गुरुवार, 20 अगस्त 2026

39. कषाय मार्गणा - हास्यादि चार नोकषाय

*39. कषाय मार्गणा - हास्यादि चार नोकषाय*
https://youtu.be/h980k6RrJXE?si=0-2dgRJDN2s4kySr
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✍️ हास्य, रति, अरति, शोक में 24 स्थान :-
01. गति –    4 में 4 भेद: नरक, तिर्यंच, मनुष्य और देव
02. इन्द्रिय – 5 में से 51 भेद: पाँचो इन्द्रिय में
03. काय –   6 में से 6 भेद: पंच स्थावर और त्रसकाय।
04. योग –   15 में से 15 योग:
मनोयोग 4, वचनयोग 4, काययोग 5 काययोग
05. वेद – 3 में से 3 वेद: भाववेद अपेक्षा तीनों वेदों में। 
06. कषाय – 25 में से 23 कषाय: हास्य या शोक में से एक, रति और अरति मे से एक।
07. ज्ञान – 8 में से 7 ज्ञान: केवलज्ञान छोडकर बाकी सातो ज्ञान।
08. संयम – 7 में से 5 भेद: असंयम, संयमासंयम, सामायिक, छेदोपस्थाना, परिहार विशुद्धि
09. दर्शन – 4 में 3 दर्शन: चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन, अवधिदर्शन।
10. लेश्या –   6 में 6 लेश्या: कृष्ण, नील, कापोत, पीत, पद्म, शुक्ल। 
11. भव्यत्व – 2 में से 2 भेद: भव्य-अभव्य।
12. सम्यक्त्व – 6 में से 6 भेद: औपशमिक, क्षायिक, क्षायोपशमिक, मिथ्यात्व, सासादन, मिश्न।
13. संज्ञी –       2 में से 2 भेद: संज्ञी-असंज्ञी।
14. आहारक – 2 में से 2 भेद: आहारक-अनहारक।
15. गुणस्थान – 14 में 9 भेद: पहले से नौवे तक।
👉विशेष - सत्ता अपेक्षा नौवे तक, उदय अपेक्षा आठवे तक
16. जीवसमास – 19 में से 19 भेद: सभी जीवसमास।
17. पर्याप्ति – 6 में से 6 भेद: आहार, शरीर, इन्द्रिय, श्वासोच्छ्वास, भाषा, मन:पर्याप्ति।
18. प्राण – 10 में से 10 प्राण: सभी दसों प्राण।
19. संज्ञा – 4 में 4 भेद: आहार, भय, मैथुन, परिग्रह।
20. उपयोग – 12 में से 10 भेद: केवलदर्शन और केवलज्ञान नही होता
21. ध्यान – 16 में से 13 भेद: 
आर्त ध्यान (4) – इष्टवियोगज, अनिष्टसंयोगज, वेदना, निदान
रौद्र ध्यान (4) – हिंसानंदी, मृषानंदी, चौर्यानंदी, परिग्रहनंदी
धर्मध्यान (4) – आज्ञाविचय, अपायविचय, विपाकविचय, संस्थान विचय धर्मध्यान।
शुक्लध्यान (1) पृथक्त्ववितर्क वीचार
22. आस्रव – 57 में से 55 भेद: हास्य या शोक में से एक, रति और अरति मे से एक। बाकी सभी
23. जाति – 84 लाख में से सभी 84 लाख जातियाँ।
(चारों गति संबंधि जाति)
24. कुल – साढे 199 लाख करोड़ में से सभी कुल होते है। (चारो गति संबंधी कुल)

✍️ हास्य नोकषाय :-
जिस कर्म के उदय से अनेक प्रकार का परिहास उत्पन्न होता है, वह हास्य कर्म है। *(धवला १३/३६१)*
जिसके उदय से हँसी आती है वह हास्य कर्म है *(सर्वार्थसिद्धि ८/९)*
∆ हास्य नोकषाय वाले का लक्षण :-
हास्य नोकषाय का उदय होने पर यह जीव प्रसन्नता के अवसर पर साकूत क्रोध में तथा कहीं पर अपमान होने के बाद अकेले ही या अन्य लोगों के सामने भी प्रकट कारण के बिना ही अर्थात् बिना कारण ही हँसता है अथवा अपने आप कुछ बड़बड़ाता जाता है। *(वरांग चारित्र ४/८३)*

