30. चौबीस ठाण मे पुरुषवेद मार्गणा*
*✍️ पुरुषवेद मे २४ स्थान*
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*०१) गति ०३/०४* देव, मनुष्य, तिर्यंचगति,
*०२) इन्द्रिय ०१/०५* पंचेन्द्रिय
*०३) काय ०१/०६* त्रसकाय
*०४) योग १५/१५* सभी
*०५) वेद ०१/०३* स्वकीय (पुरुषवेद)
*०६) कषाय २३/२५*
(स्त्रीवेद और नपुंसक वेद नोकषाय को छोडकर)
*०७) ज्ञान ०७/०८*
केवलज्ञान अपगतवेदी के होता है
*०८) संयम ०५/०७*
सुक्ष्मसंपराय, यथाख्यात संयम अपगत वेदी के है
*०९) दर्शन ०३/०४* चक्षु,अचक्षु,अवधिदर्शन
*१०) लेश्या ०६/०६* सभी लेश्या
कृष्ण, नील, कापोत, पीत, पदम और शुक्ल लेश्या।
*११) भव्यक्त्व ०२/०२* भव्य और अभव्य।
*१२) सम्यक्त्व ०६/०६* सभी
मिथ्यात्व,सासादन,मिश्र,उपशम,क्षयोपशम, क्षायिक
*१३) संज्ञी ०२/०२* संज्ञी और असंज्ञी।
*१४) आहार ०२/०२* आहारक ,अनाहारक
*१५) गुणस्थान ०९/१४* ०१ से ०९ तक
*१६) जीवसमास ०२/१९* असंज्ञी-संज्ञी पंचेन्द्रिय
*१७) पर्याप्ति ०६/०६*
आहार, शरीर, इन्द्रिय,श्वासोच्छ, भाषा,मन:पर्याप्ति
*१८) प्राण १०/१०* सभी प्राण
*इन्द्रिय ०५* स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और कर्ण
*बल ०३* कायबल, वचन बल और मनोबल प्राण
आयु प्राण और श्वासोच्छवास प्राण
*१९) संज्ञा ०४/०४* सभी संज्ञा
आहार संज्ञा, भय संज्ञा, मैथुन संज्ञा, परिग्रह संज्ञा।
*२०) उपयोग १०/१२*
केवलदर्शन और केवलज्ञानोपयोग नही होता
*२१) ध्यान १३/१६*
*आर्त* इष्टवियोगज,अनिष्टसंयोगज,वेदना,निदान
*रौद* हिंसानन्दी,मृषानन्दी,चौर्यानन्दी,परिग्रहानन्दी
*धर्म* आज्ञाविचय,अपायविचय, विपाकविचय, संस्थानविचय *शुक्ल* पृथक्त्ववितर्क वीचार
*२२) आस्रव ५५/५७*
*मिथ्यात्व०५* विपरीत,एकान्त,विनय,संशय,अज्ञान
*अविरति १२* ०५ इन्द्रिय और मन को वश में नही करने तथा षट्काय के जीवों की रक्षा नहीं करना
*कषाय २३* १६ अनन्तानुबन्धी आदि ०७ नोकषाय
*योग १५* मनोयोग०४, वचनयोग०४, काययोग ०७
*२३) जाति २२ लाख/८४ लाख*
तिर्यंच ०४ लाख, मनुष्य १४ लाख, देव ०४ लाख
*२४) कुल–८३-१/२ ला.क. /१९९.५ ला क*
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*प्रश्न १६) पुरुषवेद में जीव की स्थिति कैसी होती है?*
उत्तर - पुरुषवेद युक्त प्राणी स्त्री को देखते ही वैसे ही पिघल जाता है जैसे-जमे हुए घी का घड़ा अग्नि के स्पर्श होते ही क्षणभर में पानी-पानी हो जाता है । *(वारांग चारित्र ०४/९०)* अग्नि=स्त्री, घी=पुरुष
पुरुषवेद तृण की अग्रि के समान कहा गया है ।
*प्रश्न १७) क्या ऐसे कोई पंचेन्द्रिय जीव हैं जिनके पुरुषवेद नहीं होता है?*
उत्तर - हाँ है, ऐसे भी पंचेन्द्रिय जीव हैं जिनके पुरुषवेद नहीं होता है।
सभी नारकी, नौवें गुणस्थान के अवेद भाग से आगे विराजमान सभी जीव, सम्मूर्च्छन जन्म वाले पंचेन्द्रिय जीव, स्त्री तथा नपुंसक वेद वाले जीवों के भी पुरुष वेद नहीं होता है।
*प्रश्न १८) ऐसे कौन से असैनी पंचेन्द्रिय जीव हैं जिनके पुरुषवेद भी होता है?*
उत्तर - जो जीव गर्भ से उत्पन्न होने पर भी मन से रहित हैं उन तोता मैना आदि तिर्यंचगति के पंचेन्द्रिय जीवों के पुरुषवेद भी यानि तीनों वेद हो होते हैं।
*प्रश्न १९) पुरुषवेदी के कौन-कौनसे संयम नहीं हो सकते है?*
उत्तर - पुरुषवेदी के दो संयम नहीं हो सकते हैं- सूक्ष्म साम्पराय और यथाख्यात संयम।
क्योंकि ये दोनों संयम अवेदी जीवों के होते हैं।
*प्रश्न २०) पुरुषवेद तो भगवान के भी दिखता है तो उनके चारों शुक्ल ध्यान क्यों नहीं कहे?*
उत्तर- यद्यपि द्रव्य पुरुषवेद भगवान के भी दिखता है लेकिन उनके भाववेद नहीं होता है क्योंकि भाववेद का कारण मोहनीय कर्म (वेद कषाय) का उदय कहा है। भगवान के वेद कषाय का उदय नहीं पाया जाता है। यहाँ सभी कथन भाववेद की अपेक्षा किया गया है इसलिए पुरुषवेद वालों के चारों शुक्ल ध्यान नहीं होते हैं। नवमें गुणस्थान तक वेद है वहाँ एक ही शक्ल ध्यान होता है।
*प्रश्न २१) पुरुषवेद वालों के कम- से-कम कितने प्राण होते हैं?*
उत्तर - पुरुषवेद वालों के कम-से-कम सात प्राण होते हैं। ये सभी सैनी या असैनी पंचेन्द्रिय जीवों की निर्वृत्यपर्याप्तक अवस्था में ०५ इन्द्रिय, ०१ कायबल तथा आयु प्राण।
आहारकमिश्र अवस्था में भी ये सात प्राण होते हैं।
*प्रश्न २२) पुरुषवेदी के कम-से- कम कितने आस्रव के प्रत्यय होते हैं?*
उत्तर - पुरुषवेदी के कम-से-कम आस्रव के चौदह प्रत्यय होते हैं –
*कषाय ०४)* – संज्वलन क्रोध, मान, माया, लोभ
*योग ०९)* – मनोयोग ०४, वचनयोग०४, औदारिक काययोग *वेद ०१)* – पुरुषवेद
ये आस्रव के प्रत्यय नौवे गुणस्थान में सवेद भाग तक होते हैं।
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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*