गुरुवार, 29 जनवरी 2026

29. वेद मार्गणा, २४ ठाणा मे स्त्रीवेद

29.  वेद मार्गणा, २४ ठाणा मे स्त्रीवेद
https://youtu.be/QLdDpzJZhAQ?si=dlYMNVHTSb_a-OwZ
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*प्रश्न ०१) वेद मार्गणा किसे कहते हैं?*
उत्तर- वेद कर्म के उदय से होने वाले भाव को वेद कहते हैं। *(धवला ०१/१४१)*
आत्मा की चैतन्य रूप पर्याय में मैथुनरूप चित्त विक्षेप के उत्पन्न होने को वेद कहते है। 
*(गो. जी.२७२)* 
वेदों में जीवों की खोज करने को वेदमार्गणा कहते हैं 
◆ वेद चारित्र मोहनीय कर्म का भेद है और लिंग शरीर नाम कर्म के उदय से होने वाली शारीरीक रचना है, शरीर के चिन्ह विशेष है पूरी तरह पुदग्लमय है। 
वेद जीव के भाव रुप है इसलिए इसे चेतनमय भी कहते है क्योकी वेद रुप भाव जीव के ही होते है।

*प्रश्न ०२) वेदमार्गणा कितने प्रकार की है?*
उत्तर- वेद मार्गणा तीन प्रकार की है- स्त्रीवेद, पुरुषवेद, नपुंसकवेद। *(बृ द्र संग्रह १३ टीका)*
वेद मार्गणा के अनुवाद से स्त्रीवेद, पुरुषवेद, नपुंसकवेद तथा अपगतवेद वाले जीव होते *(धवला ०१/३४०)*
अथवा – वेद दो प्रकार के हैं- द्रव्य वेद, भाव वेद ।

*प्रश्न ०३) स्वीवेद किसे कहते हैं?*
उत्तर- जिसके उदय से जीव पुरुष में अभिलाषा रूप मैथुन सज्ञा से आक्रान्त होता है वह स्त्रीवेद है।
जिसके उदय से पुरुष के साथ रमने के भाव हों वह स्त्रीवेद है।   *(गो. जी. २७१)*

*प्रश्न ०४) पुरुषवेद किसे कहते हैं?*
उत्तर - जिसके उदय से जीव स्त्री में अभिलाषा रूप मैथुन सज्ञा से आक्रान्त होता है वह पुरुषवेद हे। जिसके उदय से स्त्री के साथ रमने के भाव हों वह पुरुषवेद है। *(गो. जी. २७१)*

*प्रश्न ०५) नपुंसकवेद किसे कहते हैं?*
उत्तर - जिसके उदय से जीव के स्त्री और पुरुष की अभिलाषा रूप तीव्र कामवेदना उत्पन्न होती है वह नपुंसकवेद है। 
जिसके उदय से स्त्री तथा पुरुष दोनों के साथ रमने के भाव हों वह नपुसक वेद है। *(गो. जी. २७१)*

*प्रश्न ०६) द्रव्यवेद किसे कहते हैं?*
उत्तर- जो योनि, मेहन आदि नामकर्म के उदय से रचा जाता है वह द्रव्यवेद है। *(सर्वा ०२/५२)*

*प्रश्न ०७) भाववेद किसे कहते ई?*
उत्तर - भाव लिंग आत्मपरिणाम स्वरूप है। वह स्त्री पुरुष, नपुंसक इन तीनों में एक-दूसरे की अभिलाषा लक्षण वाला है और वह चारित्रमोह के विकल्परूप स्त्री, पुरुष तथा नपुंसक वेद नामके नोकषाय के उदय से होता है। *(रा.वा. ०२/०६)*

*प्रश्न ०८) वेद मार्गणा में किस वेद को ग्रहण करना चाहिए?*
उत्तर- वेद मार्गणा में भाववेद को ग्रहण करना चाहिए क्योंकि यदि यहाँ द्रव्यवेद से प्रयोजन होता तो मनुष्य स्त्रियों के अपगतवेद स्थान नहीं बन सकता, क्योंकि द्रव्यवेद चौदहवें गुणस्थान् के अन्त तक पाया जाता है। परन्तु अपगतवेद भी होता है। इस प्रकार वचन निर्देश नौवें गुणस्थान के अवेद भाग से किया गया है। 
*(जिससे प्रतीत होता है कि यहाँ भाववेद से प्रयोजन है, द्रव्यवेद से नहीं)  (धवला ०२/५१३)*
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*✍️ स्त्रीवेद मे २४ स्थान*

*०१) गति       ०३/०४*   देव, मनुष्य, तिर्यंचगति, 
*०२) इन्द्रिय    ०१/०५*   पंचेन्द्रिय 
*०३) काय       ०१/०६*  त्रसकाय 
*०४) योग       १३/१५* (आहारकद्विक नही होता)
*०५) वेद           ०१/०३*  स्वकीय (स्त्रीवेद)
*०६) कषाय      २३/२५*  
*(पुरुषवेद, नपुंसक वेद नोकषाय को छोडकर)*
*०७) ज्ञान         ०६/०८*  
*कुज्ञान ०३* कुमतिज्ञान, कुश्रुतज्ञान, कुअवधिज्ञान
*सुज्ञान ०३* मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, 
*(मनःपर्यय तथा केवलज्ञान नहीं होता है)*
*०८) संयम       ०४/०७*  
असंयम, संयमासंयम, सामायिक, छेदोपस्थापना
*०९) दर्शन       ०३/०४*  चक्षु,अचक्षु,अवधिदर्शन
*१०) लेश्या       ०६/०६*  सभी लेश्या 
कृष्ण, नील, कापोत, पीत, पदम और शुक्ल लेश्या।
*११) भव्यक्त्व   ०२/०२*   भव्य और अभव्य।
*१२) सम्यक्त्व   ०६/०६*  
मिथ्यात्व,सासादन,मिश्र,उपशम,क्षयोपशम, क्षायिक
(क्षायिक लेने का कारण है यहा भाव स्त्री को लिया)
*१३) संज्ञी         ०२/०२*  संज्ञी और असंज्ञी।
*१४) आहारक   ०२/०२*  आहारक, अनाहारक
*१५) गुणस्थान   ०९/१४*  ०१ से ०९ तक
*१६) जीवसमास  ०२/१९*  असंज्ञी-संज्ञी पंचेन्द्रिय
*१७) पर्याप्ति    ०६/०६*  
आहार, शरीर, इन्द्रिय,श्वासोच्छ, भाषा,मन:पर्याप्ति
*१८) प्राण         १०/१०*  सभी प्राण
*इन्द्रिय ०५* स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और कर्ण
*बल ०३* कायबल, वचन बल और मनोबल प्राण
आयु प्राण और श्वासोच्छवास प्राण
*१९) संज्ञा         ०४/०४*  सभी संज्ञा
आहार संज्ञा, भय संज्ञा, मैथुन संज्ञा, परिग्रह संज्ञा।
*२०) उपयोग      ०९/१२*  
*ज्ञानोपयोग ०६* मति, श्रुत, अवधि, कुमति, कुश्रुत, कुअवधिज्ञानोपयोग
*दर्शनोपयोग ०३* चक्षु, अचक्षु, अवधिदर्शनोपयोग
*२१) ध्यान         १३/१६*  
*आर्त* इष्टवियोगज,अनिष्टसंयोगज,वेदना,निदान
*रौद* हिंसानन्दी,मृषानन्दी,चौर्यानन्दी,परिग्रहानन्दी
*धर्म* आज्ञाविचय,अपायविचय, विपाकविचय, संस्थानविचय     *शुक्ल* पृथक्त्ववितर्क वीचार 
*२२) आस्रव       ५३/५७*  
*मिथ्यात्व०५* विपरीत,एकान्त,विनय,संशय,अज्ञान
*अविरति १२* ०५ इन्द्रिय और मन को वश में नही करने तथा षट्काय के जीवों की रक्षा नहीं करना
*कषाय २३* १६ अनन्तानुबन्धी आदि ०७नोकषाय
*योग १३* मनोयोग०४, वचनयोग०४, काययोग ०५ 
*२३) जाति   २२ लाख/८४ लाख*  
तिर्यंच ०४ लाख, मनुष्य १४ लाख, देव ०४ लाख
*२४) कुल–८३-१/२ ला.क. /१९९.५ ला क*  
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*प्रश्न ०९) स्त्रीवेद किसके समान होता है?*
उत्तर - स्त्रीवेद के उदय में जीव पुरुष को देखते ही उसी प्रकार द्रवित हो उठता है जिस प्रकार आग को छूते ही लाख पिघल जाती है। *(व.चा. ४/८९)*
स्त्रीवेद कण्डे की अग्रि के समान माना गया है।
यह वेद स्त्री और पुरुष दोनो के हो सकता है।