✍️ रति नोकषाय :-
जिस कर्म-स्कन्ध के उदय से द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावों में राग उत्पन्न होता है उसकी रति संज्ञा है। *(धवला ६/४७)*
मनोहर वस्तुओं में परम प्रीति को रति कहते हैं। *(नि.सा.ता.६)*
∆ रति नोकषाय वाले का लक्षण :-
जब किसी जीव के रति नोकषाय का उदय होता है तो उसे उन दुष्ट लोगों से ही प्रीति होती है जो पाप कर्मों के करने में ही सदा लगे रहते हैं, जिनके कर्मों का परिणाम कुफल प्राप्ति ही होती है तथा निष्कर्ष शुद्ध अहित ही होता है। *(वरांग चारित्र ४/८४)*

✍️ अरति नोकषाय :-
जिसके उदय से आत्मा की देश आदि में उत्सुकता उत्पन्न नहीं होती है वह अरति कषाय है *(सर्वार्थसिद्धि ८/९)*
नाती, पुत्र एवं स्त्री आदि में रमण करने का नाम रति है, इसकी प्रतिपक्षभूत अरति कही जाती है। *(धवला १२/१८५)*
∆ अरति नोकषाय वाले का लक्षण :-
अरति नोकषाय के फल में जीव ज्ञानार्जन के साधन, व्रतपालन का शुभ अवसर, तप तपने की सुविधाएँ, ज्ञानाभावमार्जन की सामग्री, लौकिक और पारलौकिक सम्पत्ति (द्रव्य) तथा अन्य सुखों के कारणों की प्राप्ति हो जाने पर भी अपने आपको उनमें नहीं लगा सकता है। *(वरांग चारित्र ४/८५)*

✍️ शोक नोकषाय :-
उपकार करने वाले से सम्बन्ध के टूट जाने पर जो विकलता होती है वह शोक है। *(सर्वार्थसिद्धि ८/९)*
जिसके उदय से शोक होता है, वह शोक है *(राजवार्तिक ८/९)*
∆ शोक नोकषाय का लक्षण :-
जब प्राणी हर एक बात से उदासीन हो जाता है, लम्बी-लम्बी साँस छोड़ता है, मन को नियन्त्रित नहीं कर पाता है, फलतः मन सबसे अव्यवस्थित होकर चक्कर काटता है, इन्द्रियाँ इतनी दुर्बल हो जाती हैं कि अपना कार्य भी नहीं कर पाती हैं तथा बुद्धि विचार नहीं कर सकती है तब समझिये कि उसके शोक नोकषाय का उदय है। *(वरांग चारित्र ४/८७)*

✍️ किन हास्य कषाय वाले के वचन योग नहीं है :-
एकेन्द्रिय तथा लब्ध्यपर्याप्तक जीवों के वचनयोग नहीं होता है।
द्वीन्द्रियादि सभी जीवों की निर्वृत्यपर्याप्तक तथा अनाहारक अवस्था में भी बचन योग नहीं होता है।

✍️ शोक कषाय वाले पुरुषवेदी के गतियाँ :-
शोक कषायवाले पुरुषवेदी के तीन गतियाँ होती हैं (१) तिर्यञ्चगति (२) मनुष्यगति (३) देवगति। नरक गति नहीं है क्योंकि वहाँ पुरुषवेद नहीं पाया जाता है।

✍️ नारकियों के हास्य-रति कषाय का कारण :-
 नारकियों के उदय योग्य प्रकृतियों में मोहनीय कर्म की स्त्रीवेद एवं पुरुषवेद को छोड़ कर शेष २६ प्रकृतियाँ बतायी गई हैं। नारकी जीव भी दूसरे के मारने आदि की भावना पूरी होने पर खुश होते ही होंगे। अथवा तीसरे नरक तक देवों के द्वारा धर्मोपदेश सुन कर प्रसन्नता की अनुभूति होती है, उसे भी हास्य-रति कहा जा सकता है। 

