यह अयोग केवली गुणस्थान संसारी जीवो का सबसे अंतिम गुणस्थान है, इस गुणस्थान वाले जीवो को अयोग केवली जिन भी कहते है, इसके बाद मोक्ष प्राप्त होता है।*
*अयोग=योग रहित, केवली = केवल दर्शन ज्ञान सहित, जिन=घातिया कर्मो से रहित*
*०१)* जिनके योग विद्यमान नही है उन्हे अयोग कहते है, जिनके केवलज्ञान पाया जाता है उन्हे केवली कहते है।
*०२)* जिनके पुण्य और पाप को उत्पन्न करने वाले शुभ और अशुभ योग भी नही होते है अयोगी जिन कहलाते है।
*०३)* जो अट्टारह हजार (१८०००) शीलो के स्वामी है, सर्व आस्रव से रहित है, योग रहित है, केवलज्ञान सहित है वे अयोगी भगवान है।
*२४ स्थान मे अयोगी केवली*
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अयोगी केवली के २४ स्थानों में से १७ स्थान होते हैं
*०१) गति ०१/०४* मनुष्यगति
*०२) इन्द्रिय ०१/०५* पंचेन्द्रिय (द्रव्येन्द्रिय)
*०३) काय ०१/०६* त्रसकाय
*०४) योग ००/१५* ✖️
*०५) वेद ००/०३* ✖️
कोई वेद नही होता केवल पुरुष लिंग है। वेद नौवे गुणस्थान मे वेद समाप्त हो जाता है।
*०६) कषाय ००/२५* ✖️
*०७) ज्ञान ०१/०८* केवलज्ञान
*०८) संयम ०१/०७* यथाख्यात संयम
*०९) दर्शन ०१/०४* केवलदर्शन
*१०) लेश्या ००/०६* ✖️
*११) भव्यक्त्व ०१/०२* भव्य
*१२) सम्यक्त्व ०१/०६* क्षायिक सम्यक्त्व
*१३) संज्ञी ००/०२* ✖️ (अनुसंज्ञी कहलाते)
*१४) आहारक ०१/०२* अनहारक (शरीर के योग्य कार्मण वर्गणा को भी ग्रहण नही करते)
*१५) गुणस्थान ०१/१४* अयोग केवली
*१६) जीवसमास ०१/१९* पंचेन्द्रिय
संज्ञी असंज्ञी से रहित सामान्य पंचेन्द्रिय होगे
*१७) पर्याप्ति ०६/०६* छहो पर्याप्ति
नया कुछ भी ग्रहण नही कर रहे है, लेकिन पुराना सभी वर्गणा है।
*१८) प्राण ०१/१०* आयु प्राण
*१९) संज्ञा ००/०४* ✖️
*२०) उपयोग ०२/१२* केवलदर्शन, केवलज्ञान
*२१) ध्यान ०१/१६* व्युपरतक्रियानिवृति
*२२) आस्रव ००/५७* ✖️
*२३) जाति १४ लाख/८४ लाख*
*२४) कुल १४ ला.क./१९९.५ लाख़ करोड*
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◆ अयोग केवली अवस्था मे २४ स्थानो मे से १७ स्थान ही होते है।
*विशेषताएँ*
*०१)* यहाँ पूर्ण संवर तथा उत्कृष्ट निर्जरा होती है।
*०२)* इस गुणस्थान में ८५ प्रकृतियो की सत्ता है, इतनी प्रकृतियो का क्षय तो १३ वे गुणस्थान तक मे भी नही होता जितना की १४ वे मे क्षय होता है। जिसमे से उपान्त्य (अंतिम समय से पहले) मे ७२ कर्म प्रकृतियो का क्षय होता है तथा अंतिम समय मे बाकी १३ प्रकृतियो का क्षय होता है, तथा सभी कर्मो का क्षय होने से कर्ममल से रहित होकर शुद्धात्म अवस्था को प्राप्त हो जाते है।
*०३)* अयोगी जिन १८ हजार शीलों के भेदो के स्वामी बन जाते है, तथा ८४ लाख उत्तर गुणो के धारक हो जाते है।
*०४)* चौदहवे गुणस्थान के प्रथम समय से ही आत्मा के सम्पूर्ण प्रदेश अकम्प स्थिर होकर शरीर से किंचित न्यून होकर शरीर आकार वाले हो जाते है, अर्थात हलन चलन बंद हो जाता है, निष्कम्प हो गये
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*सत* इस गुणस्थान मे जीव पाये जाते है
*संख्या* इस गुणस्थान मे होने वाले जीवो की संख्या कम से कम एक या दो, तथा अधिक से अधिक १०८ जीव हो सकते है।
*क्षेत्र* लोक का असंख्यात भाग ढाई द्वीप के अन्दर ही रहते है।
*भाव* मूल मे तीन भाव *(क्षायिक, औदयिक, पारिणामिक भाव)* होते है।
विस्तार से ५३ भावो मे से १३ भाव–
क्षायिक के नौ भेद, औदयिक के दो भेद (मनुष्य गति व असिद्धत्व), पारिणामिक के दो भेद (जीवत्व, भव्यत्व)
*🌴काल* इस गुणस्थान का काल अंतरमुहूर्त यानि पाँच हस्व स्वर *(अ, ई, उ, ऋ, लृ)* के उच्चारण मे जितना काल लगता है वह है।
*🌴बंध प्रत्यय* यहा आस्रव और बंध के कारणो का अभाव होने से आस्रव व बंध का पूर्णता आभाव है, यहा कषाय भी नही, योग भी नही है केवल संवर और निर्जरा होती है फिर मोक्ष हो जाता है।
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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*