहलाता है। *जैसे* धुए के होने पर अग्नि का होना और अग्नि के नही होने पर धुए का नही होना।
जाति होगी तो त्रस या स्थावर तो होगा ही या जहाँ पर त्रस या स्थावर है वहा कोई ना कोई जाति होगी। यानि एक के होने पर दुसरे का होना अविनाभावी है
*त्रस और स्थावर पर्याय आत्मा की होती हैं*
व्यवहार नय से त्रस और स्थावर इस प्रकार कहना काय है। पुद्‌गल स्कन्धों के द्वारा जो पुष्टि को प्राप्त हो वह काय है। इसमे हर समय अनंत परमाणु आते है और हर समय अनंत परमाणु चले जाते है। इस प्रकार यह शरीर पुष्ट होता रहता है।
काय की अपेक्षा जीवों का परिचय करना (खोज करना) काय मार्गणा है। *(गोम्मटसार जीवकांड १८२)*

✍️ काय मार्गणा के प्रकार :-
काय मार्गणा छह प्रकार की है- पृथ्वीकाय, जलकाय, अग्निकाय, वायुकाय, वनस्पतिकाय, त्रसकाय। *(द्र.स. टीका १३)*  
पृथ्वीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक, वनस्पतिकायिक, त्रसकायिक तथा कायातीत जीव भी होते हैं।  *(गो. जी.१८)*

✍️ स्थावर जीव :-
स्थावर जीव एक स्पर्शन इन्द्रिय के द्वारा ही जानता है, देखता है, खाता है, सेवन करता है, उसका स्वामीपना करता है इसलिए उसे एकेन्द्रिय स्थावर जीव कहा है।  *(धवला ०१/२४१)*
स्थावर नामकर्म के उदय से जीव स्थावर कहलाते हैं
स्थावर नामकर्म के उदय से उत्पन्न हुई विशेषता के कारण ये पाँचों ही स्थावर कहलाते हैं। *(ध.०१/२६७)*

✍️ त्रसकायिक जीव :-
त्रस नामकर्म के उदय से उत्पन्न वृत्तिविशेष वाले जीव त्रस कहे जाते हैं।  *(राजवार्तिक ०१)* 
वृत्तिविशेष यानि विशेष कार्य *जैसे* रसना इन्द्रिय से रस को चखते है, घ्राण इन्द्रिय से गंध सुंधते है, चक्षु इन्द्रिय से वर्ण को देखते है, कर्ण इन्द्रिय से शब्दों को सुनते है, इस तरह से ये उनके कार्य है।
लोक में जो दो इन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चार इन्द्रिय और पाँच इन्द्रिय से सहित जीव दिखाई देते हैं उन्हें वीर भगवान के उपदेश से त्रसकायिक जानना चाहिए *(पंच संग्रह)*

✍️ अकाय जीव :-
जिस प्रकार सोलह ताव के द्वारा तपाये हुए सुवर्ण में बाह्य किट्टिका और अभ्यन्तर कालिमा इन दोनों ही प्रकार के मल का बिल्कुल अभाव हो जाने पर फिर किसी दूसरे मल का सम्बन्ध नहीं होता, उसी प्रकार महाव्रत और धर्मध्यानादि से सुसंस्कृत एवं सुतप्त आत्मा में से एक बार शुक्ल ध्यान रूपी अग्नि के द्वारा बाह्य मल काय और अंतरंग मल कर्म के सम्बन्ध के सर्वथा छूट जाने पर फिर उनका बन्ध नहीं होता और वे सदा के लिए काय तथा कर्म से रहित होकर सिद्ध हो जाते हैं, वे अकाय है। *(गोम्मटसार जीवकाण्ड २०३)*
बाहय मल मे शरीर और अंतरंग मे कर्म (भावकर्म और द्रव्यकर्म)
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*२४ स्थान पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु जीव*
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*०१) गति       ०१/०४*   तिर्यंचगति, 
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु की तिर्यंचगति
*०२) इन्द्रिय    ०१/०५*   एकेन्द्रिय (स्पर्शनेन्द्रिय)
*०३) काय  स्वकीय/०६*  स्थावरकाय
सबकी अपनी-अपनी काय (स्वकीय)
*०४) योग        ०३/१५*  
औदारिकद्विक काययोग, कार्मण काययोग
*०५) वेद          ०१/०३*  नपुंसकवेद
*०६) कषाय     २३/२५* कषाय १६ नोकषाय ०७
स्त्रीवेद नोकषाय और पुरुषवेद नोकषाय नही होता
*०७) ज्ञान         ०२/०८*  कुमतिज्ञान, कुश्रुतज्ञान
*०८) संयम       ०१/०७*  असंयम
*०९) दर्शन       ०१/०४*  अचक्षुदर्शन
*१०) लेश्या       ०३/०६*  कृष्ण, नील, कापोत
*११) भव्यक्त्व   ०२/०२*   भव्य और अभव्य।
*१२) सम्यक्त्व   ०२/०६*  मिथ्यात्व,सासादन
अग्निकायिक, वायुकायिक में सासादन नहीं है।
*१३) संज्ञी         ०१/०२*  असंज्ञी।
*१४) आहारक   ०२/०२*  आहारक ,अनाहारक
*१५) गुणस्थान   ०२/१४*  मिथ्यात्व,सासादन
सासादन पृथ्वी और जल जीवो मे विग्रहगति अपेक्षा
*१६) जीवसमास  ०८/१९*  
प्रत्येक के सूक्ष्म बादर की अपेक्षा दो-दो जीवसमास
*१७) पर्याप्ति    ०४/०६*  
आहार, शरीर, इन्द्रिय, श्वासोच्छवास पर्याप्ति।
*१८) प्राण         ०४/१०*  
स्पर्शन इन्द्रिय, कायबल, आयु, श्वासोच्छवास प्राण
*१९) संज्ञा         ०४/०४*  सभी संज्ञा
आहार संज्ञा, भय संज्ञा, मैथुन संज्ञा, परिग्रह संज्ञा।
*२०) उपयोग      ०३/१२*  
कुमतिज्ञान, कुश्रुतज्ञानापयोग, अचक्षुदर्शनोपयोग
*२१) ध्यान         ०८/१६*  आर्त ०४, रौद्र ४
*आर्त* इष्टवियोगज,अनिष्टसंयोगज,वेदना,निदान
*रौद* हिंसानन्दी,मृषानन्दी,चौर्यानन्दी,परिग्रहानन्दी
*२२) आस्रव       ३८/५७*  
मिथ्यात्व ०५, अविरति ०७, कषाय २३, योग ०३
*मिथ्यात्व०५* विपरीत,एकान्त,विनय,संशय,अज्ञान
*अविरति ०७* स्पर्शन इन्द्रिय को वश नही करना तथा षट्काय के जीवों की रक्षा नहीं करना
*कषाय २३* १६ अनन्तानुबन्धी आदि ०९नोकषाय
*योग ०३* औदारिकद्विक तथा कार्मण काययोग
*२३) जाति   ५६ लाख/८४ लाख*  
सूक्ष्म-बादर प्रत्येक की सात-सात लाख जातियाँ
*२४) कुल–स्वकीय/१९९.५ लाख करोड*  
        १२१.५ लाख करोड कुल*  
*पृथ्वीकायिक*   २२ लाख करोड़, 
*जलकायिक*    ०७ लाख करोड़, 
*अग्निकायिक*   ०३ लाख करोड़, 
*वायुकायिक*     ०७ लाख करोड़
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*प्रश्न ०६) पृथ्वी कितने प्रकार की है?*
उत्तर-पृथ्वी चार प्रकार की है –
पृथ्वी, पृथ्वीकाय, पृथ्वीकायिक, पृथ्वी जीव ।
*पृथिवी (पृथ्वी)* जो अचेतन है, प्राकृतिक परिणमनों से बनी है और कठोर व मृदु गुणवाली है वह पृथिवी है। यह पृथिवी आगे के तीनों भेदों में पायी जाती है ।
*पृथिवीकाय* काय का अर्थ शरीर है, अत: 
पृथ्वीजीव के द्वारा छोड़ा गया शरीर पृथ्वीकाय है अर्थात् मुर्दा शरीर की तरह अचेतन पृथ्वीकाय है।
*पृथिवीकायिक* जिस जीव के पृथ्वी को काय रुप मे ग्रहण कर लिया है उसे पृथिवी कायिक कहते है।
*पृथ्वी जीव* विग्रहगति का जीव, जो पृथ्वी मे जन्म लेने जा रहा है वह पृथ्वी जीव है।  *(सर्वा. २८६)*