✍️ देवों में अरति-शोक सम्बन्धी आस्रव प्रत्यय होने का कारण :-
देवों में भी अरति शोक का उदय पाया जाता है इसलिए उनके अरति-शोक सम्बन्धी आस्रव होता ही है। देव भी जब वाहन आदि बनने का आदेश सुनते हैं, उनकी देवांगना आदि रूठ जाती हैं तब उनके अरति, शोक का उदय होता है।

✍️ हास्य कषाय वाले अवधिज्ञानी के जीवसमास :-
हास्य कषायवाले अवधिज्ञानी के एक ही जीवसमास होता है सैनी पंचेन्द्रिय।

✍️ हास्य कषाय के साथ अचक्षुदर्शन में गुणस्थान :-
हास्य कषाय के साथ अचक्षुदर्शन में आठ गुणस्थान पाये जाते हैं- पहले से आठवें तक।

✍️ हास्य कषाय में अवधिदर्शनी के जातियाँ :-
हास्य कषाय में अवधिदर्शनी के पंचेन्द्रिय सम्बन्धी 26 लाख जातियाँ होती है।

✍️ हास्य कषाय के उदय मे आहार संज्ञा नहीं होना :-
सातवें एवं आठवें गुणस्थान वालों के हास्य कषाय का उदय होने पर भी आहार संज्ञा नहीं होती है, क्योंकि आहार संज्ञा छठे गुणस्थान से आगे नहीं होती है।

✍️ अनाहारक अवस्था नहीं होने वाले हास्य-रति कषाय वाले जीव :-
(१) तीसरे, पाँचवें, छठे, सातवें तथा आठवें गुणस्थान में स्थित हास्य-रति कषाय वाले जीवों के अनाहारक अवस्था नहीं होती है। 
(२) त्रऋजुगति से जाने वाले पहले, दूसरे तथा चौथे गुणस्थान वालों के भी हास्य-रति कषाय के साथ अनाहारक अवस्था नहीं होती है।

✍️ अरति-शोक वालों के अनाहारक अवस्था में गुणस्थान :-
अरति-शोक वालों के अनाहारक अवस्था में 03 गुणस्थान होते हैं पहला, दूसरा, चौथा। 
नोट - तेरहवें-चौदहवें में अरति-शोक कषाय नहीं है इसलिए उनका यहाँ ग्रहण नहीं किया है।

✍️ रति कषायवाले असैनी जीवों के कितने जीवसमास :-
रति कषाय वाले असैनी जीवों के 18 जीवसमास होते हैं - एकेन्द्रिय सम्बन्धी 14, विकलत्रय के 03 तथा असैनी पंचेन्द्रिय का 01 
*कषाय मार्गणा से चौबीस ठाणा में हास्यादि चार नोकषाय का वर्णन पूर्ण हुआ।*
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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*


बुधवार, 12 अगस्त 2026

38. कषाय मार्गणा - संज्वलन लोभ मे चौबीस ठाणा

38. कषाय मार्गणा - संज्वलन लोभ मे चौबीस ठाणा*
https://youtu.be/cITo6y_CjyA?si=XJVNj5fcmFWzDdp5
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जो संयम के साथ-साथ प्रकाशमान रहे एवं जिनके उदय से यथाख्यात चारित्र न हो वे संज्वलन कषायें हैं। *(हरिवंश पुराण ५८/२४१)*
∆ संज्वलन क्रोधादिक सकल कषाय के अभाव रूप यथाख्यात चारित्र का घात करते हैं। 
∆ संयम के साथ अवस्थान होने पर एक होकर जो ज्वलित होते हैं अर्थात् चमकते हैं अथवा जिनके स‌द्भाव में संयम चमकता रहता है उसे संज्वलन कषाय कहते हैं। *(सर्वार्थसिद्धि ८/९)*