*प्रश्न १०) स्त्रीवेदी जीव कहाँ-कहाँ पाये जाते हैं?*
उत्तर - मनुष्यगति, तिर्यंचगति तथा देवों में सोलहवें स्वर्ग तक स्त्रीवेदी जीव पाये जाते हैं। 
लेकिन सम्मूर्च्छन, लब्ध्यपर्यातक मनुष्य-तिर्यंचो में स्त्रियाँ नहीं होती हैं क्योंकि सम्मूर्च्छन जीव नपुंसक वेद वाले ही होते हैं ।

*प्रश्न ११) स्त्रीवेदी के आहारकद्विक काययोग क्यों नहीं होते हैं?*
उत्तर - अप्रशस्त वेदों के साथ आहारक ऋद्धि उत्पन्न नहीं होती है।  *(धवला २/६६७)*
अप्रशस्त वेदों यानि स्त्रीवेद और नपुंसक वेद

*प्रश्न १२) क्या स्त्रीवेदी की निर्वृत्यपर्याप्तक अवस्था में भी अवधिदर्शन हो सकता है?*
उत्तर - नहीं, क्योंकि सम्यग्दृष्टि जीव स्त्रीवेदी में उत्पन्न नहीं होता है। ना द्रव्यवेद मे ना भाववेद मे।
अवधिदर्शन सम्यग्दृष्टि तथा सम्यग्मिथ्यादृष्टि के होता है। तीसरे गुणस्थान वाले का मरण नहीं होता, इसलिए स्त्रीवेदी के निर्वृत्यपर्यातक अवस्था में अवधिदर्शन नहीं हो सकता। 
इसी प्रकार नपुंसक वेद में जानना चाहिए लेकिन नरक की अपेक्षा नपुंसकवेदी की निर्वृत्यपर्यातक अवस्था में भी अवधिदर्शन होता है।

*प्रश्न १३) स्त्रीवेद वाले के कौन-कौन से संयम नहीं हो सकते हैं?*
उत्तर - स्त्रीवेद वाले के तीन सयम नहीं हो सकते हैं- परिहारविशुद्धि, सूक्ष्म साम्पराय, यथाख्यात सयम।
परिहारविशुद्धि संयम पुरुषवेद वाले के ही होता है । सूक्ष्म साम्पराय तथा यथाख्यात संयम अवेदी जीवों के ही होते हैं, इसलिए स्त्रीवेद में ये तीनों संयम नहीं होते हैं। इसी प्रकार नपुंसक वेद में भी ये संयम नहीं हो सकते हैं ।

*प्रश्न १४) स्त्रीवेदी के निर्वृत्यपर्याप्तक अवस्था में कितने सम्यक्त्व हो सकते हैं?*
उत्तर - स्त्रीवेदी के निर्वृत्यपर्यातक अवस्था में दो सम्यक्त्व हो सकते हैं- मिथ्यात्व और सासादन।
स्त्रीवेद की पर्याप्त अवस्था में सभी सम्यक्त्व हों सकते हैं क्योंकि भावस्त्री वेदी मोक्ष जा सकते हैं।

*प्रश्न १५) स्त्रीवेद में कौन-कौन सी संज्ञाओं का अभाव हो सकता है?*
उत्तर - स्त्रीवेद में दो संज्ञाओं का अभाव हो सकता है- आहार संज्ञा तथा भय संज्ञा। 
आहार संज्ञा छठे गुणस्थान तक होती है सातवे गुणस्थान मे चली जाती है।
भय संज्ञा आठवे गुणस्थान तक होती है नौवे गुणस्थान  मे चली जाती है।

सातवे गुणस्थान मे वेद अतिमंद हो जाते है, छठे मे तो तीव्र भी हो सकते है।
भाववेद स्त्री हो द्रव्य से पुरुष हो ऐसे लोग मोक्ष जा सकते है, लेकिन जो तीर्थंकर होते है वे द्रव्य से भी और भाव से भी पुरुष वेद वाले होते है।
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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*

गुरुवार, 22 जनवरी 2026

28 अयोगी केवली

यह अयोग केवली गुणस्थान संसारी जीवो का सबसे अंतिम गुणस्थान है, इस गुणस्थान वाले जीवो को अयोग केवली जिन भी कहते है, इसके बाद मोक्ष प्राप्त होता है।*
*अयोग=योग रहित, केवली = केवल दर्शन ज्ञान सहित, जिन=घातिया कर्मो से रहित*
*०१)* जिनके योग विद्यमान नही है उन्हे अयोग कहते है, जिनके केवलज्ञान पाया जाता है उन्हे केवली कहते है।
*०२)* जिनके पुण्य और पाप को उत्पन्न करने वाले शुभ और अशुभ योग भी नही होते है अयोगी जिन कहलाते है।
*०३)* जो अट्टारह हजार (१८०००) शीलो के स्वामी है, सर्व आस्रव से रहित है, योग रहित है, केवलज्ञान सहित है वे अयोगी भगवान है।

*२४ स्थान मे अयोगी केवली*
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अयोगी केवली के २४ स्थानों में से १७ स्थान होते हैं

*०१) गति      ०१/०४*   मनुष्यगति
*०२) इन्द्रिय   ०१/०५*   पंचेन्द्रिय (द्रव्येन्द्रिय)
*०३) काय      ०१/०६*   त्रसकाय
*०४) योग       ००/१५*    ✖️
*०५) वेद        ००/०३*    ✖️ 
कोई वेद नही होता केवल पुरुष लिंग है। वेद नौवे गुणस्थान मे वेद समाप्त हो जाता है।
*०६) कषाय    ००/२५*    ✖️
*०७) ज्ञान       ०१/०८*   केवलज्ञान
*०८) संयम     ०१/०७*   यथाख्यात संयम
*०९) दर्शन       ०१/०४*   केवलदर्शन
*१०) लेश्या      ००/०६*   ✖️
*११) भव्यक्त्व  ०१/०२*  भव्य
*१२) सम्यक्त्व   ०१/०६*  क्षायिक सम्यक्त्व 
*१३) संज्ञी        ००/०२*  ✖️ (अनुसंज्ञी कहलाते)
*१४) आहारक   ०१/०२*  अनहारक (शरीर के योग्य कार्मण वर्गणा को भी ग्रहण नही करते)
*१५) गुणस्थान   ०१/१४*  अयोग केवली
*१६) जीवसमास  ०१/१९*  पंचेन्द्रिय 
संज्ञी असंज्ञी से रहित सामान्य पंचेन्द्रिय होगे
*१७) पर्याप्ति      ०६/०६*  छहो पर्याप्ति 
नया कुछ भी ग्रहण नही कर रहे है, लेकिन पुराना सभी वर्गणा है।
*१८) प्राण          ०१/१०*  आयु प्राण
*१९) संज्ञा          ००/०४*  ✖️
*२०) उपयोग      ०२/१२*  केवलदर्शन, केवलज्ञान
*२१) ध्यान         ०१/१६*  व्युपरतक्रियानिवृति
*२२) आस्रव       ००/५७*  ✖️
*२३) जाति   १४ लाख/८४ लाख* 
*२४) कुल      १४ ला.क./१९९.५ लाख़ करोड*
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◆ अयोग केवली अवस्था मे २४ स्थानो मे से १७ स्थान ही होते है।