*प्रश्न ०७) पृथिवीकायिक जीव कौन-कौन से हैं?*
उत्तर-मिट्टी,बालू शर्करा,स्फटिकमणि,चन्द्रकांतमणि, सूर्यकान्तमणि, गेरू, चन्दन (एक पत्थर होता है, कारंजा में इस पत्थर की प्रतिमा है) हरिताल,हिंगुल, हीरा, सोना, चाँदी, लोहा, ताँबा आदि छत्तीस प्रकार के पृथिवीकायिक जीव हैं। *(मूलाचार २०६/०९)*

*प्रश्न ०८) जल कितने प्रकार का है?*
उत्तर-जल चार प्रकार का है- 
जल, जलकाय, जलकायिक, जलजीव।
*जल* जो जल आलोड़ित हुआ है उसे एवं कीचड़ सहित जल को जल कहते हैं ।
*जलकाय* काय का अर्थ शरीर है, अत: 
जलजीव के द्वारा छोड़ा गया शरीर जलकाय है
*जैसे* गर्म पानी जलकाय
*जलकायिक* जलजीव ने जिस जल को शरीर रूप में ग्रहण किया है, वह जलकायिक है।
*(छ्ना हुआ जल भी जलकायिक है)*
*जलजीव* विग्रहगति में स्थित जीव जो एक, दो या तीन समय में जल को शरीर रूप में ग्रहण करेगा, वह जल जीव है।   *(सि.सा.दी. ११/१४-१५)*

*प्रश्न ०९) जलकायिक जीव कौन-कौन से हैं?*
उत्तर-ओस, हिम (बर्फ), कुहरा, मोटी बूँदें, शुद्ध जल, नदी, सागर, सरोवर, कुआ, झरना, मेघ से बरसने वाला जल, चन्द्रकान्तमणि से उत्पन्न जल, घनवात आदि का पानी जलकायिक जीव है। 
*(मूलाचार २१० आ.)*

*प्रश्न १०) अग्नि कितने प्रकार की होती है?*
उत्तर- अग्नि चार प्रकार की होती है–
अग्नि, अग्निकाय, अग्निकायिक, अग्निजीव।
*अग्नि* प्रचुर भस्म से आच्छादित अग्नि अर्थात् जिसमें थोड़ी उष्णता है वह अग्नि है।
*अग्निकाय* अग्नि जीव द्वारा छोड़ा गया शरीर अग्निकाय है। जैसे भस्म आदि
*अग्निकायिक* अग्नि जीव ने जिस अग्नि को शरीर रुप से धारण किया वह अग्निकायिक है
*अग्निजीव* विग्रहगति में स्थित जीव जो अग्नि रूप शरीर को धारण करने के लिए जा रहा है अग्नि जीव है ।    *(सि. सा. दी. ११/१७-१८)*

*प्रश्न ११) अग्निकायिक जीव कौन- कौन से हैं?*
उत्तर-अंगारे, ज्वाला, लौ, मुर्मुर, शुद्धअग्नि, धुआँ सहित अग्नि, बढ़वाग्नि, नन्दीश्वर द्वीप के मंदिरों में रखे हुए धूप घटों की अग्नि, अग्निकुमार देवों के मुकुटों से उत्पन्न अग्नि आदि सभी अग्निकायिक जीव हैं।    *(मूलाचार २११ आ.)*

*प्रश्न १२) वायु कितने प्रकार की है?*
उत्तर-वायु चार प्रकार की है –
वायु, वायुकाय, वायुकायिक, वायुजीव।
*वायु* धूलि का समुदाय जिसमें है ऐसी भ्रमण करने वाली वायु, वायु है ।
*वायुकाय* जिस वायुकायिक में से जीव निकल चुका, ऐसी वायु का पौद्‌गलिक वायुदेह वायुकाय है
*वायुकायिक* प्राण (जीव) युक्त वायु को वायुकायिक कहते हैं।
*वायुजीव* वायु रूपी शरीर को धारण करने के लिए जाने वाला ऐसा विग्रहगति में स्थित जीव वायु जीव है।  *(सि. सा. दी. ११/२०-२१)*

*प्रश्न १३) वायुकायिक जीव कौन-कौनसे हैं?*
उत्तर-घूमती हुई वायु, उत्कलि रूप वायु,मण्डलाकार वायु, गुंजावायु, महावायु, घनोदधि और तनु वात वलय की वायु से सब वायुकायिक जीव हैं।
 *( मूलाचार २१२ आ.)*

*प्रश्न १४) पृथ्वी आदि वनस्पति पर्यन्त कौनसी गति के जीव हैं?*
उत्तर-पृथ्वी आदि वनस्पति पर्यन्त सभी तिर्यंचगति के जीव हैं। ये पाँचों स्थावर कहलाते है लेकिन स्थावर कोई गति नहीं है। कहा भी है– औपपादिक मनुष्येभ्य: शेषास्तिर्यग्योनय: ” *(त.सू. ०४/२७)*
अर्थात् उपपाद जन्म वाले देव, नारकी और मनुष्यों को छोड्‌कर शेष सभी तिर्यंच हैं।

*प्रश्न १५) स्थावर जीवों के कृष्ण लेश्या कैसे सिद्ध होती है?*
उत्तर-तीव्रक्रोध, वैरभाव, क्लेश संताप, हिंसा से युक्त तामसी भाव कृष्ण लेश्या के प्रतीक है। तस्मानिया के जंगलों में "होरिजन्टिल-स्कन" नामक वृक्षों की डालियाँ व जटायें जानवरों या मनुष्यों के निकट आते ही उनके शरीर से लिपट जाती हैं। तीव्र कसाव से (कस जाने के कारण) जीव उससे छुटकारा पाने की कोशिश करते हुए अन्तत: वहीं मरण को प्राप्त हो जाता है, इस क्रिया से उनकी हिंसात्मक प्रवृत्ति स्पष्ट रूप से समझ में आती है, यह कृष्ण लेश्या की प्रतीक है।

*प्रश्न १६) स्थावरों में नील लेश्या कैसे समझ में आती है?*
उत्तर-आलस्य, मूर्खता, भीरुता, अतिलोलुपता आदि नील लेश्या के प्रतीक हैं। 
कई वनस्पतियाँ आलसी एव हठी होती है। उनके बीज सुषुप्तावस्था में पड़े रहते है। शंख पुष्पी, बथुआ, बैंगन आदि के बीजों को अंकुरित कराने के लिए उपचारित करना पड़ता है उन्हें उच्चताप, निम्नताप, प्रकाश, अम्ल, पानी या रासायनिक पदार्थों से सक्रिय किया जाता है तभी वे अंकुरित होते हैं। इसी प्रकार तंबाखू गोखरु, सिंघाड़ा आदि की भी स्थिति है। 
कलश, पादप, सनडयू आदि पौधे गध, रंग, रूप आदि से कीड़ों को आकर्षित करते है। उन्हें खाने की लोलुपता इनमें विशेष रहती है। युटीकुलेरियड का पौधा स्थिर पानी में उगता है। इसकी पत्तियाँ सुई के आकार की होती हैं और पानी में तैरती हैं। पत्तियों के बीच में छोटे-छोटे हरे रग के गुब्बारे के आकार के फूले अंग रहते हैं। पौधा इन्हीं गुब्बारों से कीड़ों को पकड़ता है। गुब्बारे की भीतरी दीवारों से पौधा एक रस छोड़ता है कीड़ों को नष्ट करता है इसे इसकी अतिलोलुपता अर्थात् नील लेश्या का प्रतीक माना जा सकता है।

