बुधवार, 12 अगस्त 2026

38. कषाय मार्गणा - संज्वलन लोभ मे चौबीस ठाणा

38. कषाय मार्गणा - संज्वलन लोभ मे चौबीस ठाणा*
https://youtu.be/cITo6y_CjyA?si=XJVNj5fcmFWzDdp5
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जो संयम के साथ-साथ प्रकाशमान रहे एवं जिनके उदय से यथाख्यात चारित्र न हो वे संज्वलन कषायें हैं। *(हरिवंश पुराण ५८/२४१)*
∆ संज्वलन क्रोधादिक सकल कषाय के अभाव रूप यथाख्यात चारित्र का घात करते हैं। 
∆ संयम के साथ अवस्थान होने पर एक होकर जो ज्वलित होते हैं अर्थात् चमकते हैं अथवा जिनके स‌द्भाव में संयम चमकता रहता है उसे संज्वलन कषाय कहते हैं। *(सर्वार्थसिद्धि ८/९)*

*✍️ संज्वलन लोभ में 24 स्थान :-*
01. गति –    04 में 01 भेद: मनुष्य।
02. इन्द्रिय – 05 में से 01 भेद: पंचेन्द्रिय जीव।
03. काय –   06 में से 01 भेद: त्रसकाय।
04. योग –   15 में से 11 योग:
मनोयोग 04, वचनयोग 04, काययोग 03, (औदारिक काययोग, आहारक द्विक काययोग)
05. वेद – 03 में से 03 वेद: भाववेद अपेक्षा तीनों वेदों में। (अपगत वेदी भी)
06. कषाय – 25 में से 10 कषाय: 01 स्वकीय कषाय तथा 09 नोकषाय।
07. ज्ञान – 08 में से 04 ज्ञान: मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्यय ज्ञान।
08. संयम – 07 में से 04 भेद: सामायिक, छेदोपस्थाना, परिहार विशुद्धि, सूक्ष्म सांपराय
09. दर्शन – 04 में 03 दर्शन: चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन, अवधिदर्शन।
10. लेश्या –   06 में 03 लेश्या: पीत, पद्म, शुक्ल। 
11. भव्यत्व – 02 में से 01 भेद: भव्य।
12. सम्यक्त्व – 06 में से 03 भेद: औपशमिक, क्षायिक, क्षायोपशमिक।
13. संज्ञी –       02 में से 01 भेद: संज्ञी।
14. आहारक – 02 में से 01 भेद: आहारक।
15. गुणस्थान – 14 में 05 भेद: छठे से दस तक।
16. जीवसमास – 19 में से 01 भेद: सैनी पंचेन्द्रिय।
17. पर्याप्ति – 06 में से 06 भेद: आहार, शरीर, इन्द्रिय, श्वासोच्छ्वास, भाषा, मन:पर्याप्ति।
18. प्राण – 10 में से 10 प्राण: सभी दसों प्राण।
19. संज्ञा – 4 में 4 भेद: आहार, भय, मैथुन, परिग्रह।
20. उपयोग – 12 में से 07 भेद:
4 ज्ञानोपयोग – मतिज्ञानोपयोग, श्रुतज्ञानोपयोग, अवधिज्ञानोपयोग, मनःपर्यय ज्ञानोपयोग
3 दर्शनोपयोग – चक्षुदर्शनोपयोग, अचक्षुदर्शनोपयोग, अवधिदर्शनोपयोग।
21. ध्यान – 16 में से 08 भेद: 
आर्त ध्यान (3) – इष्टवियोगज, अनिष्टसंयोगज, वेदना।
धर्मध्यान (4) – आज्ञाविचय, अपायविचय, विपाकविचय, संस्थान विचय धर्मध्यान।
शुक्लध्यान (1) 
22. आस्रव – 57 में से 21 भेद: कषाय 10, योग 11।
23. जाति – 84 लाख में से सभी 14 लाख जातियाँ। *(मनुष्यगति संबंधि जाति)*
24. कुल – 199.5 लाख करोड़ में से 14 लाख करोड़ कुल। *(मनुष्य संबंधी कुल)*

*✍️ संज्वलन लोभ की उपमा :-*
संज्वलन लोभ को हारिद्र सदृश कहा गया है अर्थात् हल्दी के रंग की उपमा दी है। (ज.ध. १२/१५५)
∆ हारिद्र सदृश लोभ – जिस प्रकार हल्दी से रंगे गये वस्त्र का वर्ण चिरकाल तक नहीं ठहरता, वायु और आतप आदि के निमित्त से ही उड़ जाता है; उसी प्रकार यह लोभ का भेद मन्दतम अनुभाग से परिणत होने के कारण चिरकाल तक आत्मा में नहीं ठहरता है, क्षणमात्र में ही दूर हो जाता है। *(जय धवला १२/१५७)*