*विशेषताएँ*
*०१)* यहाँ पूर्ण संवर तथा उत्कृष्ट निर्जरा होती है।
*०२)* इस गुणस्थान में ८५ प्रकृतियो की सत्ता है, इतनी प्रकृतियो का क्षय तो १३ वे गुणस्थान तक मे भी नही होता जितना की १४ वे मे क्षय होता है। जिसमे से उपान्त्य (अंतिम समय से पहले) मे ७२ कर्म प्रकृतियो का क्षय होता है तथा अंतिम समय मे बाकी १३ प्रकृतियो का क्षय होता है, तथा सभी कर्मो का क्षय होने से कर्ममल से रहित होकर शुद्धात्म अवस्था को प्राप्त हो जाते है।
*०३)* अयोगी जिन १८ हजार शीलों के भेदो के स्वामी बन जाते है, तथा ८४ लाख उत्तर गुणो के धारक हो जाते है।
*०४)* चौदहवे गुणस्थान के प्रथम समय से ही आत्मा के सम्पूर्ण प्रदेश अकम्प स्थिर होकर शरीर से किंचित न्यून होकर शरीर आकार वाले हो जाते है, अर्थात हलन चलन बंद हो जाता है, निष्कम्प हो गये
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*सत* इस गुणस्थान मे जीव पाये जाते है
*संख्या* इस गुणस्थान मे होने वाले जीवो की संख्या कम से कम एक या दो, तथा अधिक से अधिक १०८ जीव हो सकते है।
*क्षेत्र* लोक का असंख्यात भाग ढाई द्वीप के अन्दर ही रहते है।
*भाव* मूल मे तीन भाव *(क्षायिक, औदयिक, पारिणामिक भाव)* होते है।
विस्तार से ५३ भावो मे से १३ भाव–
क्षायिक के नौ भेद, औदयिक के दो भेद (मनुष्य गति व असिद्धत्व), पारिणामिक के दो भेद (जीवत्व, भव्यत्व)
*🌴काल* इस गुणस्थान का काल अंतरमुहूर्त यानि पाँच हस्व स्वर *(अ, ई, उ, ऋ, लृ)* के उच्चारण मे जितना काल लगता है वह है।
*🌴बंध प्रत्यय* यहा आस्रव और बंध के कारणो का अभाव होने से आस्रव व बंध का पूर्णता आभाव है, यहा कषाय भी नही, योग भी नही है केवल संवर और निर्जरा होती है फिर मोक्ष हो जाता है।
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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*

गुरुवार, 15 जनवरी 2026

27. योग मार्गणा (समुच्चय प्रश्न)

*प्रश्न १००) किन-किन योग मे सभी संयम होते है।*
उत्तर - नौ योग मे सभी संयम हो सकते है –
मनोयोग ०४, वचनयोग ०४, औदारिक काययोग
*◆ मनोयोग* के चारो भेदो मे भी सातो संयम होते है। ०१ से ०४ गुणस्थान मे असंयम होगा, ०५ वे गुणस्थान वालो के देश संयम होगा, ०६ से १२ गुणस्थान वालो के सामायिक, छेदोपस्थापना, परिहार विशुद्धि, सुक्ष्म सांपराय और यथाख्यात संयम होगे तथा १३ वे गुणस्थान मे की मनोयोग के दो भेद सत्य और अनुभय होते है।
*◆ वचनयोग* के चारो भेदो मे भी सातो संयम है। 
जैसे मनोयोग मे सातो संयम है उसी प्रकार वचन योग मे भी सातो संयम है।
*◆ काययोग* औदारिक काययोग मे भी सातो संयम होते है।
वैक्रियिकद्विक काययोग मे केवल असंयम ही होता है देव हो या नारकी
आहारकद्विक काययोग मे केवल दो संयम है सामायिक और छेदोपस्थापना संयम
कार्मण काययोग मे दो संयम –असंयम और यथाख्यात संयम होते है।
औदारिक मिश्र मे दो संयम – असंयम ०१ से ०४ गुणस्थान अपेक्षा, केवली समुद्धात अपेक्षा यथाख्यात संयम
औदारिक काययोग मे भी सातो संयम होते है।
०१ से ०४ गुणस्थान तक असंयम, ०५ वे गुणस्थान मे संयमासंयम, ०६ से १३ गुणस्थान तक बाकी संयम होते है।

*प्रश्न १०१) किन किन योगो मे यथाख्यात संयम नही हो सकता है?*
उत्तर - चार योगो मे यथाख्यात संयम नही हो सकता है–
आहारक काययोग, आहारक मिश्र काययोग, 
वैक्रियक काययोग, वैक्रियक मिश्न काययोग

*प्रश्न १०२) किस योग ने दो-दो संयम होते है?*
उत्तर - चार योग मे दो-दो संयम होते है –
आहारक और आहारक मिश्र – सामायिक और छेदोपस्थाना संयम
औदारिक मिश्र मे –असंयम और यथाख्यात संयम
कार्मण काययोग – असंयम और यथाख्यात संयम

*प्रश्न १०३) किस-किस योग मे शुभ लेश्या ही होती है?*
उत्तर - दो योग- आहारक और आहारक मिश्र मे शुभ लेश्या ही होती है।

*प्रश्न १०४) किन-किन योगों में सैनी जीव ही होते हैं*
उत्तर- ११ योगों में सैनी जीव ही होते हैं- 
मनोयोग ०४, वचनयोग ०३, काय ०४ योग मे
◆ मन के चारो योग मे सैनी जीव ही होते हैं।
◆ वचन के चार मे से अनुभयवचनयोग बिना तीन मे सैनी जीव ही होते हैं।
◆ काय के सात मे से वैक्रियकद्विक, आहारकद्विक मे सैनी जीव ही होते हैं।
औदारिकद्विक और कार्मण काययोग मे सैनी और असैनी दोनो प्रकार के जीव हो सकते है। 

*प्रश्न १०५) ऐसे कितने योग है जो मात्र असैनी के ही होते है।*
उत्तर - ऐसा कोई भी योग नही है जो मात्र असैनी का ही हो।

*प्रश्न १०६) किस-किस योग मे मात्र चार ही गुणस्थान होते है?*
उत्तर - तीन योगों में ०४ ही गुणस्थान होते हैं –
औदारिकमिश्र काययोग – ०१, ०२, ०४, १३
कार्मण काययोग – ०१, ०२, ०४, १३
वैक्रियक काययोग – ०१, ०२, ०३, ०४
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औदारिक काययोग मे ०१- १३ तक गुणस्थान 
वैक्रियकमिश्र काययोग – ०१, ०२, ०४ गुणस्थान
आहारकद्विक काययोग – ०६ गुणस्थान

*प्रश्न १०७) किस- किस योग में १३ गुणस्थान होते हैं?*
उत्तर- पाँच योगों में १३ गुणस्थान होते हैं- 
मनोयोग ०२- सत्यमन, अनुभयमन मे ०१- १३
वचनयोग ०२ - सत्यवचन, अनुभयवचन मे ०१- १३
औदारिक काययोग मे ०१- १३ तक गुणस्थान है
 
*प्रश्न १०८) कितने योगों में सभी जीवसमास होते हैं?*
उत्तर - तीन योगों में सभी जीवसमास होते है।
●औदारिक काययोग मे सभी जीवसमास होते है। यह एकेन्द्रिय से १३ वे गुणस्थान है- १९ जीवसमास
●औदारिकमिश्र काययोग मे भी एकेन्द्रिय से संज्ञी पंचेन्द्रिय जीव है, सभी १९ जीवसमास होते है।
●कार्मणकाययोग मे भी एकेन्द्रिय से संज्ञी पंचेन्द्रिय जीव है, सभी १९ जीवसमास होते है।

*प्रश्न १०९) ऐसे कौनसे योग हैं जिनमें श्वासोच्छास प्राण नहीं पाया जाता है?*
उत्तर - चार योगों औदारिकमिश्र, वैक्रियिकमिश्र,  आहारक मिश्र, कार्मण काययोग में श्वासोच्चवास प्राण नहीं पाया जाता है।

*प्रश्न ११०) ऐसे कौन-कौन से योग हैं जिनमें संज्ञाओं का अभाव भी हो सकता है?*
उत्तर - ११ योग मे संज्ञा का अभाव भी हो सकता है
मन ०४, वचन ०४, औदारिकद्विक काययोग, कार्मण काययोग मे संज्ञाओं का अभाव भी हो सकता है। 
कार्मण काययोग मे १३ वे गुणस्थान की अपेक्षा संज्ञाओं का अभाव भी हो सकता है। 