*✍️ संज्वलन लोभ में 24 स्थान :-*
01. गति –    04 में 01 भेद: मनुष्य।
02. इन्द्रिय – 05 में से 01 भेद: पंचेन्द्रिय जीव।
03. काय –   06 में से 01 भेद: त्रसकाय।
04. योग –   15 में से 11 योग:
मनोयोग 04, वचनयोग 04, काययोग 03, (औदारिक काययोग, आहारक द्विक काययोग)
05. वेद – 03 में से 03 वेद: भाववेद अपेक्षा तीनों वेदों में। (अपगत वेदी भी)
06. कषाय – 25 में से 10 कषाय: 01 स्वकीय कषाय तथा 09 नोकषाय।
07. ज्ञान – 08 में से 04 ज्ञान: मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्यय ज्ञान।
08. संयम – 07 में से 04 भेद: सामायिक, छेदोपस्थाना, परिहार विशुद्धि, सूक्ष्म सांपराय
09. दर्शन – 04 में 03 दर्शन: चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन, अवधिदर्शन।
10. लेश्या –   06 में 03 लेश्या: पीत, पद्म, शुक्ल। 
11. भव्यत्व – 02 में से 01 भेद: भव्य।
12. सम्यक्त्व – 06 में से 03 भेद: औपशमिक, क्षायिक, क्षायोपशमिक।
13. संज्ञी –       02 में से 01 भेद: संज्ञी।
14. आहारक – 02 में से 01 भेद: आहारक।
15. गुणस्थान – 14 में 05 भेद: छठे से दस तक।
16. जीवसमास – 19 में से 01 भेद: सैनी पंचेन्द्रिय।
17. पर्याप्ति – 06 में से 06 भेद: आहार, शरीर, इन्द्रिय, श्वासोच्छ्वास, भाषा, मन:पर्याप्ति।
18. प्राण – 10 में से 10 प्राण: सभी दसों प्राण।
19. संज्ञा – 4 में 4 भेद: आहार, भय, मैथुन, परिग्रह।
20. उपयोग – 12 में से 07 भेद:
4 ज्ञानोपयोग – मतिज्ञानोपयोग, श्रुतज्ञानोपयोग, अवधिज्ञानोपयोग, मनःपर्यय ज्ञानोपयोग
3 दर्शनोपयोग – चक्षुदर्शनोपयोग, अचक्षुदर्शनोपयोग, अवधिदर्शनोपयोग।
21. ध्यान – 16 में से 08 भेद: 
आर्त ध्यान (3) – इष्टवियोगज, अनिष्टसंयोगज, वेदना।
धर्मध्यान (4) – आज्ञाविचय, अपायविचय, विपाकविचय, संस्थान विचय धर्मध्यान।
शुक्लध्यान (1) 
22. आस्रव – 57 में से 21 भेद: कषाय 10, योग 11।
23. जाति – 84 लाख में से सभी 14 लाख जातियाँ। *(मनुष्यगति संबंधि जाति)*
24. कुल – 199.5 लाख करोड़ में से 14 लाख करोड़ कुल। *(मनुष्य संबंधी कुल)*

*✍️ संज्वलन लोभ की उपमा :-*
संज्वलन लोभ को हारिद्र सदृश कहा गया है अर्थात् हल्दी के रंग की उपमा दी है। (ज.ध. १२/१५५)
∆ हारिद्र सदृश लोभ – जिस प्रकार हल्दी से रंगे गये वस्त्र का वर्ण चिरकाल तक नहीं ठहरता, वायु और आतप आदि के निमित्त से ही उड़ जाता है; उसी प्रकार यह लोभ का भेद मन्दतम अनुभाग से परिणत होने के कारण चिरकाल तक आत्मा में नहीं ठहरता है, क्षणमात्र में ही दूर हो जाता है। *(जय धवला १२/१५७)*

◆ संज्वलन लोभ वालों के हास्यादि कषाय का अभाव भी हो सकता है ?
हाँ, संज्वलन लोभ वालों के आठवें गुणस्थान के बाद अर्थात् नौवें, दसवें गुणस्थान में अवेद भाग से पहले हास्यादि कषायों का अभाव हो जाता है। 

*✍️ संज्वलन लोभ में निर्वृत्यपर्याप्तक अवस्था :-*
संज्वलन लोभ वाला भी जब छठे गुणस्थान में आहारक मिश्र योग वाला होता है तो उसके भी निर्वृत्यपर्याप्तक अवस्था बन जाती है। (जब आहारक शरीर बनता है तो वह शरीर सभी पर्याप्तिया पूर्ण करता है)

*✍️ संज्वलन लोभ में संयम :-*
संज्वलन लोभ में चार संयम होते हैं – सामायिक, छेदोपस्थापना, परिहार विशुद्धि और सूक्ष्मसाम्पराय। क्योंकि संज्वलन लोभ का उदय छठे गुणस्थान से दसवें गुणस्थान तक होता है।

