*31. नपुंसकवेद मार्गण*
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*नपुंसक* जो ना ही स्त्री है और ना पुरुष है वो नुपंसक है। जिसके बाहर मे ना तो स्त्री के चिन्ह जैसे स्तन, योनि आदि पाये जाते है ना ही पुरुष के चिन्ह जैसे दाढी मूछ आदि चिन्ह, दोनो से रहित होता है, तीव्र काम पीडा से भरा हुआ होता हैं वह नुपंसक है।
*नपुंसकवेद* नुपंसकवेद नोकषाय के उदय से होनी वाली अवस्था विशेष के नपुंसक वेद कहते है।
*अवस्था विशेष* स्त्री-पुरुष की तरफ आकर्षण होना, रमण करने की इच्छा होना नपुंसक वेद है।
*✍️२४ स्थान नपुंसकवेद में*
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*०१) गति ०३/०४* मनुष्य, तिर्यंच, नारकगति
*०२) इन्द्रिय ०५/०५* ए. द्वी. त्री. चतु. पंचे.
*०३) काय ०६/०६* छहो काय
*०४) योग १३/१५* आहारकद्विक नही होता
*०५) वेद ०१/०३* स्वकीय (नपुंसकवेद)
*०६) कषाय २३/२५*
(स्त्रीवेद और पुरुष वेद नोकषाय को छोडकर)
*०७) ज्ञान ०६/०८*
कुमति, कुश्रुत, कुअवधि, मति, श्रुत, अवधिज्ञान
*०८) संयम ०४/०७*
असंयम, संयमासंयम, सामायिक, क्षेदोपस्थापना
*०९) दर्शन ०३/०४* चक्षु,अचक्षु,अवधिदर्शन
*१०) लेश्या ०६/०६* सभी लेश्या
कृष्ण, नील, कापोत, पीत, पदम और शुक्ल लेश्या।
*११) भव्यक्त्व ०२/०२* भव्य और अभव्य।
*१२) सम्यक्त्व ०६/०६* सभी
मिथ्यात्व,सासादन,मिश्र,उपशम,क्षयोपशम, क्षायिक
(क्षायिक का कारण है यहा भावनपुंसक को लिया)
*१३) संज्ञी ०२/०२* संज्ञी और असंज्ञी।
*१४) आहार ०२/०२* आहारक ,अनाहारक
*१५) गुणस्थान ०९/१४* ०१ से ०९ तक
*१६) जीवसमास १९/१९*
*१७) पर्याप्ति ०६/०६*
आहार, शरीर, इन्द्रिय,श्वासोच्छ, भाषा,मन:पर्याप्ति
*१८) प्राण १०/१०* सभी प्राण
*इन्द्रिय ०५* स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और कर्ण
*बल ०३* कायबल, वचन बल और मनोबल प्राण
आयु प्राण और श्वासोच्छवास प्राण
*१९) संज्ञा ०४/०४* सभी संज्ञा
आहार संज्ञा, भय संज्ञा, मैथुन संज्ञा, परिग्रह संज्ञा।
*२०) उपयोग ०९/१२*
मनःपर्यय, केवलदर्शन, केवलज्ञानोपयोग नही होता
*२१) ध्यान १३/१६*
*आर्त* इष्टवियोगज,अनिष्टसंयोगज,वेदना,निदान
*रौद* हिंसानन्दी,मृषानन्दी,चौर्यानन्दी,परिग्रहानन्दी
*धर्म* आज्ञाविचय,अपायविचय, विपाकविचय, संस्थानविचय *शुक्लध्यान* पृथक्त्ववितर्क वीचार
*२२) आस्रव ५३/५७*
*मिथ्यात्व०५* विपरीत,एकान्त,विनय,संशय,अज्ञान
*अविरति १२* ०५ इन्द्रिय और मन को वश में करने तथा षट्काय के जीवों की रक्षा नहीं करना
*कषाय २३* १६ अनन्तानुबन्धी आदि ०७नोकषाय
*योग १३* मनोयोग०४, वचनयोग०४, काययोग ०५
*२३) जाति ८० लाख/८४ लाख*
*(देवो की ०४ लाख जाति नही होती है)*
*२४) कुल–१७३-१/२ ला.क. /१९९.५ ला. क.*
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*प्रश्न २३) नपुंसक वेद किसके सामान है ?*
उत्तर- नपुंसकवेद की प्रकृति ईट के भटटे की अग्नि के समान बहुत तेज व कालुषितचित्त वाली होती है। इनकी कमाग्नि बहुत समय तक बनी रहती है। जो कि एक बार गर्म होने के बाद इनका ताप बुझता नही है। *(गो.जी. २७५)*
ईटों के आवे के समान जब किसी प्राणी में काम उपभोग सम्बन्धी भयंकर विकलता होती तथा अत्यन्त निन्दनीय कुरूपपना होता है वही नपुंसक वेद का परिपाक है । *(वारंग चारित्र ०४/९१)*