*प्रश्न १११) किस-किस योग में संज्ञातीत जीव नहीं होते हैं?*
उत्तर - चार योगों वैक्रियिकद्विक और आहारक द्विक में संज्ञातीत जीव नहीं होते हैं।
*वैक्रियिकद्विक* क्योंकि देव-नारकी चतुर्थ गुणस्थान से आगे नहीं जा सकते हैं। 
*आहारकद्विक* छठे गुणस्थान में ही होता है।

*प्रश्न ११२) कौन-कौन से योग में आस्रव के ४३ प्रत्यय होते हैं?*
उत्तर - आहारकद्विक काययोग को छोड्‌कर शेष १३ योगों में अर्थात् मन ०४, वचन ०४, औदारिकद्बिक, वैक्रियिकद्विक तथा कार्मण काययोग में आस्रव के ४३ प्रत्यय होते हैं। (मिथ्यात्व ०५,अविरति १२, कषाय २५, योग स्वकीय=४३)
●आहारकद्विक मे आस्रव के प्रत्यय– मिथ्यात्व ००,  अविरति १२, कषाय ११ (संज्वलन ०४, नोकषाय ०७), योग स्वकीय = २४ आस्रव प्रत्यय

*प्रश्न ११३) सबसे कम आस्रव के प्रत्यय किस योग में होते हैं?*
उत्तर - सबसे कम आस्रव के प्रत्यय आहारकद्बिक काययोग में होते हैं- इन में आस्रव के १२ प्रत्यय हैं। संज्वलन कषाय ०४, नोकषाय ०६ + पुरुषवेद तथा स्वकीय योग। 
आहारक काययोग में आहारक तथा आहारकमिश्र में आहारकमिश्र काययोग होता है ।
● जहाँ केवल औदारिक काययोग ही शेष रहता है ऐसे अरहन्त केवली भगवान के आस्रव का मात्र एक (औदारिक काययोग रूप) प्रत्यय शेष रहता है। 
इसी प्रकार औदारिक मिश्र तथा कार्मण काययोग में भी केवली भगवान के एक ही स्वकीय योग रूप आस्रव का प्रत्यय होता है।
● औदारिकमिश्न केवली भगवान के समुद्धात मे कपात-प्रतर-लोकपूरण अवस्था मे होता है। वहा एक ही योग होता है कार्मण काययोग
◆ केवली भगवान के आस्रव के अधिक से अधिक ०७ आस्रव के प्रत्यय होते है –
मन ०२ (सत्य, अनुभय), वचन ०२ (सत्य, अनुभय), औदारिकद्विक काययोग, कार्मण काययोग।
*(●केवली भगवान के सयोग केवली मे अधिक से अधिक ०७ आस्रव के प्रत्यय, और कम से कम ०१ आस्रव का प्रत्यय होता हैं)*
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*प्रश्न ५६१) किस-किस योग में किस अपेक्षा से नपुंसक वेद होता है?*
उत्तर- चार मनोयोगों एव तीन वचन योगों में (अनुभय वचन को छोडकर) इनमे पर्याप्त नारकी, पर्याप्त तिर्यंच तथा पर्याप्त मनुष्यों में नपुंसक वेद होता है।
◆ अनुभय वचन योग– पर्याप्त द्विन्द्रिय से लेकर पर्याप्त पंचेन्द्रिय तिर्यंच, पर्याप्त मनुष्य तथा पर्याप्त नारकियों के नपुंसक वेद होता है।
◆ औदारिक काययोग – पर्याप्त एकेन्द्रिय से लेकर नवम गुणस्थान के सवेद भाग तक नपुंसक वेद होता है।
◆ औदारिक मिश्र काययोग – निर्वृत्यपर्यातक तथा लब्ध्यपर्यातक मनुष्य-तिर्यंचों में नपुंसक वेद होता है।
◆ वैक्रियिक काययोग – पर्याप्त नारकियों के नपुंसक वेद होता है।
◆  वैक्रियिक मिश्रकाययोग – निर्वृत्यपर्यातक नारकियों के नपुंसक वेद होता है।
◆ कार्मण काययोग – अनाहारक नारकी, मनुष्य तथा तिर्यंचों के यानि जो विग्रहगति से जा रहे है उनमे भी नपुंसक वेद रह सकता है।

विशेष : आहारकद्विक काययोग में नपुंसक वेद नहीं होता है । 
औदारिक मिश्र काययोग, कार्मण काययोग तथा सत्य अनुभय मन वचन योग में केवली भगवान को ग्रहण नहीं करना चाहिए, क्योंकि वे वेदातीत होते हैं ।
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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*


गुरुवार, 8 जनवरी 2026

26. चौबीस ठाणा मे कार्मण काययोग

26. चौबीस ठाणा मे कार्मण काययोग*
https://youtu.be/RY2NBtowBkE?si=WzBFuKT9MCy-J5KD
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जब कोई जीव कई से मरण करके विग्रहगति मे जाता है, वह विग्रहगति की अवस्था कार्मण काय योग होता है, तथा इसी अवस्था मे जीव अनहारक रहता है। तथा जब केवलीसमुद्धात के दो प्रतर और एक लोकपुरण ये तीन समय मे भी कार्मण काययोग होता है।

24. स्थान मे कार्मण काययोग :-
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*०१) गति      ०४/०४*   चारो गति
*०२) इन्द्रिय    ०५/०५*   पाँचो इन्द्रिय
*०३) काय      ०६/०६*   छहो काय
*०४) योग   स्वकीय/१५* कार्मण काययोग
*०५) वेद         ०३/०३*  तीनो वेद 
*०६) कषाय     २५/२५*  सभी कषाएँ
*०७) ज्ञान        ०६/०८* 
      (कुअवधिज्ञान और मनःपर्यय ज्ञान के बिना)
*०८) संयम     ०२/०७*  
असंयम विग्रहगति मे यथाख्यात केवली समुद्धात में
*०९) दर्शन      ०४/०४*  चारो दर्शन
*१०) लेश्या     ०६/०६*  सभी लेश्या
*११) भव्यक्त्व   ०२/०२*  भव्य और अभव्य दानो
*१२) सम्यक्त्व   ०५/०६*  
मिश्र सम्यक्त्व मे मरण नही होता इसलिए नही होता तथा क्षायिक केवली समुद्धात अपेक्षा होता है।
*१३) संज्ञी         ०२/०२*  सैनी और असैनी
*१४) आहारक   ०१/०२*  अनहारक
*१५) गुणस्थान   ०४/१४*  ०१, ०२, ०४, १३
*१६) जीवसमास  १९/१९*  सभी
*१७) पर्याप्ति       ००/०६*  कोई भी नही 
*१८) प्राण           ०७/१०*  सात प्राण 
०५ भावेन्द्रिय, ०१ कायबल, ०१ आयु प्राण
*१९) संज्ञा           ०४/०४*  चारो  संज्ञा
आहार संज्ञा, भय संज्ञा, मैथुन संज्ञा, परिग्रह संज्ञा।
*२०) उपयोग      १०/१२*  
कुअवधिज्ञानोपयोग और मनःपर्यय ज्ञानो के बिना
*२१) ध्यान         १०/१६*  
      आर्तध्यान ०४, रौद्रध्यान ०४,  धर्मध्यान ०२
*२२) आस्रव     ४३/५७*  
मिथ्यात्व ०५,अविरति १२,कषाय २५, योग स्वकीय
*२३) जाति   ८४ लाख/८४ लाख* सभी
*२४) कुल       सभी/१९९.५ लाख़ करोड*
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*प्रश्न ९२) -कार्मणकाययोग किसे कहते हैं?*
उत्तर-ज्ञानावरणादिक अष्ट कर्मों के समूह को अथवा  नामकर्म के उदय से होने वाली काय को कार्मण काय कहते हैं और उसके द्वारा होने वाले आत्म प्रदेशों के परिस्पन्दन को कार्मण काययोग कहते हैं।
 *(गो. जी. २४१)*
कार्मण शरीर के निमित्त से जो योग होता है उसे कार्मण काययोग कहते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि अन्य औदारिकादि शरीर वर्गणाओं के बिना केवल एक कर्म से उत्पन्न हुए वीर्य के निमित्त से आत्म प्रदेश परिस्पन्दन रूप जो प्रयत्न होता है उसे कार्मण काययोग कहते है।  *(धवला ०९/२९७)*
*(औदारिक आदि वर्गणा यानि औदारिक, वैक्रियक, आहारक वर्गणा के बिना)*