*✍️ संज्वलन लोभ वाले के कौन से गुणस्थान में कौन सा सम्यक्त्व :-*
∆ छठे - सातवें गुणस्थान में क्षायिक, क्षायोपशमिक तथा उपशम सम्यक्त्व।
∆ उपशमश्रेणी के 8, 9, 10 गुणस्थान मे क्षायिक तथा उपशम सम्यक्त्व।
∆ क्षपक श्रेणी के 8, 9, 10 गुणस्थान में क्षायिक सम्यक्त्व।

*✍️  संज्वलन लोभ वाले के कम-से-कम प्राण :-*
संज्वलन लोभ वाले के कम-से-कम 07 प्राण हो सकते हैं - 05 इन्द्रिय प्राण, काय बल तथा आयु। ये 07 प्राण आहारकमिश्र की अपेक्षा जानने चाहिए क्योंकि संज्वलन लोभ का उदय 06 गुणस्थान से 10 गुणस्थान तक पाया जाता है।

*✍️ संज्वलन लोभ का उदय में चारों संज्ञाएँ की अपेक्षा :-*
संज्वलन लोभ का उदय दसवे गुणस्थान में ही नहीं होता है अपितु छठे से दसवे गुणस्थान तक होता है। इसलिए चारो संज्ञाएँ होती है।
छठे गुणस्थान में चारो संज्ञाए, सातवे गुणस्थान में आहार संज्ञा के अलावा तीनो संज्ञा, आठवे गुणस्थान में भी तीनो संज्ञाएं, नौवे गुणस्थान में भय भी चला जाता है केवल मैथुन और परिग्रह संज्ञा होती है। नौवे के अवेद भाग में एकमात्र परिग्रह संज्ञा बची, दसवे गुणस्थान में केवल परिग्रह संज्ञा रहती है।
👉 संज्वलन लोभ कषाय वालों के परिग्रह संज्ञा का अभाव नहीं हो सकता है क्योंकि कषाय के रहते हुए इच्छा, वांछाओं का अभाव नहीं हो सकता है। बाकी तीन संज्ञाओ का अभाव दसवे गुणस्थान से पहले हो जाता है।

*✍️ धर्मध्यान से रहित संज्वलन लोभ वाले जीव :-*
जिनके छठे गुणस्थान वालों के आर्त्तध्यान होते हैं उनके धर्मध्यान नहीं होते तथा अष्टम गुणस्थान से दसवें गुणस्थान तक मुनिराज धर्मध्यान से रहित होते हैं अर्थात् प्रथम शुक्ल ध्यान वाले होते हैं। अथवा सप्तम गुणस्थान से दसवें गुणस्थानवर्ती मुनिराज धर्मध्यानी ही होते हैं।

*✍️ आर्त्तध्यान नहीं होने वाले संज्वलन लोभ वाले :-*
सातवें गुणस्थान से दसवें गुणस्थान तक के संज्वलन लोभ कषायवालों के आर्त्तध्यान नहीं होते हैं।

*✍️ संज्वलन लोभ में कम-से-कम कितने आस्रव के प्रत्यय :-*
संज्वलन लोभ वालों के कम-से-कम 10 आस्रव के प्रत्यय होते हैं - 09 योग तथा 01 कषाय
9 योग - 4 मनोयोग, 4 वचनयोग तथा औदारिक काययोग।
01 कषाय - संज्वलन लोभ कषाय
◆ संज्वलन लोभ में ज्यादा से ज्यादा 21 आस्रव के प्रत्यय होते है (10 कषाय और 11 योग)
10 कषाय - नौ नोकषाय तथा संज्वलन क्रौधादि से एक
11 योग - मनोयोग 4, वचनयोग 4, काययोग 3, (औदारिक काययोग, आहारक द्विक काययोग)
*चौबीस ठाणा कषाय मार्गणा से संज्वलन लोभ मे चौबीस स्थान का वर्णन पूर्ण हुआ।*
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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*

39. कषाय मार्गणा - हास्यादि चार नोकषाय

*39. कषाय मार्गणा - हास्यादि चार नोकषाय* https://youtu.be/h980k6RrJXE?si=0-2dgRJDN2s4kySr 🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴 ✍️ हास्य, रति, अरति, शोक में 24...