*प्रश्न १७)  स्थावरों में कापोत लेश्या को कैसे समझा जा सकता है?*
उत्तर-निन्दा, ईर्षा, रोष, शोक, अविश्वास आदि कापोत लेश्या के लक्षण हैं। 
इस लेश्या वाले दूसरों को पीड़ा पहुँचाने वाले होते हैं। नागफनी, काकतुरई, क्रौंच, चमचमी आदि वनस्पतियाँ काँटे, दुर्गन्ध या खुजली पहुँचाने वाले होते हैं। इनको छूने से या इनके निकट जाने से कुछ कष्ट अवश्य होता है। इसे कापोत लेश्या के रूपमें स्वीकार किया जा सकता है। 
अशुभ लेश्या के उदाहरण वनस्पति में स्पष्ट रूपसे समझ में आते हैं। पृथ्वी आदि में इनका स्पष्टीकरण नहीं होता है फिर भी पानी में भँवर आना, वायु में चक्रवात, अग्नि में बड़वानल, दावानल, ज्वालामुखी आदि प्रवृत्तियों से अशुभ लेश्याओं का अनुमान लगाया जा सकता है।

*प्रश्न १८)  क्या पृथ्वीकायिकादि पाँचों स्थावरों में सासादन गुणस्थान होता है?*
उत्तर-पृथ्वीकायादि पाँचों स्थावरों में सासादन गुणस्थान सम्बन्धी दो विचार हैं –
*०१)* इन्द्रिय मार्गणा की अपेक्षा एकेन्द्रिय और विकलेन्द्रिय जीवों में मिथ्यात्व और सासादन ये दो गुणस्थान होते हैं। यहाँ यह विशेष ज्ञातव्य है कि उक्त जीवों में सासादन गुणस्थान निर्वृत्यपर्याप्त दशा में ही सम्भव है, अन्यत्र नहीं; क्योंकि पर्याप्त दशा में तो वहाँ एक मिथ्यात्व गुणस्थान ही होता है। 
*(पंच. संग्रह. प्राकृत)*
एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय तथा असैनी पंचेन्द्रिय में तो अपर्याप्त तथा सैनी के पर्याप्त- अपर्याप्त अवस्था में सासादन गुणस्थान होता है। 
*(गो. जी. जी. ६९५)*
एकेन्द्रियों में जाने वाले सासादन गुणस्थान वाले जीव बादर पृथिवीकायिक बादरजलकायिक, बादर वनस्पतिकायिक (प्रत्येक वनस्पति) पर्याप्तको में ही जाते हैं, अपर्यातकों में नहीं। *(धवला ०६/४६०)*
*०२)* कौन कहता है कि सासादन सम्यग्दृष्टि जीव एकेन्द्रियों में होते है? किन्तु वे उस एकेन्द्रिय में मारणान्तिक समुद्धात करते हैं ऐसा हमारा निश्चय है, न कि वे अर्थात् सासादन सम्यग्दृष्टि एकेन्द्रियों में उत्पन्न होते हैं; क्योंकि उनमें आयु के छिन्न होने के समय सासादन गुणस्थान नहीं पाया जाता है।
*(धवला ०४/१६२)*
सासादन सम्यग्दृष्टियों की एकेन्द्रियों में उत्पत्ति नहीं है।  *(धवला ०७/४५७)*

*प्रश्न १९) पृथ्वीकायिकादि में कितनी व कौन-कौन सी अविरतियों होती हैं?*
उत्तर-पृथ्वीकायिकादि में सात अविरतियाँ होती हैं – षट्‌कायिक जीवों की हिंसा के अत्यागरूप छह तथा स्पर्शन इन्द्रिय को वश में नहीं करने रूप एक = कुल सात अविरतिया होती है।
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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*

गुरुवार, 29 मई 2025

13. चौबीस ठाणा-पंचेन्द्रिय मार्गण*

13. चौबीस ठाणा-पंचेन्द्रिय मार्गण*
https://youtu.be/-ja9eR2PbG4?si=OvjJghRb-AGoKunj
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*✍️ पंचेन्द्रिय मे २४ स्थान*
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*०१) गति       ०४/०४*   नरक,तिर्यंच, मनुष्य,देव
*०२) इन्द्रिय    ०१/०५*   पंचेन्द्रिय
*०३) काय       ०१/०६*  त्रसकाय
*०४) योग        १५/१५*  
किसी जीव के एक साथ अधिकत्तम १३ योग हो सकते है।
*०५) वेद         ०३/०३*   तीनों वेद
*०६) कषाय     २५/२५*  सभी कषाय
*०७) ज्ञान        ०८/०८*  आठो ज्ञान
*०८) संयम       ०७/०७*  सातो संयम
*०९) दर्शन       ०४/०४*  चारो दर्शन
*१०) लेश्या      ०६/०६*  छहो लेश्या
*११) भव्यक्त्व  ०२/०२*  भव्य और अभव्य
*१२) सम्यक्त्व   ०६/०६* छहो भेद
*१३) संज्ञी        ०२/०२*  संज्ञी, असंज्ञी दोनो
*१४) आहारक  ०२/०२*  आहारक, अनाहारक
*१५) गुणस्थान  १४/१४*  सभी चौदह गुणस्थान
*१६) जीवसमास ०२/१९* 
संज्ञी पंचेन्द्रिय, असंज्ञी पंचेन्द्रिय
*१७) पर्याप्ति       ०६/०६*  छहो पर्याप्तियाँ
*१८) प्राण           १०/१०*  दसो प्राण
*१९) संज्ञा          ०४/०४*  चारो संज्ञा
आहारसंज्ञा, भयसंज्ञा, मैथुनसंज्ञा, परिग्रहसंज्ञा।
*२०) उपयोग      १२/१२*  
ज्ञानोपयोग ०८, दर्शनापयोग ०४
*२१) ध्यान         १६/१६*  
*आर्तध्यान ०४* इष्टवियोगज, अनिष्टसंयोगज, वेदना और निदान।
*रौद्रध्यान ०४* हिंसानन्दी, मृषानन्दी, चौर्यानन्दी और परिग्रहानन्दी
*धर्मध्यान ०४* आज्ञाविचय,अपायविचय, विपाकविचय और संस्थानविचय।
*शुक्ल ०४* पृथक्त्ववितर्क वीचार, एकत्ववितर्क अवीचार, सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति, व्युपरतक्रियानिवृति।
*२२) आस्रव       ५७/५७*   
मिथ्यात्व ०५, अविरति १२, कषाय २५, योग १५
*२३) जाति       /८४ लाख*  २६ लाख
मनुष्य १४ लाख, देव ०४ लाख, नरक ०४ लाख, पंचेन्द्रिय तिर्यंच ०४ लाख
*२४) कुल*                  १०८.५ लाख करोड
मनुष्यों के –  १५  लाख करोड़,
देवों के –       २६ लाख करोड
नारकियों के –२५ लाख करोड़
*पंचेन्द्रिय तिर्यंचो मे*
                   जलचरों के –१२.५ लाख करोड़
                   नभचरों के – १२    लाख करोड़
                   थलचरों के – १९    लाख करोड़
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✍️ पंचेन्द्रिय जीव :-
जिनका चिह्न स्पर्श, रस, गंध, वर्ण तथा शब्द विषयक ज्ञान है, वे पंचेन्द्रिय जीव हैं।
जिनके पाँच इन्द्रियाँ होती हैं, वे पंचेन्द्रिय जीव हैं। *जैसे* देव, नारकी, मनुष्य, हाथी, घोड़ा, बैल आदि 
*(गोम्मटसार जीवकाण्ड १६६)*
मनुष्य, देव, नारकी, तिर्यंच संज्ञी, असंज्ञी तिर्यंच, साँप, फन वाले साँप (नाग), सरकने वाले अजगर आदि चौपाये आदि पाँच इन्द्रिय जीव कहलाते हैं।

✍️ पंचेन्द्रिय तिर्यंच के प्रकार :-
पंचेन्द्रिय तिर्यब्ज तीन प्रकार के होते हैं –जलचर, थलचर, नभचर।
*जलचर* जो पानी में रहते हैं, जल ही जिनका जीवन है वे जलचर जीव हैं।
*जैसे* मछली, महामत्स्य, तंदुलमत्स्य आदि।
*थलचर* जो धरती पर निवास करते हैं, वे थलचर है। *जैसे* हाथी, घोड़ा, बैल, गाय, चीता,भैंस आदि 
*नभचर* जो आकाश में उड़ते हैं, वृक्षों पर रहते हैं, वे नभचर हैं। 
*जैसे* कबूतर, चिड़िया, तोता, मैना, कोयल आदि
*मोर भी नभचर हैं थलचर नही*