◆ संज्वलन लोभ वालों के हास्यादि कषाय का अभाव भी हो सकता है ?
हाँ, संज्वलन लोभ वालों के आठवें गुणस्थान के बाद अर्थात् नौवें, दसवें गुणस्थान में अवेद भाग से पहले हास्यादि कषायों का अभाव हो जाता है। 

*✍️ संज्वलन लोभ में निर्वृत्यपर्याप्तक अवस्था :-*
संज्वलन लोभ वाला भी जब छठे गुणस्थान में आहारक मिश्र योग वाला होता है तो उसके भी निर्वृत्यपर्याप्तक अवस्था बन जाती है। (जब आहारक शरीर बनता है तो वह शरीर सभी पर्याप्तिया पूर्ण करता है)

*✍️ संज्वलन लोभ में संयम :-*
संज्वलन लोभ में चार संयम होते हैं – सामायिक, छेदोपस्थापना, परिहार विशुद्धि और सूक्ष्मसाम्पराय। क्योंकि संज्वलन लोभ का उदय छठे गुणस्थान से दसवें गुणस्थान तक होता है।

*✍️ संज्वलन लोभ वाले के कौन से गुणस्थान में कौन सा सम्यक्त्व :-*
∆ छठे - सातवें गुणस्थान में क्षायिक, क्षायोपशमिक तथा उपशम सम्यक्त्व।
∆ उपशमश्रेणी के 8, 9, 10 गुणस्थान मे क्षायिक तथा उपशम सम्यक्त्व।
∆ क्षपक श्रेणी के 8, 9, 10 गुणस्थान में क्षायिक सम्यक्त्व।

*✍️  संज्वलन लोभ वाले के कम-से-कम प्राण :-*
संज्वलन लोभ वाले के कम-से-कम 07 प्राण हो सकते हैं - 05 इन्द्रिय प्राण, काय बल तथा आयु। ये 07 प्राण आहारकमिश्र की अपेक्षा जानने चाहिए क्योंकि संज्वलन लोभ का उदय 06 गुणस्थान से 10 गुणस्थान तक पाया जाता है।

*✍️ संज्वलन लोभ का उदय में चारों संज्ञाएँ की अपेक्षा :-*
संज्वलन लोभ का उदय दसवे गुणस्थान में ही नहीं होता है अपितु छठे से दसवे गुणस्थान तक होता है। इसलिए चारो संज्ञाएँ होती है।
छठे गुणस्थान में चारो संज्ञाए, सातवे गुणस्थान में आहार संज्ञा के अलावा तीनो संज्ञा, आठवे गुणस्थान में भी तीनो संज्ञाएं, नौवे गुणस्थान में भय भी चला जाता है केवल मैथुन और परिग्रह संज्ञा होती है। नौवे के अवेद भाग में एकमात्र परिग्रह संज्ञा बची, दसवे गुणस्थान में केवल परिग्रह संज्ञा रहती है।
👉 संज्वलन लोभ कषाय वालों के परिग्रह संज्ञा का अभाव नहीं हो सकता है क्योंकि कषाय के रहते हुए इच्छा, वांछाओं का अभाव नहीं हो सकता है। बाकी तीन संज्ञाओ का अभाव दसवे गुणस्थान से पहले हो जाता है।

*✍️ धर्मध्यान से रहित संज्वलन लोभ वाले जीव :-*
जिनके छठे गुणस्थान वालों के आर्त्तध्यान होते हैं उनके धर्मध्यान नहीं होते तथा अष्टम गुणस्थान से दसवें गुणस्थान तक मुनिराज धर्मध्यान से रहित होते हैं अर्थात् प्रथम शुक्ल ध्यान वाले होते हैं। अथवा सप्तम गुणस्थान से दसवें गुणस्थानवर्ती मुनिराज धर्मध्यानी ही होते हैं।

*✍️ आर्त्तध्यान नहीं होने वाले संज्वलन लोभ वाले :-*
सातवें गुणस्थान से दसवें गुणस्थान तक के संज्वलन लोभ कषायवालों के आर्त्तध्यान नहीं होते हैं।

*✍️ संज्वलन लोभ में कम-से-कम कितने आस्रव के प्रत्यय :-*
संज्वलन लोभ वालों के कम-से-कम 10 आस्रव के प्रत्यय होते हैं - 09 योग तथा 01 कषाय
9 योग - 4 मनोयोग, 4 वचनयोग तथा औदारिक काययोग।
01 कषाय - संज्वलन लोभ कषाय
◆ संज्वलन लोभ में ज्यादा से ज्यादा 21 आस्रव के प्रत्यय होते है (10 कषाय और 11 योग)
10 कषाय - नौ नोकषाय तथा संज्वलन क्रौधादि से एक
11 योग - मनोयोग 4, वचनयोग 4, काययोग 3, (औदारिक काययोग, आहारक द्विक काययोग)
*चौबीस ठाणा कषाय मार्गणा से संज्वलन लोभ मे चौबीस स्थान का वर्णन पूर्ण हुआ।*
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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*

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