*प्रश्न २४) किन-किन जीवों के नपुंसक वेद ही होता है?*
उत्तर - वे जीव जिनके नपुंसक वेद ही होता है,वे हैं *०१)* सातों पृथिवियों के नारकी जीव
*०२)* एकेन्द्रिय तथा विकलत्रय जीव
*०३)* सम्मूर्च्छन संज्ञी पंचेन्द्रिय जीव
*०४)* सम्पूर्च्छन असंज्ञी पंचेन्द्रिय जीव
*प्रश्न २५)कहाँ-कहाँ पर नपुंसक वेद नहीं होता है?*
उत्तर - वे स्थान जहाँ नपुंसक वेद नहीं होता-
*०१)* देवगति में सभी देव-देवांगनाओं में
*०२)* भोगभूमि तथा कुभोग भूमि में
*०३)* परिहारविशुद्धि संयमी के
*०४)* आहारक तथा आहारकमिश्र काययोग में
*०५)* मन:पर्यय ज्ञानी जीवों के
*०६)* किसी भी ऋद्धिधारी मुनिराज के
*०७)* उसी भव में तीर्थंकर होने वाले जीवों के
*०८)* सभी म्लेच्छों के नपुंसक वेद नहीं होता है।
*०९)* ६३ शलाका पुरुषों के नपुंसक वेद नहीं होता
भवनवासी, व्यतर, ज्योतिषी, कल्पवासी देव, तीस भोगभूमियों में उत्पन्न तिर्यंच, मनुष्य, भोगभूमि के प्रतिभाग में उत्पन्न असख्यात वर्ष की आयु वाले (कुभोग भूमिया) तथा सर्व मलेच्छ खण्डों में उत्पन्न होने वाले मनुष्य-तिर्यंच नपुंसकवेद वाले नहीं होते है। *(आ. समु. ३४)*
प्रश्न २६) विग्रहगति में शरीर नहीं होता अत: वहाँ स्त्री, पुरुष तथा नपुंसक वेद कैसे हो सकता है?*
उत्तर - यद्यपि अनाहारक अवस्था में शरीर नहीं होता है फिर भी वहाँ उनके भाववेद का अभाव नहीं होता है क्योंकि भाववेद वेदकषाय के उदय से होता है। विग्रहगति में भी वेद का उदय रहता है इसलिए वहाँ भी तीनों वेदों का सद्भाव कहा गया है।
*प्रश्न २७) नपुंसक वेद वाले के कम-से-कम कितने प्राण होते हैं?*
उत्तर - नपुंसकवेद वाले के कम-से-कम ०३ प्राण होते हैं - स्पर्शन इन्द्रिय, कायबल और आयु प्राण
ये एकेन्द्रिय जीवों की निर्वृत्यपर्याप्त अवस्था में या लब्ध्यपर्यातक अवस्था मे होते है।
*प्रश्न २८) नपुंसक वेद में कितने शुक्लध्यान हो सकते हैं?*
उत्तर - नपुंसक वेद में पहला पृथक्त्ववितर्क वीचार शुक्लध्यान हो सकता है। यह ध्यान ०८, ०९ वे गुणस्थान की अपेक्षा कहा गया है।
जो आचार्य दसवें गुणस्थान तक धर्मध्यान मानते हैं उनकी अपेक्षा नपुंसकवेद में एक भी शुक्लध्यान नहीं हो सकता है। इसी प्रकार स्त्रीवेद और पुरुषवेद में भी जानना चाहिए।
*प्रश्न २९) तीनों वेदों में मनुष्य-तिर्यंच आदि की पूरी पूरी जातियाँ ग्रहण की गई हैं तो क्या सभी तिर्यंच, मनुष्य, स्त्रीवेद, पुरुषवेद या नपुंसक वेद वाले होते हैं अथवा हो सकते हैं?*
उत्तर - नहीं, सभी मनुष्य-तिर्यंच स्त्री, पुरुष, नपुसक वेद वाले नहीं होते तथा न हो ही सकते हैं लेकिन प्रत्येक जाति में तीनों वेद वाले जीव उत्पन्न होते हैं, हो सकते हैं।
जैसे-पर्याप्त मनुष्य उनतीस (२९) अंक प्रमाण होते हैं और मनुष्यों की जातियाँ मात्र १४ लाख बताई गई हैं। एक-एक जाति में करोड़ों-करोड़ों मनुष्य उत्पन्न हो सकते हैं, उन करोड़ों मनुष्यों में कोई स्त्रीवेद वाला, कोई पुरुष वेद वाला तो कोई नपुंसक वेद वाला हो सकता है। सम्भवत: इसीलिए तीनों वेदों में पूरी-पूरी जातियों का ग्रहण किया गया है।
*नोट* इसी प्रकार कुलों में भी जानना चाहिए ।
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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*