*प्रश्न ०३) कौन सी इन्द्रि वालो के एक काययोग और एक वचनयोग होता है?*
द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय तथा असंज्ञी पंचेन्द्रिय जीवो की पर्याप्तक अवस्था मे अनुभय वचनयोग तथा औदारिक काययोग ही होता है। यह पर्याप्तक अवस्था मे होता है।

*प्रश्न ०४) क्या कोई ऐसा पंचेन्द्रिय जीव सम्यक मार्गणा के सभी भेदों को प्राप्त कर सकता है?*         *(किसी भी एक जीव की अपेक्षा)*
हाँ हो सकता हैं, मनुष्यगति मे हो सकता है। एक निकट भव्य पंचेन्द्रिय जीव के सम्यक्त्व मार्गणा के सभी भेदों को प्राप्त कर सकता है। 
*जैसे* किसी ने मनुष्यो मे *मिथ्यात्व सहित* जन्म लिया तथा आठ वर्ष का होना पर औपशमिक सम्यक्त्व प्राप्त करा तो *औपशमिक* भी हो गया। इसका काल अंतर्मुहूत है।
औपशमिक का काल पूरा होने से पहलेअनंतानुबंधी चतुष्क से किसी एक का उदय आ जावे तो वह *सासादन सम्यग्दृष्टि* बन जाता है।
यदि औपशमिक सम्यक्त्व पूरा होने पर सम्यक्त्व मिथ्यात्व का उदय आये तो तीसरा *सम्यग्मिथ्यात्व* भी होता है। 
औपशमिक सम्यक्त्व का काल पूरा हो तथा सम्यक प्रकृति का उदय आ जाए तो *क्षायोपशमिक सम्यक्त्व* होता है। 
वही क्षायोपशमिक सम्यग्दृष्टि यदि सात प्रकृति का (अनन्तानुबन्धी चतुष्क तथा मिथ्यात्व, सम्यक मिथ्यात्व तथा सम्यक् प्रकृति) क्षय कर देता है वह *क्षायिक सम्यग्दृष्टि* होता है।
*इस प्रकार एक जीव के सम्यक्त्व मार्गणा के सभी भेद एक भव मनुष्यगति वाले के ही हो सकते हैं*
*नोट* सम्यक मिथ्यात्व तथा सम्यक् प्रकृति का उदय मिथ्यादृष्टि और सम्यग्दृष्टि दोनों के आ सकता है।

*प्रश्न ०५) क्या सभी पंचेन्द्रिय जीवों के छहों पर्याप्तियाँ होती हैं?*
नहीं होती, मात्र सैनी पंचेन्द्रिय पर्याप्तक जीवों के ही छहों पर्याप्तियाँ होती है। सैनी लब्ध्यपर्यातक जीवों के एक भी पर्यातियाँ पूर्ण नहीं होती हैं,क्योंकि शरीर पर्याप्ति पूर्ण होने के पहले ही उसका मरण हो जाता है इसलिए उनको लब्ध्यपर्यातक/अपर्याप्तक कहा जाता है। उसके छह अपर्याप्तियाँ होती है।
निर्वत्यापर्याप्तक जीव के भी उस समय उस समय छह पर्याप्तियाँ नही होती, शरीर पर्याप्ति पूर्ण होने पर भी दो पर्याप्ति होती है। जीव के जब छहो पर्याप्तियाँ पूर्ण होती है तभी उसे पर्याप्तक जीव कहते है।

*प्रश्न ०६) पंचेन्द्रिय जीवों के पन्द्रह योग किस अपेक्षा होते हैं?*
पंचेन्द्रिय जीवों के पन्द्रह योग–
*मन ०४*   सत्य,असत्य, उभय, अनुभय मनोयोग
*वचन ०३* सत्य, असत्य, उभय वचनयोग
(संज्ञी पंचेन्द्रिय तिर्यंच तथा तीनो गति के जीवो की अपेक्षा से)
*अनुभय वचनयोग* संज्ञी असंज्ञी पंचेन्द्रिय अपेक्षा
*औदारिकद्बिक*     मनुष्य–तिर्यंच की अपेक्षा *वैक्रियिकद्विक*      देव– नारकी की अपेक्षा *आहारकद्विक*     छठे गुणस्थान मुनि की अपेक्षा *कार्मणकाययोग* विग्रह गति तथा केवली समद्धात की अपेक्षा

*प्रश्न ०७) पंचेन्द्रिय जीवों की २६ लाख जातियों कौन-कौनसी हैं?*
पंचेन्द्रिय जीवों की २६ लाख जातियाँ– 
*नारकियों* की चार (०४) लाख जातियाँ
*देवों की*         चार (०४) लाख जातियाँ
*मनुष्यों* की     चौदह (१४) लाख जातियाँ
*तिर्यंच पंचेन्द्रियों* की चार (०४) लाख जातियाँ है।

*प्रश्न ०८) पंचेन्द्रिय जीवों के १०८.५ लाख करोड़ कुल कौन- कौन से हैं?*
उत्तर:-पंचेन्द्रिय के १०८.५ लाख करोड़ कुल–
*मनुष्यों के*      १४ लाख करोड़,
*देवों के*          २६ लाख करोड
*नारकियों के*   २५ लाख करोड़
*पंचेन्द्रिय तिर्यंचो मे*
*जलचरों के* १२.५ लाख करोड़
*नभचरों के*     १२ लाख करोड़
*थलचरों के*     १९ लाख करोड़

*प्रश्न ०८) किन जीवों के इन्द्रियाँ नहीं होती हैं?* तेरहवें-चौदहवें गुणस्थान में इन्द्रिया (भावेन्द्रिय) नहीं होता हैं, क्योंकि वहाँ इन्द्रियावरण कर्म का क्षयोपशम नहीं होता है।
विग्रहगति में तथा जब तक इन्द्रिय पर्याप्ति पूर्ण नहीं होती तब तक द्रव्येन्द्रियाँ नहीं होती हैं क्योंकि वहाँ इन्द्रिय के योग्य नामकर्म का उदय नहीं होता है।
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*✍️समुच्चय प्रश्नोत्तर*
*प्रश्न ०९) किस इन्द्रिय वाले जीव किस गति में होते हैं?*
*तिर्यंचगति* में एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय तथा पंचेन्द्रिय जीव होते हैं।
*नरक, मनुष्य तथा देवगति*  में संज्ञी पंचेन्द्रिय जीव ही होते हैं।
*मनुष्यगति में अनिन्द्रिय जीव भी होते हैं।*
अनिन्द्रिय के दो अर्थ है–एक मन दूसरा अतिन्द्रिय
*पंचमगति (सिद्ध गति)* अनिन्द्रिय जीव ही होते हैं 

*प्रश्न १०) कौन- कौन से प्राण इन्द्रिय मार्गणा के सभी भेदों में पाये जाते हैं?*
चार प्राण इन्द्रिय मार्गणा के सभी भेदों में पाये जाते हैं- स्पर्शन इन्द्रिय, कायबल, श्वासोच्छवास और आयु प्राण।
रसना इन्द्रिय आदि प्राण भी द्वीन्द्रिय जीवों से शुरु होते है।
वचनबल प्राण भी– द्वीन्द्रिय जीवों से शुरु होते है।
मनोबल प्राण भी–  पंचेन्द्रिय जीवो के होते है।

*प्रश्न ११) ऐसे कौन-कौन से उपयोग हैं जो इन्द्रिय मार्गणा के सभी भेदों में नहीं पाये जाते हैं*
नौ उपयोग इन्द्रिय मार्गणा के सभी भेदों में नहीं पाये जाते हैं- ज्ञानोपयोग ०६, दर्शनापयोग ०३
*मतिज्ञान,श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मन: पर्ययज्ञान, केवलज्ञानोपयोग तथा कुअवधिज्ञानोपयोग. चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन, अवधिदर्शन*
चक्षुदर्शनोपयोग. एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय जीवों के नहीं होता है। मात्र तीन उपयोग (कुमतिज्ञानो, कुश्रुतज्ञानो तथा अचक्षुदर्शनोपयोग) होते है।
इनमें से चक्षुदर्शन को छोड्कर शेष आठ उपयोग संज्ञी पंचेन्द्रिय जीवों के ही होते हैं। 
*कुमतिज्ञान, कुश्रुतज्ञान और अचक्षुदर्शन सभी इन्द्रियो मे पाए जाते है।*