*प्रश्न ९३) क्या कार्मण काययोग मात्र विग्रहगति में ही होता है?*
उत्तर- नहीं, विग्रहगति में तो कार्मण काययोग होता ही होता है लेकिन १३ वें गुणस्थान की समुद्धात अवस्था में भी तीन समय तक बिना विग्रहगति के भी कार्मण काययोग होता है।

*प्रश्न ९४) कार्मण काययोग में कुअवधिज्ञान क्यों नहीं होता?*
उत्तर- कुअवधिज्ञान अनुगामी नहीं होता, जिसको साथ ले जाने से कार्मण काययोग में कुअवधिज्ञान बन जावे और कार्मण काययोग के अल्पकाल में कुअवधिज्ञान उत्पन्न भी नहीं हो सकता इसलिए कार्मण काययोग में कुअवधिज्ञान नहीं होता है।

*प्रश्न ९५) कार्मण काययोग में अवधिज्ञान किस- किस अपेक्षा होता है?*
उत्तर- कार्मण काययोग में अवधिज्ञान की अपेक्षाएँ- *०१)* अनुगामी अवधिज्ञान को लेकर जाने वाले चारों गति के जीवों के
*०२)* सर्वार्थसिद्धि से आने वाले जीवों के 
*०३)* तीर्थंकर प्रकृति की सत्ता वाले देव और नरक गति से आने वाले जीवों के, आदि ।

*प्रश्न ९६) कार्मण काययोग में चक्षुदर्शन किन-किन जीवों के पाया जाता है?*
उत्तर- कार्मण काययोग में स्थित चतुरिन्द्रिय, असंज्ञी पंचेन्द्रिय तथा संज्ञी पंचेन्द्रिय जीवों के चक्षुदर्शन पाया जाता है।
चतुरिन्द्रिय, असंज्ञी पंचेन्द्रिय के ०१, ०२ गुणस्थान 
संज्ञी पंचेन्द्रिय के ०१, ०२, ०४ गुणस्थान होता है।
◆ यहा चक्षुदर्शनावरण कर्म का क्षयोपशम है इसलिए चक्षुदर्शन होता है।
◆ एक, दो, तीन इन्द्रिय जीवो के चक्षु ही नही होती अतः चक्षुदर्शन भी नही होता है।

*प्रश्न ९७) कार्मणकाययोग में कौन सा सम्यग्दर्शन उत्पन्न हो सकता है?*
उत्तर- कार्मण काययोग में कोई भी सम्यग्दर्शन उत्पन्न नहीं हो सकता क्योंकि सम्यग्दर्शन की पूर्व भूमिका में जिस विशुद्धि की आवश्यकता होती है वह विशुद्धि इतने अल्पकाल में नहीं हो पाती है। इसलिए वहाँ कोई भी सम्यग्दर्शन उत्पन्न नहीं हो सकता है।
*नोट* कृतकृत्य वेदक सम्यग्द्रष्टि विग्रहगति में सम्यक प्रकृति का क्षय करके क्षायिक सम्यग्द्रष्टि बन सकता है।

*प्रश्न ९८) कार्मण काययोग मे कम से कम कितने प्राण हो सकते है।*
उत्तर - कार्मण काययोग मे कम से कम दो प्राण कायबल और आयु प्राण होते है। ये प्राण केवली समुद्धात मे जब कार्मण काययोग होता है तब होते है। (प्रतर, लोकपुरण और प्रतर के समय मे)

*प्रश्न ९९) कार्मण काययोग मे कौन सा ध्यान नही हो सकता है?*
उत्तर - कार्मण काययोग मे छ्ह ध्यान नही हो सकते है – विपाक विचय, संस्थान विचय धर्मध्यान तथा चारो शुक्ल ध्यान नही होते है।
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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*

गुरुवार, 25 दिसंबर 2025

25) चौबीस ठाणा आहारकद्विक काययोग

25) चौबीस ठाणा आहारकद्विक काययोग
https://youtu.be/l7PwFJwPDw4?si=V8I2Q6L_mb_YlX90

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*द्विक यानि दो, आहारकद्विक का अर्थ है आहारक काययोग और आहारक मिश्न काययोग*

*✍️२४ स्थान आहारकद्विक काययोग*
*०१) गति      ०१/०४*   मनुष्य गति
*०२) इन्द्रिय    ०१/०५*   पंचेन्द्रिय
*०३) काय      ०१/०६*   त्रसकाय
*०४) योग   स्वकीय/१५* आहारकद्विक
*०५) वेद         ०१/०३*  पुरुषवेद 
*०६) कषाय     ११/२५* कषाय ०४ नोकषाय ०७
(संजवलन चतुष्क तथा स्त्रीवेद नपुंसकवेद को छोडकर बाकी ०७ नोकषाय)
*०७) ज्ञान        ०३/०८* मति, श्रुत, अवधिज्ञान
*०८) संयम     ०२/०७*  सामायिक, छेदोपस्थापना
*०९) दर्शन      ०३/०४*  तीन दर्शन
      (चक्षुदर्शन,अचक्षुदर्शन,अवधिदर्शन)
*१०) लेश्या     ०३/०६*  पीत, पदम, शुक्ल लेश्या
*११) भव्यक्त्व   ०१/०२*  भव्य 
*१२) सम्यक्त्व   ०२/०६*  क्षायिक, क्षायोपशमिक
*१३) संज्ञी         ०१/०२*  सैनी
*१४) आहारक   ०१/०२*  आहारक
      मिश्न मे भी आहारक, आहारक मे भी आहारक
*१५) गुणस्थान   ०१/१४*  छठा गुणस्थान
*१६) जीवसमास  ०१/१९*  सैनी पंचेन्द्रिय
*१७) पर्याप्ति       ०६/०६*  
         मिश्र मे ०२, आहारक मे ०६
*१८) प्राण           १०/१०*  दसो प्राण 
      मिश्न अपेक्षा ०७, आहारक अपेक्षा १० प्राण
*१९) संज्ञा           ०४/०४*  चारो  संज्ञा
आहार संज्ञा, भय संज्ञा, मैथुन संज्ञा, परिग्रह संज्ञा।
*२०) उपयोग      ०६/१२*  मति, श्रुत, अवधिज्ञान, चक्षुदर्शन,अचक्षुदर्शन, अवधिदर्शन
*२१) ध्यान         ०७/१६*  
       आर्त ०३ (निदान बिना), धर्मध्यान ०४
*२२) आस्रव     १२/५७*  कषाय ११, योग स्वकीय
*२३) जाति   १४ लाख/८४ लाख* मनुष्यगति की
*२४) कुल-१४ लाख करोड/१९९.५ लाख़ करोड*
       (मनुष्य गति संबधी कुल)
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*प्रश्न ८६) आहारक काययोग किसे कहते हैं?*
उत्तर- आहारक शरीर के निमित्त से आत्मा के प्रदेशो मे कम्पन होना आहारक काययोग है। यह छठवे गुणस्थानवर्ती मुनिराज जो आहारक ऋद्धि के धारक हो, असंयम का परिहार, आगम के किसी विषय मे शंका हो, जिज्ञासा होने पर उनके मस्तक से एक हाथ प्रमाण पुतला निकलता है, यह पुतला है आहारक शरीर तथा इसमे जो हाथ पैर आदि निकलना आहारक अंगोपांग कहलाता है। इस आहारक शरीर के निमित्त से आत्मा के प्रदेशो मे होने वाला कम्पन आहारक काययोग है। यह आहारक शरीर तीर्थयात्रा के लिए भी निकलता है। यह अंतरमुहूर्त के लिए होता है।  *(गो. जी. २३५)* 
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*विशेष* आहारक शरीर किसी सूक्ष्म तत्व के विषय मे जिसको कुछ संशय उत्पन्न हुआ हो, उस परम ऋषि के मस्तक में-से मूल शरीर को न छोड़कर, निर्मल स्फटिक के रंग का (सफेद वर्ण का), हस्त प्रमाण सर्वांग सुंदर, पुरुषाकार, समचतुरस्र-संस्थान से युक्त, रस, रूधिर, मांस, मेदा, अस्थि, मज्जा और शुक्र इन सात धातुओं से रहित, विष अग्नि एवं शस्त्रादि समस्त बाधाओं से मुक्त, वज्र, शिला, स्तंभ, जल व पर्वतों में से गमन करने मे दक्ष अर्थात मनुष्य लोक मे अप्रतिघाती, जहाँ कही भी केवली य़ा श्रुतकेवली को देखता है वही उनके पादमूल मे जाकर तीन प्रदक्षिणा करता है तथा प्रदक्षिणा करके ही संशय दूर हो जाता है और अंतर्मुहूर्त मे वापिस लौटकर मूल शरीर मे प्रवेश कर जावे सो आहारक शरीर है। आहारक शरीर (पुतला) सूक्ष्म तत्व के विषय मे संशय होने के साथ साथ तीर्थंकरो के अंतिम तीन कल्याणको मे, जिन बिम्ब, जिन गृह वन्दना हेतु भी निकलता है।