*प्रश्न १२) आस्रव के ऐसे कौन- कौनसे कारण हैं जो इन्द्रिय मार्गणा के सभी भेदों में पाये जाते हैं?*
आस्रव के ३८ प्रत्यय ऐसे हैं, जो इन्द्रिय मार्गणा के सभी भेदों में पाये जाते हैं।
*मिथ्यात्व ०५, कषाय २३, अविरति ०७, योग ०३* स्त्रीवेद, पुरुषवेद – एकेन्द्रिय से चतुरिन्द्रिय तक नहीं होते हैं । 
रसनादिक चार इन्द्रिय तथा मन संबधी अविरति–
एकेन्द्रिय जीवों के नहीं होती हैं 
मन ०४, वचन ०३ योग भी एकेन्द्रिय से चतुरिन्द्रिय तक नहीं हैं। 
आहारकद्विक काययोग मुनिराजो के होता है
वैक्रियिकद्विक काययोग देव नारकियो के होता है
अनुभयवचनयोग भी एकेन्द्रिय जीवों के नहीं है ।
इस तरह संज्ञी पंचेन्द्रिय के १२ अविरति
असंज्ञी पंचेन्द्रिय के ११ अविरति
चतुरिन्द्रिय के १० अविरति
त्रीन्द्रिय के ०९ अविरति
द्वीन्द्रिय के ०८ अविरति
एकेन्द्रिय के ०७ अविरति होती है

*प्रश्न १३) आस्रव के ऐसे कौन-कौन से प्रत्यय हैं जो एकेन्द्रिय में नहीं होते हैं लेकिन पंचेन्द्रिय के होते हैं*
आसव के १९ प्रत्यय ऐसे हैं जो एकेन्द्रिय के नहीं होते हैं लेकिन पंचेन्द्रिय के होते हैं।
अविरतियाँ ०५– रसना, प्राण, चक्षु, कर्ण तथा मन सम्बन्धी
कषाय ०२)–  स्त्रीवेद तथा पुरुषवेद
योग १२)–     मनोयोग ०४, वचनयोग ०४, आहारकद्विक तथा वैक्रियिकद्रिक काययोग

*प्रश्न १४) पंचेन्द्रिय जीवों के जाति तथा कुल अधिक हैं या एकेन्द्रिय जीवों के?*
पंचेन्द्रियों में कुल अधिक हैं, लेकिन एकेन्द्रियों में जातियाँ अधिक हैं।
पंचेन्द्रियों में १०८.५ लाख करोड़ कुल हैं, एकेन्द्रिय में मात्र ६७ लाख करोड़ कुल ही हैं।
पंचेन्द्रियों के मात्र २६ लाख जातियों हैं तो एकेन्द्रिय जीवों की ५२ लाख जातियाँ हैं।

*प्रश्न १५) इन्द्रिय मार्गणा के कौन भेद में सबसे ज्यादा जीवसमास हैं?*
एकेन्द्रिय जीवों के १४ जीवसमास हैं जो सबसे ज्यादा है।
पृथ्वीकायिक दो, जलकायिक दो, अग्निकायिक के दो, वायुकायिक के दो तथा वनस्पतिकायिक के छह इस प्रकार चौदह (१४) जीवसमास हैं ।

*प्रश्न १६) कौन सी इन्द्रिय वालों के एक काययोग एवं एक ही वचनयोग होता है?*
उत्तर:-द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय तथा असंज्ञी पंचेन्द्रिय जीवों की पर्याप्त-अवस्था में एक औदारिक काययोग और एक अनुभयवचनयोग होता है।
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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*

गुरुवार, 15 मई 2025

12. चौबीस ठाणा-विकलेन्द्रिय मार्गण*

12. चौबीस ठाणा-विकलेन्द्रिय मार्गण*
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*✍️ विकलेन्द्रिय मे २४ स्थान*
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*०१) गति       ०१/०४*   तिर्यंचगति
*०२) इन्द्रिय    ०१/०५*   स्वकीय
द्वीन्द्रिय मे ०२, त्रीन्द्रिय मे ०३, चतुरिन्द्रिय ०४
*०३) काय       ०१/०६*  त्रसकाय
*०४) योग        ०४/१५*  
अनुभय वचनयोग, कार्मणकाययोग,औदारिकद्विक 
*०५) वेद         ०१/०३*   नपुंसकवेद
*०६) कषाय     २३/२५*  
स्त्रीवेद, पुरुषवेद नोकषाय नही होती है।
*०७) ज्ञान        ०२/०८*  कुमतिज्ञान, कुश्रुतज्ञान
*०८) संयम       ०१/०७*  असंयम
*०९) दर्शन       ०२/०४*  चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन
दो और तीन इन्द्रिय जीवो मे अचक्षुदर्शन, चार इन्द्रिय के चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन है।
*१०) लेश्या      ०३/०६*  कृष्ण, नील, कापोत
*११) भव्यक्त्व  ०२/०२*  भव्य और अभव्य
*१२) सम्यक्त्व   ०२/०६* मिथ्याद्रष्टि, सासादन
*सासादन सम्यक्त्व निर्वत्यपर्याप्तक अवस्था मे है*
*१३) संज्ञी        ०१/०२*  असंज्ञी 
*१४) आहारक   ०२/०२*  आहारक, अनाहारक
*१५) गुणस्थान   ०२/१४*  मिथ्यात्व, सासादन
*१६) जीवसमास ०३/१९*  स्वकीय
द्वीन्द्रिय मे ०१, त्रीन्द्रिय मे ०१, चतुरिन्द्रिय ०१
*१७) पर्याप्ति       ०५/०६*  मनः पर्याप्ति नही है
*१८) प्राण           ०८/१०*  
द्वीन्द्रिय के ०६, त्रीन्द्रिय के ०७, चतुरिन्द्रिय के ०८
*१९) संज्ञा         ०४/०४*  
आहारसंज्ञा, भयसंज्ञा, मैथुनसंज्ञा, परिग्रहसंज्ञा।
*२०) उपयोग      ०४/१२*  
कुमतिज्ञान, कुश्रुतज्ञान, अचक्षुदर्शन, चक्षुदर्शन
द्वीन्द्रिय के ०३, त्रीन्द्रिय के ०३, चतुरिन्द्रिय के ०४
*२१) ध्यान         ०८/१६*  
*आर्तध्यान ०४* इष्टवियोगज, अनिष्टसंयोगज, वेदना और निदान।
*रौद्रध्यान ०४* हिंसानन्दी, मृषानन्दी, चौर्यानन्दी और परिग्रहानन्दी।  
*२२) आस्रव   ४०, ४१, ४२/५७*  स्वकीय
*द्वीन्द्रिय ४०* 
मिथ्यात्व ०५, अविरति ०८, कषाय २३, योग ०४
*त्रीन्द्रिय ४१*
मिथ्यात्व ०५, अविरति ०९, कषाय २३, योग ०४
*चतुरिन्द्रिय ४२*
मिथ्यात्व ०५, अविरति १०, कषाय २३, योग ०४
*२३) जाति   स्वकीय/८४ लाख*    
द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय प्रत्येक ०२-०२ लाख
*२४) कुल–१९९.५ लाख करोड*  स्वकीय
द्वीन्द्रिय के ०७ लाख करोड, त्रीन्द्रिय के ०८ लाख करोड, चतुरिन्द्रिय के ०९ लाख करोड कुल
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जिनके पाँचो इन्द्रिय ना हो वह विकलेन्द्रि कहलाते है तथा यहा एकेन्द्रिय का ग्रहण नही होता हैं उन्हे अलग से स्थावर कह देते है। झसलिए इनके लिए नया शब्द दे दिया विकलत्रय
*विकलत्रय* यानि विकल= कम इन्द्रि, त्रय=तीन
द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय ओर चतुरिन्द्रिय जीव विकलत्रय हैं।

*प्रश्न ०१) द्वीन्द्रिय जीव किसे कहते हैं?*
जिनका चिह्न स्पर्श और रस विषयक ज्ञान है वे द्वीन्द्रिय जीव हैं।
जिन जीवों के दो इन्द्रियाँ पाई जाती हैं वे द्वीन्द्रिय जीव हैं। *जैसे* शंख, कृमि, लट (कँचुआ), सीप, गिजाई, जौंक, कौड़ी आदि   *(गो. जी.१६६)*