*प्रश्न ८७) आहारक मिश्र काययोग किसे कहते हैं?*
उत्तर- जब तक आहारक शरीर पर्याप्त नहीं होता है तब तक उसको आहारक मिश्र कहते हैं और उसके द्वारा होने वाले योग को आहारकमिश्र काययोग कहते हैं । *(धवला ०१/२९७)*
*कार्मण वर्गणा और आहारक वर्गणा के मिश्रण से आहारक मिश्न होता है।*

*प्रश्न ८८) आहारक काययोग में कितने संयम होते हैं?*
उत्तर- आहारक काययोग में दो संयम होते हैं– सामायिक और छेदोपस्थापना। 
परीहारविशुद्धि संयम के साथ आहारकऋद्धि नहीं होती तथा शेष संयम छठे गुणस्थान में नहीं हो सकते हैं इसलिए यहाँ दो संयम कहे गये हैं ।

*प्रश्न ८९) आहारकमिश्र काययोग में कौन-कौनसे सम्यक्त्व नहीं हो सकते हैं?*
उत्तर-आहारकमिश्र काययोग में चार सम्यक्त्व नहीं हो सकते हैं- मिथ्यात्व, सासादन, मिश्र और उपशम सम्यक। 
उपशम सम्यक के साथ आहारक ऋद्धि नहीं होती है इसलिए यहाँ उसका ग्रहण नहीं किया है।

*प्रश्न ९०) आहारकमिश्र काययोग में कितने ध्यान हो सकते हैं?*
उत्तर- आहारकमिश्र काययोग में सात ध्यान पाये जाते हैं- तीन आर्त्तध्यान (निदान के बिना), चार धर्मध्यान होते हैं ।

*प्रश्न ९१) आहारक शरीर की कौन-कौन सी विशेषताएँ हैं?*
उत्तर-आहारक शरीर की विशेषताएँ- 
*०१)* रस आदि सात धातुओं से रहित होता है।
*०२)* समचतुरस संस्थान वाला होता है। 
*०३)* अस्थिबन्धन से रहित अर्थात् संहनन से रहित होता है। 
*०४)* चन्द्रकान्तमणि से निर्मित की तरह अत्यन्त स्वच्छ होता है। (धवल वर्ण)
*०५)* एक हस्त प्रमाण अर्थात् चौबीस व्यवहार अंगुल परिमाण वाला होता है। 
*०६)* उत्तमांग मस्तक से उत्पन्न होता है।
*०७)* पर से अपनी और अपने से पर की बाधा से रहित होता है।
*०८)* आहारक शरीर छठे गुणस्थान वाले मुनिराज के ही होता है।   *(गो. जी. २३७)*
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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*

गुरुवार, 11 दिसंबर 2025

24) चौबीस ठाणा वैक्रियिक मिश्र काययोग*

*२४) चौबीस ठाणा वैक्रियिक मिश्र काययोग*
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*जहाँ कार्मण काययोग समाप्त होगा उसके अगले ही क्षण से ही मिश्र काययोग प्रारम्भ हो जाता है।*

*०१) गति      ०२/०४*   नरक, देव
*०२) इन्द्रिय    ०१/०५*   पंचेन्द्रिय
*०३) काय      ०१/०६*   त्रसकाय
*०४) योग   स्वकीय/१५* वैक्रियकमिश्न काययोग
*०५) वेद         ०३/०३*  तीनो वेद
      स्त्रीवेद, पुरुषवेद देवो के, नपुंसकवेद नारकी के
*०६) कषाय     २५/२५* कषाय १६ नोकषाय ०९
*०७) ज्ञान        ०५/०८* 
      कुमति, कुश्रुत, मति, श्रुत, अवधिज्ञान
*०८) संयम      ०१/०७*  असंयम
*०९) दर्शन      ०३/०४*  तीन दर्शन
      चक्षुदर्शन,अचक्षुदर्शन,अवधिदर्शन
*१०) लेश्या      ०६/०६*  छहो लेश्या
      नारकियो मे ०३ अशुभ, देवो मे ०३ शुभ लेश्या
*११) भव्यक्त्व   ०२/०२*  भव्य और अभव्य
*१२) सम्यक्त्व   ०५/०६*  पाँच सम्यक्त्व
मिश्न नहीं होता,औपशमिक मे द्वितीयोपशम होता है
*१३) संज्ञी         ०१/०२*  संज्ञी
*१४) आहारक   ०१/०२*  आहारक
*१५) गुणस्थान   ०३/१४*  ०१, ०२, ०४
*१६) जीवसमास  ०१/१९*  सैनी पंचेन्द्रिय
*१७) पर्याप्ति       ०२/०६*  आहार, शरीर पर्याप्ति
*१८) प्राण           ०७/१०*  
      ०५ इन्द्रिय प्राण, कायबल, आयु प्राण
*१९) संज्ञा           ०४/०४*  चारो  संज्ञा
आहार संज्ञा, भय संज्ञा, मैथुन संज्ञा, परिग्रह संज्ञा।
*२०) उपयोग      ०८/१२* 
       कुमति, कुश्रुत, मति, श्रुत, अवधि, 
       चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन, अवधिदर्शन
*२१) ध्यान         १०/१६*  
      आर्त ०४, रौद्र ०४, धर्म ०२
*२२) आस्रव       ४३/५७*  
मिथ्यात्व ०५,अविरति १२,कषाय २५, योग स्वकीय
*२३) जाति   ०८ लाख/८४ लाख*  
नारकी ०४ लाख, देवो ०४ लाख 
*२४) कुल-५१ लाख करोड/१९९.५ लाख़ करोड*
नारकी मे २५ लाख करोड, देवो मे २६ लाख करोड
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*प्रश्न ७५) वैक्रियिक मिश्रकाययोग किसे कहते हैं?*
उत्तर- जब तक वैक्रियिक शरीर पूर्ण नहीं होता तब तक उसको वैक्रियिक मिश्र कहते हैं और उसके द्वारा होने वाले योग को, आत्मप्रदेश परिस्पन्दन को वैक्रियिकमिश्र काययोग कहते हैं। *(गो. जी.२३४)*

जब यह जीव मनुष्य या तिर्यंच से मरण करके देव और नरक गति की ओर जाता है, तब विग्रहगति मे कार्मण काययोग होता है तथा अनहारक होता है। जहा जन्म लेना होता है, वहा पहुचने पर आहारक पना शरु हो जाता है जब तक शरीर पर्याप्ति पूर्ण ना हो तब तक मिश्नपना रहता है। यहा पर वैक्रियक वर्गणाए औऱ कार्मण वर्गणाए दोनो के मिश्नण से आत्मा के प्रदेशो में कंपन होता है इसलिए इसको वैक्रियक मिश्र काययोग कहते है।
यानि आहारक वर्गणा और कार्मण वर्गणा दोनो के निमित्त से जो आत्मा मे कंपन होगा उसे वैक्रियक मिश्र कहेगे तथा शरीर पर्याप्ति पूर्ण होने तक रहता है, उसके बाद वैक्रियक काययोग शुरु हो जाता है।

*प्रश्न ७६) वैकियिकमिश्र काययोग में कम-से- कम कितनी कषायें होती हैं?*
उत्तर - वैक्रियिकमिश्र काययोग में कम- से-कम २० कषायें होती हैं- अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्याख्यानावरण, संज्वलन तीनों के क्रोध मान, माया, लोभ। आठ नोकषाय - (हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, पुरुषवेद, नपुंसक वेद)।
उपर्युक्त कषायें चतुर्थ गुणस्थानवर्ती सम्यग्दृष्टि की अपेक्षा कही गयी हैं, इसलिए स्त्रीवेद कम करा है। यहाँ नपुसक वेद सम्यग्दर्शन को लेकर प्रथम नरक में जाने वाले की अपेक्षा कहा गया है अन्यथा सम्यग्दृष्टि मरकर नपुंसक वेद वाला नहीं बनता है ।