*प्रश्न ०२) त्रीन्द्रिय जीव किसे कहते हैं ?*
जिनका चिह्न स्पर्श, रस तथा गन्ध विषयक ज्ञान है वे जीव त्रीन्द्रिय हैं। 
जिन जीवों के तीन इन्द्रियाँ होती हैं त्रीन्द्रिय जीव हैं।
*जैसे* कुन्धु, पिपीलिका, चींटा, जूँ,  बिच्छू, लीखें, कनखजूरा, खटमल आदि।    *(गो. जी.१६६)*

*प्रश्न ०३) चतुरिन्द्रिय जीव किसे कहते हैं?
जिनका चिह्न स्पर्श, रस, गन्ध तथा वर्ण विषयक ज्ञान है वे चतुरिन्द्रिय जीव हैं, जिनके चार इन्द्रियाँ हैं वे चतुरिन्द्रिय जीव हैं। *जैस* झिंगुर, डाँस, मच्छर, पतंगा, भ्रमर आदि।     *(गो. जी. १६६)८

*प्रश्न ०४) विकलत्रयों में चींटा-चींटी, भ्रमर-भ्रमरी आदि स्त्री-पुरुष देखे जाते हैं, अत: उनके भी स्त्री- पुरुष वेद मानने में क्या बाधा है?*
विकलत्रयों में भी स्त्री-पुरुष लिंग वाले नाम देखे जाते है। लोक में नपुसक लिंग वाले शब्दों का उच्चारण भी स्त्री या पुरुषवेद के रूप में ही होता है। *जैसे* पुस्तक शब्द नपुसक लिङ्ग का है फिर भी, पुस्तक रखी है, ऐसा ही बोला जाता है यानि स्त्रिलिंग की भाषा मे बोलते है।
दूध शब्द नपुंसक लिङ्ग का है फिर भी पुल्लिंग में बोला जाता है, दुध चुल्ले पर रखा है यह बोला जाता है, यानि पुल्लिंग में बोला जाता है।इसी प्रकार से विकलत्रय, एकेन्द्रिय आदि में भी बोला जाता है। एकेन्द्रियों में भी कमल-कमलिनी आदि। 
इसका अर्थ उनके स्त्री-पुरुष वेद हो गया, ऐसा नहीं है, क्योंकि ऐसा मानने पर तो अजीवों में भी चमचा- चमची, भगोना-भगोनी, कटोरा-कटोरी आदि सभी मे कोई भी लिंग नही है, लेकिन लिंग के अनुसार बोलते है। अजीवों के तो वेद ही नहीं हो सकता है।
अत: आगम में एकेन्द्रिय तथा विकलत्रयों के नपुसक वेद ही कहा गया है, सो सत्य है ।

*प्रश्न ०५) क्या ढाई द्वीप के बाहर के विकलत्रय जीवों में भी नपुंसक वेद ही होता है?*
नहीं, ढाई द्वीप के बाहर विकलत्रय जीव नहीं होते हैं। विकलत्रय जीव तो मात्र कर्मभूमिया तिर्यंचों में ही होते हैं ।

*प्रश्न ०६) क्या ढाई द्वीप के बाहर कहीं पर भी विकलत्रय जीव नहीं होते हैं?*
नहीं, ढाई द्वीप के बाहर असख्यात द्वीप समुद्रो में मात्र पंचेन्द्रिय तिर्यंच होते हैं लेकिन अन्त के स्वयम्भूरमण द्वीप तथा स्वयम्भूरमण समुद्र में विकलत्रय जीव भी पाये जाते हैं। उनके भी नपुंसक वेद ही पाया जाता है।       *(धवला ०४/२४३)*

*प्रश्न ०७) क्या कर्मभूमिया मनुष्य-तिर्यंचों के समान विकलत्रय जीवों के भी वेद की विषमता हो सकती है?*
नहीं,कर्मभूमियाँ मनुष्य-तिर्यंचोंके समान विकलत्रय जीवों के वेद की विषमता नहीं हो सकती है, कहा है –  *नारकसम्हर्च्छिनो नपुंसकानित।।  सु.०२/५०*
विकलत्रय जीव भी सम्मूर्च्छन जन्म वाले होते हैं इसलिए उनके वेद की विषमता नहीं हो सकती है।

*प्रश्न ०८) चींटी आदि के अण्डे देखे जाते हैं, अत: उनके नपुंसक वेद ही कैसे हो सकता है?*
चींटी आदि जीवों के अण्डों की उत्पत्ति गर्भ से नहीं होती है। चींटियाँ आदि केवल यहाँ- वहाँ के मल-मूत्र आदि गन्दे स्थानों से सड़े-गले पुद्‌गलों को लेकर विशेष स्थानों में रख लेती है। कालान्तर में वे ही पुद्‌गल पिण्ड चींटी आदि के शरीर बन जाते हैं।  
 *(श्लो.०५/२५२)* 
◆इसी प्रकार सिर की जुएँ भी जो लीख के रूप में अण्डों जैसी दिखाई देती हैँ, उनकी उत्पात्ती भी ऐसे ही जानना चाहिए। इसलिए अण्डाकार दिखाई देने पर भी ये सब नपुंसक वेद वाले ही होते है।

*प्रश्न ०९)विकलत्रय जीवों के कितने प्राण होते हैं?*
विकलत्रय जीवों के प्राण- 
*दो इन्द्रिय पर्याप्तावस्था में ०६ प्राण*
०२ इन्द्रियाँ (स्पर्शन, रसना) ०२ बल (वचन, काय) आयु और श्वासोच्चवास 
*तीन इन्द्रिय पर्याप्तावस्था में ०७ प्राण*
०३ इन्द्रियाँ (स्पर्शन, रसना, घ्राण), ०२ बल (वचन, काय), आयु और श्वासोच्चवास 
*चतुरिन्द्रिय पर्याप्तावस्था में ०८ प्राण*
०४ इन्द्रियाँ (स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु), ०२ बल (वचन, काय), आयु और श्वासोच्चवास 
◆इन सबके निर्वृत्यपर्याप्त अवस्था में श्वासोच्छवास तथा वचन बल नहीं होता है अत: इनके क्रमश: ०४, ०५, ०६  होते हैं।         *(गो. जी. १३३)*

*प्रश्न १०) विकलत्रयो के कितने उपयोग होते हैं?* ◆द्वीन्द्रिय तथा त्रीन्द्रिय जीवों के ०३ उपयोग होते हैं- कुमतिज्ञानो, कुश्रुतज्ञानो,  अचक्षुदर्शनोपयोग
◆चतुरिन्द्रिय जीवों के ०४ उपयोग होते हैं- कुमति ज्ञानो, कुश्रुतज्ञानो, चक्षुदर्शनो, अचक्षुदर्शनो
*नोट* द्वीन्द्रिय ओर त्रीन्द्रिय जीवों के चक्षुइन्द्रिय के अभाव में चक्षुदर्शन नहीं होता हैं।

*प्रश्न ११) विकलत्रय जीवों के कितने आस्रव के प्रत्यय होते हैं?*
विकलत्रय जीवों के आस्रव के प्रत्यय- 
*द्वीन्द्रिय जीवों के ४० आसव के प्रत्यय*
मिथ्यात्व ०५, अविरति ०८ (षट्‌कायिक जीव एवं दो इन्द्रिय सम्बन्धी), कषाय २३ (स्त्रीवेद,पुरुषवेद नही) योग ०४ (अनुभय वचनयोग, औदारिक काययोग,
औदारिक मिश्न काययोग, कार्मण काय योग)
*त्रीन्द्रिय जीवों के ४१ आस्रव के प्रत्यय*
मिथ्यात्व ०५, अविरति ०९ (षट्‌कायिक जीव एवं तीन इन्द्रिय सम्बन्धी), कषाय २३ (स्त्रीवेद,पुरुषवेद नही) योग ०४ (अनुभय वचनयोग, औदारिक काय योग,औदारिक मिश्न काययोग, कार्मण काययोग)
*चतुरिन्द्रिय जीवों के ४२ आस्रव के प्रत्यय*
मिथ्यात्व ०५, अविरति १० (षट्‌कायिक जीव एवं चार इन्द्रिय सम्बन्धी), कषाय २३ (स्त्रीवेद,पुरुषवेद नही) योग ०४ (अनुभय वचनयोग, औदारिक काय योग,औदारिक मिश्न काययोग, कार्मण काययोग)

*इन्हीं जीवों के निर्वृत्यपर्याप्तक–लब्ध्यपर्याप्तक अवस्था में चार योगो मे से तीन योग (औदारिक काययोग, कार्मण काययोग तथा वचनयोग) कम हो जाते है, तथा औदारिक मिश्र काययोग ही होता है, क्रमश: ३७, ३८, ३९ आस्रव के प्रत्यय हो जाते है।*

*इन्हीं जीवों के विग्रहगति में तीन योग (औदारिक काययोग, औदारिक मिश्न काययोग, वचनयोग) कम करने पर क्रमश: ३७, ३८, ३९ आस्रव के प्रत्यय है। यहा कार्मण काययोग रहता है*

*प्रश्न १२) एकेन्द्रिय तथा विकलत्रय जीवों के षट्‌कायिक जीवों की हिंसा सम्बन्धी आस्रव के प्रत्यय कैसे हो सकते हैं?*
उत्तर:-मकड़ी के समान कुछ विशेष जाति की झाड़ियाँ मनुष्य जैसे बड़े-बड़े जीवों को भी पकड़ती हुई देखी जाती हैं। चींटियाँ लट आदि को पकड़कर ले जाते हुए प्रत्यक्ष देखी जाती हैं, गाय, भैंस, मनुष्य आदि को कीड़े-मकोड़े आदि काटते हुए देखे जा सकते हैं अत: उनके भी षट्‌कायिक जीवों सम्बन्धी आस्रव होता ही है क्योंकि हिंसा का त्याग किये बिना यदि कोई हिंसा नहीं भी करता है या किसी के निमित्त से हिंसा नहीं भी होती है तो भी उसे हिंसा का पाप लगता ही है।अत: एकेन्द्रिय तथा विकलत्रय जीवों के भी षट्‌कायिक जीवों की हिंसा सम्बन्धी आस्रव के प्रत्यय होते ही हैं।
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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*

गुरुवार, 1 मई 2025

11. चौबीस ठाणा-एकेन्द्रिय मार्गणा

 *11. चौबीस ठाणा-एकेन्द्रिय मार्गणा*

https://youtu.be/EA8u9p5bpGM?si=luA9UQCw5d7Ltl08

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*✍️ एकेन्द्रिय मे २४ स्थान*

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*०१) गति       ०१/०४*   तिर्यंचगति

*०२) इन्द्रिय    ०१/०५*   स्पर्शन इन्द्रिय

*०३) काय       ०१/०६*   स्थावर काय

पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पतिकायिक

*०४) योग        ०३/१५*  

कार्मणकाययोग, औदारिकद्विक काययोग

*०५) वेद       ०१/०३*   नपुंसकवेद

*०६) कषाय  २३/२५*  

स्त्रीवेद,पुरुषवेद नोकषाय को छोडकर बाकी सभी

*०७) ज्ञान     ०२/०८*  कुमतिज्ञान, कुश्रुतज्ञान

*०८) संयम       ०१/०७*  असंयम

*०९) दर्शन       ०१/०४*  अचक्षुदर्शन

*१०) लेश्या      ०३/०६*  कृष्ण, नील, कापोत

*११) भव्यक्त्व  ०२/०२*  भव्य और अभव्य

*१२) सम्यक्त्व   ०२/०६* मिथ्याद्रष्टि, सासादन

*सासादन सम्यक्त्व निर्वत्यपर्याप्तक अवस्था मे है*

*१३) संज्ञी        ०१/०२*  असंज्ञी 

*१४) आहारक   ०२/०२*  आहारक, अनाहारक

*१५) गुणस्थान   ०२/१४*  मिथ्यात्व, सासादन

*१६) जीवसमास  १४/१९*   

*१७) पर्याप्ति        ०४/०६* 

भाषा और मनः पर्याप्ति नही होती है

*१८) प्राण           ०४/१०*  

स्पर्शन, कायबल, आयु और श्वासोच्छवास प्राण

*१९) संज्ञा         ०४/०४*  

आहारसंज्ञा, भयसंज्ञा, मैथुनसंज्ञा, परिग्रहसंज्ञा।

*२०) उपयोग      ०३/१२*  

कुमति, कुश्रुत, अचक्षुदर्शन

*२१) ध्यान         ०८/१६*  

*आर्तध्यान ०४* इष्टवियोगज, अनिष्टसंयोगज, वेदना और निदान।

*रौद्रध्यान ०४* हिंसानन्दी, मृषानन्दी, चौर्यानन्दी और परिग्रहानन्दी।  

*२२) आस्रव       ३८/५७*  

*मिथ्यात्व०५* विपरीत,एकान्त,विनय,संशय,अज्ञान

*अविरति ०७* स्पर्शन इन्द्रिय और षट्काय के जीवों की रक्षा नहीं करना की अविरति होती है

*कषाय २३* अनन्तानुबन्धीआदि १६ नोकषाय ०७

*योग ०३* औदारिकद्विक काययोग, कार्मण काययोग

*२३) जाति   –८४ लाख*    ५२ लाख जाति

विकलत्रय एवं पंचेन्द्रिय सम्बन्धी जाति नही होते है।

*२४) कुल–१९९.५ लाख करोड* ६७ लाख करोड़

विकलत्रय एवं पंचेन्द्रिय सम्बन्धी कुल नही होते है। 

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✍️ एकेन्द्रिय जीव :-

जिन जीवों का चिह्न स्पर्शन विषयक ज्ञान है, वे जीव एकेन्द्रिय हैं। 

जिन जीवों के एक ही इन्द्रिय होती है, वे एकेन्द्रिय हैं *जैसे* पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, वनस्पति, इतर निगोद, नित्यनिगोद आदि   *(गो. जी. १६६)*


*प्रश्न - एकेन्द्रिय जीवों के द्रव्यवेद नहीं पाया जाता है, इसलिए उनके नपुंसकवेद का अस्तित्व कैसे बतलाया है?*

उत्तर-एकेन्द्रियों में द्रव्यवेद मत होओ; क्योंकि उसकी यहाँ प्रधानता नहीं है। अथवा द्रव्यवेद की एकेन्द्रियों में उपलब्धि नहीं होती है, इसलिए उसका अभाव सिद्ध नहीं होता है । किन्तु सम्पूर्ण प्रमेयों को जानने वाले केवलज्ञान से उसकी सिद्धि हो जाती है। किन्तु यह ज्ञान छद्‌मस्थों में नहीं पाया जाता है।

*(धवला ०१/३४६)*

इनके द्रव्यवेद और भाववेद दोनो नपुंसक होता है। भाववेद क्योकी उनके नपुंसकवेद नामकर्म का उदय है तथा द्रव्यवेद भी नपुंसक है वह बाहर से नही दिखता है लेकिन केवलज्ञानी के ज्ञान मे उनके नपुंसक दिखाई देता है।


*प्रश्न - एकेन्द्रिय जीव स्त्रीभाव व पुरुषभाव नहीं समझते, उनके स्त्री-पुरुष विषयक अभिलाषा कैसे बन सकती है?*

उत्तर-नहीं; क्योंकि जो पुरुष स्त्रीवेद से सर्वथा अनजान है और भृगृह के भीतर वृद्धि को प्राप्त हुआ है, ऐसे पुरुष के भी वासना देखी जाती है। इसलिए एकेन्द्रिय जीवों के स्त्री-पुरुष भाव में नहीं समझने पर भी (नपुंसक) वेद होने में कोई बाधा नहीं है।

*(यहा मैथुन संज्ञा है तथा मैथुन संज्ञा होने पर यह भाव उत्पन्न होते है)*      *(धवला ०१/३४६)*


*प्रश्न १४) एकेन्द्रियों के कषायों का सद्‌भाव कैसे पाया (सिद्ध होता है) जाता है?*

उत्तर- क्वीन्स और न्यू साउथवेल्स के जंगलों में डंक मारने वाले वृक्ष होते हैं। इन वृक्षों पर नुकीले काँटे होते हैं। इनकी पत्तियाँ घने बालों वाली होती हैं। इन वृक्षों के समीप जाने पर पत्तियाँ शरीर से चिपक जाती हैं और अपने रोंयें छोड़ देती हैं, यह उनकी क्रोध कषाय कही जा सकती है।