*प्रश्न ७७) किन- किन जीवों के वैक्रियिकमिश्र काययोग में अवधिज्ञान होता है?*
उत्तर - जो जीव मनुष्य पर्याय में गुणप्रत्यय अवधिज्ञान प्राप्त करते हैं, वे अनुगामी अवधिज्ञान को लेकर जब नरकगति (बद्धायुष्क क्षायिक सम्यग्दृष्टि वा कृतकृत्य वेदक की अपेक्षा) में जाते हैं तथा मनुष्य-तिर्यंच अनुगामी अवधिज्ञान को लेकर देवगति में जाते हैं तब उनके वैक्रियिकमिश्र काय योग मे स्थित सम्यग्द्रष्टि जीवो के अवधिज्ञान हो सकता है। 

*प्रश्न ७८) वैकियिकमिश्र काययोगी अभव्य जीवों के कितनी लेश्याएँ होती हैं?*
उत्तर - वैक्रियिक मिश्र काययोगी अभव्य जीवों के छहों लेश्याएँ होती हैं – 
तीन अशुभ लेश्याएँ नारकियों  तथा भवनत्रिक की अपेक्षा तथा तीन शुभ लेश्याएँ देवों की अपेक्षा होती हैं। अभव्य जीव के शुक्ल लेश्या भी बन जाती है क्योंकि अभव्य जीव का उत्पाद नवें ग्रैवेयक तक माना गया है। 

*प्रश्न ७९) वैक्रियिक मिश्र काययोगी क्षायिक सम्यग्दृष्टि के कितने वेद होते हैं?*
उत्तर - वैक्रियिक मिश्र काययोगी क्षायिक सम्यग्दृष्टि के दो वेद होते हैं – पुरुषवेद और नपुंसक वेद
*पुरुषवेद* वैमानिक देवों की अपेक्षा । 
*नपुंसक वेद* प्रथम नरक की अपेक्षा ।

*प्रश्न ८०) ऐसा कौन सा सम्यक्त्व है जो वैक्रियिक मिश्र काययोग में तो होता है लेकिन औदारिक मिश्र काययोग में नहीं होता है?*
उत्तर - द्वितीयोपशम सम्यक्त्व श्रेणी में अथवा द्वितीयोपशम सम्यक के साथ मरण की अपेक्षा वैक्रियिकमिश्र काययोग में हो सकता है, लेकिन औदारिक मिश्र काययोग में नहीं हो सकता है, क्योंकि कोई भी देव-नारकी द्वितीयोपशम सम्यक्त्व प्राप्त नहीं कर सकता। इसका भी कारण यह है कि द्वितीयोपशम सम्यक्त्व उपशम श्रेणी के सम्मुख मुनिराज के ही होता है। श्रेणी से उतरते समय अन्य गुणस्थानों में भी हो सकता है ।

*प्रश्न ८१) वैक्रियिकमिश्र काययोग में कितने सम्यक्त्व नहीं होते हैं?*
उत्तर - वैक्रियिकमिश्र काययोग में दो सम्यक नहीं होता है- मिश्र और प्रथमोपशम सम्यक्त्व क्योंकि इसमें मरण नहीं होता है। 
सासादन सम्यक्त्व एवं द्वितीयोपशम सम्यक्त्व देवो की अपेक्षा वैक्रियिकमिश्र काययोग मे बनते है, नारकी की अपेक्षा से नहीं।

*प्रश्न ८२) किन जीवों के वैक्रियिकमिश्र काययोग में क्षयोपशम सम्यक्त्व पाया जाता है?*
उत्तर - वैमानिक देवों में उत्पन्न होने वाले सम्यग्दृष्टि जीव अथवा कृतकृत्य वेदक जीवों के वैक्रियिकमिश्र काययोग में क्षायोपशमिक सम्यक्त्व पाया जाता है।
बद्धायुष्क (जिसने नरकायु को बाँध लिया है) ऐसा  कृतकृत्य वेदक सम्यग्दृष्टि जब प्रथम नरक में जाता है उसके भी वेदक (क्षायोपशमिक) सम्यक्त्व पाया जाता है। 

*प्रश्न ८३) वैक्रियिक मिश्र काययोग में दो धर्मध्यान किस अपेक्षा कहे हैं?*
उत्तर - वैक्रियिक मिश्र काययोग में दो धर्मध्यान – आज्ञाविचय और अपायविचय देवों की अपेक्षा कहे गये हैं, क्योंकि नारकियों के तो एक आज्ञाविचय धर्मध्यान ही होता है। 

*प्रश्न ८४) वैक्रियिक मिश्र काययोग में कम-से-कम कितने आस्रव के प्रत्यय हो सकते हैं?* 
उत्तर - वैक्रियिकमिश्र काययोग में (सम्यग्दृष्टि की अपेक्षा) कम-से-कम ३३ आस्रव के प्रत्यय हो सकते हैं- अविरति १२, कषाय २०, योग ०१ (वैक्रियिक मिश्र)।
*(मिथ्यात्व ०५, अनन्तानुबन्धी ०४, स्त्रीवेद तथा १४ योग नहीं होते हैं।)*

*प्रश्न ८५) वैक्रियिकमिश्र काययोगी के दूसरे गुणस्थान में कितनी जातियाँ होती हैं?*
उत्तर - दूसरे गुणस्थान वाले वैक्रियिकमिश्र काययोगी के चार लाख जातियाँ होती हैं, क्योंकि सासादन गुणस्थान को लेकर जीव नरक में नहीं जाता है और वैक्रियिक मिश्रकाययोग में सासादन गुणस्थान उत्पन्न नहीं होता है; इसलिए वहाँ नरकगति सम्बन्धी जातियाँ नहीं पाई जाती हैं। 
इसी प्रकार कुल भी २६ लाख करोड़ ही जानना चाहिए।
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*शलभ*

गुरुवार, 13 नवंबर 2025

23) वैक्रियिक काययोग में 24 स्थान

23) २४ ठाणा-वैक्रियिक काययोग
https://youtu.be/aCc12m8r9Vc?si=zmiVceaa5cLJQVAJ
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वैक्रियक शरीर के निमित्त से अर्थात वैक्रियक वर्गणा के निमित्त से आत्मा के प्रदेशो मे जो कम्पन होता है उसे वैक्रियक काययोग कहते है। यह योग दो गति के जीवो देव और नारकी में होता हैं।
*जैसे* यहा से कोई मनुष्य या तिर्यंच मरणा कर 
देवगति मे जाते है तो पहले विग्रहगति मे कार्मण काययोग रहेगा उसके बाद शरीर पर्याप्ति पूर्ण होने तक वैक्रियक मिश्र काययोग रहेगा, तथा शरीर पर्याप्ति पूर्ण होने के बाद से वैक्रियक काययोग शुरु हो जाता है जो जीवन के अंतिम समय तक रहेगा।