बरगद आदि वृक्ष अपनी डालियों से शाखाएँ निकालकर भूमि तक पहुँचा देते हैं तथा उन्हें ही अपने जड़ और तने के रूप में परिवर्तित कर लेते हैं। यूकेलिप्टस कुछ ही दिनों में २००–३०० फुट ऊँचाई तक सीधा-सीधा बढ्‌कर एक प्रकार से अपने अभिमान को ही प्रगट करता है।

कीट-भक्षी पौधे स्पष्टरूप से मायावी दिखाई देते हैं। ये अपने रूप, रस, गंध से कीट, पतंगों आदि को अपनी ओर आकर्षित करके नष्ट कर देते हैं। इसी प्रकार अमरबेल भी धीरे- धीरे बढ्‌कर उसी वृक्ष को नष्ट कर देती है।

कई वनस्पतियाँ अपना भोजन जमीन के भीतर अपनी जड़ों/तनों में संचित कर लेती हैं। यूकेलिप्टस अपनी अबू- बाजू का इतना पानी इकट्ठा करके रख लेता है कि ०४ – ०५ वर्ष तक अकाल पड़ने पर भी वह नहीं सूखता है। यह उसकी लोभ कषाय का परिणाम है।


*प्रश्न १५) एकेन्द्रिय जीवों के मिथ्यात्व कैसे सिद्ध होता है?*

उत्तर-एकेन्द्रिय जीवों के गृहीत- अगृहीत आदि सभी मिथ्यात्व सम्भव हैं, क्योंकि जिनका हृदय सात प्रकार के मिथ्यात्वरूपी कलक से अंकित है, ऐसे मनुष्यादि गति सम्बन्धी जीव पहले ग्रहण की हुई मिथ्यात्व पर्याय को न छोड्‌कर जब स्थावर पर्याय को प्राप्त करते हैं, तो उनके सातों’ ही प्रकार का मिथ्यात्व पाया जाता है। इस कथन में कोई विरोध नहीं है।    *(धवला ०१/२७७)*


*प्रश्न १६) क्या सभी एकेन्द्रिय जीवों के सभी मिथ्यात्व हो सकते हैं?*

उत्तर-नहीं, जो एकेन्द्रिय अथवा द्वीन्द्रिय आदि जीव जिन्होंने आज तक संज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याय को प्राप्त नहीं किया है उनके पाँचों गृहीत मिथ्यात्व नहीं हो सकते हैं, क्योंकि मन के अभाव मे जीव में किसी के उपदेश को ग्रहण करने की क्षमता नहीं हो सकती है। उपदेश को ग्रहण किये बिना गृहीत मिथ्यात्व नहीं हो सकता है।   *(धवला पुस्तक ०४)*


*प्रश्न १७) एकेन्द्रिय जीवों के कम- से- कम कितने प्राण होते हैं?*

उत्तर-एकेन्द्रिय के निर्वृत्यपर्याप्त तथा लब्ध्यपर्यातक  अवस्था मे कम-से-कम तीन प्राण होते हैं- स्पर्शन इन्द्रिय, कायबल, आयु प्राण। श्वासोच्छास पर्याप्ति पूर्ण होने के पहले श्वासोच्छास प्राण नहीं होता है। इसलिए निर्वृत्यपर्याप्त तथा लब्ध्यपर्यातक जीवों के तीन प्राण होते हैं।


*प्रश्न १८) एकेन्द्रिय जीवों के आहारादि संज्ञाएँ कैसे सिद्ध होती ईं?*

उत्तर- *आहार संज्ञा* सम्पूर्ण रूप से छाल को उतार देने पर वृक्ष वनस्पति का मरण हो जाता है और जल, वायु आदि के मिलने से वे हरे- भरे हो जाते हैं इसलिए आहार संज्ञा स्पष्ट है।

*भय संज्ञा* स्पर्श कर लेने पर लाजवन्ती आदि वनस्पतियाँ संकुचित हो जाती हैं यह भय संज्ञा है।

*मैथुन संज्ञा* स्त्रियों के कुल्ले के जल से सिंचित होने से कुछ लताएँ आदि हर्षित (पुष्पित) हो जाती हैं तथा स्त्रियों के पैरों के ताड़न से कुछ वनस्पतियों में पुष्प, अंकुर आदि प्रादुर्भूत हो जाते हैं इसलिए मैथुन संज्ञा भी स्पष्ट है।

*परिग्रह संज्ञा* वृक्ष की जड़ें निधान-खजाने आदि की दिशा में फैल जाती हैं इसलिए परिग्रह संज्ञा भी स्पष्ट है ।     *(मू आ. २१७)*

लगभग पूरी बुझी हुई अग्नि भी थोड़ा वायु का झोंका लग जाने पर या रुई आदि अनुकूल ईधन मिलने पर सचेत (पुनर्जीवित हुई) देखी जाती है, इसको उनकी *आहार संज्ञा* कह सकते है।

अग्नि से अग्नि आगे-आगे बढ़ती हुई देख कर *परिग्रह संज्ञा* कही जा सकती है। इसी प्रकार पृथ्वी आदि में भी संज्ञाएँ पाई जाती हैं।

*सिद्धान्त की दृष्टि से वेद कर्म के बन्ध का कारण वेद का उदय कहा गया है। एकेन्द्रिय जीवों के वेद का बन्ध होता है इसलिए उनके  *मैथुनसंज्ञा*  होती ही है, ऐसे ही अपकायिक आदि के उदय के साथ समझना चाहिए।*


*प्रश्न १९) एकेन्द्रिय जीवों के वचनयोग नहीं होता है, फिर उनके मृषानन्दी रौद्रध्यान कैसे हो सकता है?*

उत्तर:-एकेन्द्रिय जीवों के भी स्पर्शन इन्द्रिय के माध्यम से झूठ बोलने में आनन्द की तथा झूठ बोलने वाले की अनुमोदना सम्बन्धी कल्पनाएँ हो सकती हैं।

दूसरी बात, रौद्रध्यान के लिए बोलने की या वचन योग की अतिआवश्यकता भी नहीं है। अत: उनके मृषानन्दी रौद्रध्यान होने में कोई बाधा नहीं है ।


*प्रश्न २०) एकेन्द्रिय जीवों के अपर्याप्त अवस्था में कितने आसव के प्रत्यय होते हैं?*

उत्तर:- एकेन्द्रिय जीवों के अपर्याप्त अवस्था में छत्तीस (३६) आसव के प्रत्यय होते हैं –

मिथ्यात्व-०५, अविरति-०७, कषाय-२३, योग-०१ (औदारिक मिश्र काययोग)


*प्रश्न २१) एकेन्द्रिय जीवों की बावन (५२) लाख जातियाँ कौन- कौनसी हैं?*

उत्तर-एकेन्द्रिय जीवों की जातियाँ- 

पृथ्वीकायिक ०७ लाख,  जलकायिक ०७ लाख  अग्रिकायिक  ०७ लाख,  वायुकायिक ०७ लाख

नित्यनिगोद   ०७ लाख,   इतर निगोद  ०७ लाख

वनस्पति कायिक १० लाख जातियाँ मिलाकर एकेन्द्रिय जीवों की बावन (५२) लाख जातियाँ है।


*प्रश्न २२) एकेन्द्रिय के कितने कुल हैं?*

उत्तर:-एकेन्द्रिय जीवों के ६६ लाख करोड़ कुल हैं-

पृथ्वीकायिक २२ लाख करोड़ 

जलकायिक  ०७ लाख करोड़

अग्निकायिक ०३ लाख करोड़

वायुकायिक   ०७ लाख करोड़  

वनस्पतिकायिक २८ लाख करोड़ कुल मिलाकर 

सडसठ (६७) लाख करोड़ कुल हो जाते है।

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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*

37. कषाय मार्गणा - संज्वलन क्रोध मान माया में चौबीस ठाणा

37. कषाय मार्गणा - संज्वलन क्रोध मान माया में चौबीस ठाणा* https://youtu.be/ZHJN-2cfr-A?si=Npk8VDvtFyYEHuaM 🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴 संयम के साथ ...