*२४ स्थान वैक्रियक काययोग*
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*०१) गति      ०२/०४*   नरक, देव
*०२) इन्द्रिय    ०१/०५*   पंचेन्द्रिय
*०३) काय      ०१/०६*   त्रसकाय
*०४) योग   स्वकीय/१५* वैक्रियक काययोग
*०५) वेद         ०३/०३*  तीनो वेद
         स्त्रीवेद, पुरुषवेद, नपुंसकवेद
*०६) कषाय     २५/२५* कषाय १६ नोकषाय ०९
*०७) ज्ञान        ०६/०८* 
      मनःपर्यय और केवलज्ञान नही होता
*०८) संयम      ०१/०७*  असंयम
*०९) दर्शन      ०३/०४*  तीन दर्शन
      चक्षुदर्शन,अचक्षुदर्शन,अवधिदर्शन
*१०) लेश्या      ०६/०६*  छहो लेश्या
      नारकियो मे ०३ अशुभ, देवो मे ०३ शुभ लेश्या
*११) भव्यक्त्व   ०२/०२*  भव्य और अभव्य
*१२) सम्यक्त्व   ०६/०६*  छह सम्यक्त्व
मिथ्यात्व, सासादन, मिश्र, उपशम, क्षायिक, क्षायोप
*१३) संज्ञी         ०१/०२*  सैनी
*१४) आहारक   ०१/०२*  आहारक
*१५) गुणस्थान   ०४/१४*  ०१, ०२, ०३, ०४
*१६) जीवसमास  ०१/१९*  सैनी पंचेन्द्रिय
*१७) पर्याप्ति       ०६/०६*  छहो पर्याप्ति
*१८) प्राण           १०/१०*  दसो प्राण
*१९) संज्ञा           ०४/०४*  चारो  संज्ञा
आहार संज्ञा, भय संज्ञा, मैथुन संज्ञा, परिग्रह संज्ञा।
*२०) उपयोग      ०९/१२*  
     केवलदर्शनोपयोग और केवलज्ञानोपयोग नही है
*२१) ध्यान         १०/१६*  
      आर्त ०४, रौद्र ०४, धर्म ०२
*२२) आस्रव       ४३/५७*  
मिथ्यात्व ०५,अविरति १२,कषाय २५, योग स्वकीय
*२३) जाति   ०८ लाख/८४ लाख*  
नारकी ०४ लाख, देवो ०४ लाख 
*२४) कुल-५१ लाख करोड/१९९.५ लाख़ करोड*
नारकी मे २५ लाख करोड, देवो मे २६ लाख करोड
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*प्रश्न ६७) वक्रियक काययोग किसे कहते हैं?*
उत्तर- नाना प्रकार के गुण और ऋद्धियों से युक्त देव नारकियों के शरीर को वैक्रियिक या विगुर्व कहते हैं और इसके द्वारा होने वाले योग को वैगूर्णिक अथवा वैक्रियिक काययोग कहते हैं। *(गो. जी. २२२)*

*प्रश्न ६८) वैक्रियक शरीर एवं वैक्रियक काययोग में क्या विशेषता है?*
उत्तर-वैक्रियक शरीर एव वैक्रियक काययोग में विशेषता –
*०१)* तेजकायिक तथा वायुकायिक और पंचेन्द्रिय तिर्यंच तथा मनुष्यों के भी वैक्रियिक शरीर होता है लेकिन वैक्रियिक काययोग नहीं होता है। देव- नारकियों के वैक्रियिक शरीर भी होता है और वैक्रियिक काययोग भी होता है।
*०२)* मनुष्य-तिर्यंच के वैक्रियिक शरीर में नाना गुणों और ऋद्धियों का अभाव है लेकिन देवों के वैक्रियिक शरीर में नाना गुण और अणिमादि ऋद्धियाँ होती हैं ।
*०३)* अष्टाह्निका में नन्दीश्वर द्वीप में पूजा के लिए, पंचकल्याणक आदि के समय देवों का मूल वैक्रियिक शरीर नहीं जाता है फिर भी यदि उस समय काययोग होता है तो वैक्रियिक काययोग ही होता है।
*०४)* नारकियों के वैक्रियिक शरीर की अपृथक् विक्रिया होती है, देवों के वैक्रियिक शरीर की पृथक तथा अपृथक दोनों विक्रिया होती हैं लेकिन दोनों के वैक्रियिक काययोग ही होता है।
*विशेष* चक्रवर्ती द्वारा अनेक शरीर बना लेने से वैक्रियक शरीर नही है, उसके औदारिक शरीर ही वह विशेष गुण है, शरीर के पन्द्रह भेदो मे से एक औदारिक शरीर मे इस प्रकार की शक्ति है।

*प्रश्न ६९) वैक्रियिक काययोग वालों के .उपशम सम्यक्त्व कितनी बार हो सकता है?*
उत्तर-वैक्रियिक काययोग वालों के अपने जीवन में अनेक बार उपशम सम्यक्त्व हो सकता है क्योंकि एक बार प्रथमोपशम सम्यक्त्व प्राप्त करने के बाद पल्योपम के असंख्यातवें भाग प्रमाण काल व्यतीत होने पर जीव पुन: प्रथमोपशम सम्यक्त्व प्राप्त करने के योग्य हो जाता है। वैक्रियिक काययोग वालों की उत्कृष्ट आयु तैंतीस सागरोपम प्रमाण होती है इसलिए उनके अनेक बार उपशम सम्यक्त्व होने में कोई बाधा नहीं है। *(धवला ०५ के आधार से)*

*प्रश्न ७०) वैक्रियक काययोग वालों के पंचमादि गुणस्थान क्यों नहीं होते है?*
उत्तर-वैक्रियक काययोग वालों के पंचमादि गुणस्थान नहीं होने के कारण-
*०१) वैक्रियक काय वालों के अप्रत्याख्यानावरण तथा प्रत्याख्यानावरण कषाय का तीव्र उदय पाया जाता है इसलिए उनके संयमासंयम तथा संयम नहीं हो सकता है अर्थात् पंचमादि गुणस्थान नहीं हो सकते ।
*०२)* भोगभूमि में पंचमादि गुणस्थान न होने का कारण भोग की प्रधानता कही गई है फिर देवों में तो भोगभूमि से भी ज्यादा भोग पाये जाते हैं फिर वहाँ सयम कैसे हो सकता है और नारकियों में कषायों की सहज रुप से तीव्रता रहती है, उनके संयम कैसे हो सकता हे?
*०३)* जिनके नियत भोजन है अर्थात् इतने समय के बाद नियम से उनको भोजन करना ही होगा। ऐसी स्थिति में त्याग रूप प्रवृत्ति कैसे हो सकती है? संभवत: वैक्रियिक काययोग वालों के सयम नहीं होने का एक कारण यह भी माना जा सकता है।

*प्रश्न ७१) वैक्रियिक काययोग वाले देव महीनों/ वर्षों/पक्षों तक भोजन नहीं करते हैं, इसी प्रकार नारकी भी बहुत काल के बाद थोड़ी सी मिट्टी खाते हैं उनके नित्य आहार संज्ञा कैसे कही जा सकती है*
उत्तर-वैक्रियिक काययोग वाले भले ही पक्षों/महीनो तक भोजन नहीं करें फिर भी उनके आहार सज्ञा का अभाव नहीं हो सकता, क्योंकि आहार सज्ञा जिनागम में छठे गुणस्थान तक बताई गई है और उसका अंतरंग कारण असातावेदनीय कर्म का उदय/उदीरणा कहा गया है। ये दोनों ही कारण वैक्रियिक काययोग वालों के पाये जाते हैं इसलिए उनके भी नित्य आहार सज्ञा कहने में कोई विरोध नहीं है।   *(गो. जी. १३५ के आधार से)*

*प्रश्न ७२) वैकियिक काययोग में छहों लेश्याएँ किस अपेक्षा पायी जाती हैं?*
उत्तर-वैक्रियिक काययोग में तीन अशुभ लेश्याएँ नारकियों की अपेक्षा होती हैं तथा तीन शुभ लेश्याएँ देवों की अपेक्षा होती हैं ।

*प्रश्न ७३) वैकियिक काययोगी के तीसरे गुणस्थान में कितने उपयोग होते हैं?*
उत्तर-तीसरे गुणस्थान वाले वैक्रियिक काययोगी के ०६ उपयोग होते हैं-
०३ ज्ञानोपयोग–मिश्रमतिज्ञानो, मिश्रश्रुतज्ञानो तथा मिश्र अवधिज्ञानोपयोग
०३ दर्शनोपयोग–चक्षुदर्शनोपयो अचक्षुदर्शनोपयोग, अवधि दर्शनोपयोग

*प्रश्न ७४) वैकियिक काययोगी सम्यग्दृष्टि के कितने आसव के प्रत्यय होते हैं?*
उत्तर-वैक्रियिक काययोगी सम्यग्दृष्टि के आसव के ३४ प्रत्यय होते हैं- 
१२ अविरति, २१ कषाय, ०१ योग (वैक्रियिक काययोग) =३४ प्रत्यय 
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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*

37. कषाय मार्गणा - संज्वलन क्रोध मान माया में चौबीस ठाणा

37. कषाय मार्गणा - संज्वलन क्रोध मान माया में चौबीस ठाणा* https://youtu.be/ZHJN-2cfr-A?si=Npk8VDvtFyYEHuaM 🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴 संयम के साथ ...