बुधवार, 23 अप्रैल 2025

9. गति अपेक्षा सम्यक्तव की गमन स्थिति*

 9. गति अपेक्षा सम्यक्तव की गमन स्थिति*

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*किस गति के जीव सम्यग्दर्शन सहित किस गति मे जा सकते है*

*क्षायिक अथवा कृतकृत्य वेदक सम्यक्तव* ऐसा है जो एक गति से दुसरी गति मे साथ जा सकता है। इससे चारो गति में जा सकता है।

जिसने मिथ्यात्व अवस्था मे किसी भी आयु का बंध कर लिया है फिर क्षयिक या कृतकृत्य वेदक सम्यक्तव प्राप्त करा हो तो इनसे सहित वह चारो गति मे जा सकता है। नरकायु बांधी हो तो नरकगति मे, तिर्यंचायु या मनुष्यायु बांधी हो तो भोगभूमि का मनुष्य या तिर्यंच, नही तो देव मे।

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*✍️ ०१) मनुष्यगति*

मनुष्यगति मे तीनो सम्यक्त्व उत्पन्न हो सकते है उपशम (प्रथमाेपशम–द्वितीयोपशम), क्षयोपशम (कृतकृत्य वेदक) और क्षायिक सम्यक।

*प्रथमाेपशम सम्यक्त्व* के साथ मनुष्य किसी भी गति मे नही जा सकता, क्योकी प्रथमाेपशम मे मरण नही होता।

*द्वितीयोपशम सम्यक्त्व* के साथ मनुष्य केवल देवगति मे जाता हैं इसके अलावा कई और नही जा सकता। द्वितीयोपशम सम्यक्त्व के काल मे मुनिराज का मरण होता है तथा वे नियम से देवगति के देव बनेगे, थोडी देर के लिए द्वितीयोपशम वहा पर रहेगा उसके बाद बदलकर क्षयोपशमिक हो जाएगा।

*क्षायोपशमिक सम्यक्त्व* के साथ मनुष्य केवल देवगति मे ही जाता है अन्य तीन गति मे नही जाता

*कृतकृत्य वेदक* के साथ मनुष्य चारो गति मे जा सकता है।

*क्षायिक सम्यक्त्व* के साथ मनुष्य चारो गति मे जा सकता है।

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*✍️ ०२) तिर्यंचगति* 

तिर्यंचगति का जीव दो ही सम्यक उत्पन्न कर सकता है–प्रथमोपशम और क्षायोपशमिक सम्यक्त्व।

तिर्यंच क्षायिक या कृतकृत्य वेदक की शुरुवात नही कर सकता चाहे भोगभूमि का हो या कर्मभूमि का तिर्यंच। क्षायिक या कृतकृत्य वेदक की शुरुवात कर्मभूमि का मनुष्यगति का जीव ही कर सकता है अन्य किसी भी गति का जीव नही।

*प्रथमाेपशम सम्यक्त्व* के साथ तिर्यंच किसी भी गति मे नही जा सकता, क्योकी प्रथमाेपशम मे मरण नही होता।

*द्वितीयोपशम सम्यक्त्व* के साथ तिर्यंचो के होता ही नही है। यह केवल मुनियो के होता है।

*क्षायोपशमिक सम्यक्त्व* के साथ तिर्यंच देवगति मे जा सकता है अन्य किसी गति मे नही।

*कृतकृत्य वेदक* के साथ तिर्यंच जीव कई नही जा सकते क्योकि ये तिर्यंचो के होता ही नही। कोई भी तिर्यंच क्षायिक की शुरुवात करता ही नही है तो कृतकृत्य वेदक होता ही नही है।

*क्षायिक सम्यक्त्व* क्षायिक सम्यक्त्व कर्मभूमि के तिर्यंचो के होता नही है लेकिन कर्मभूमि के मनुष्यो को साथ ले जाने की अपेक्षा भोगभूमि के तिर्यंचो को निष्ठापन की अपेक्षा से क्षायिक सम्यक्त्व होता है और वे नियम से देवगति मे जाएगे

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*✍️ ०३) नारकगति* 

नारकी जीव दो ही सम्यक्त्व उत्पन्न कर सकता है- उपशम और क्षयोपश्म सम्यक्त्व लेकिन नरक मे तीनो सम्यक्त्व होते है– उपशम, क्षयोपश्म और क्षायिक सम्यक्त्व। यहा क्षायिक सम्यक मनुष्यगति के जीव के साथ मरण होने पर आता है और प्रथम रत्नप्रभा पृथ्वी मे जन्म लेता हैं अन्य मे नही।

*प्रथमाेपशम सम्यक्त्व* के साथ नारकी जीव कई नही जाता क्योकी प्रथमाेपशम मे मरण ही नही है।

*द्वितीयोपशम सम्यक्त्व* के साथ नारकी जीव कई नही जाता क्योकी यह नारकी के होता ही नही है।

*क्षायोपशमिक सम्यक्त्व* के साथ नारकी जीव एक मात्र मनुष्य गति मे जा सकते है।

*कृतकृत्य वेदक* के साथ नारकी जीव कई नही जाते क्योकि वहा उत्पन्न ही नही होता।

*क्षायिक सम्यक्त्व* के साथ नारकी जीव एक मात्र मनुष्य गति मे जा सकते है।

✍️ लेकिन नारकियो मे सम्यक्त्व मार्गणा के छ्हो भेद होते है। कुछ साथ ले जाने की अपेक्षा से कुछ उप्पन्न होने की अपेक्षा से

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*✍️ ०४) देवगति* 

देवगति मे जीव दो ही सम्यक्त्व उत्पन्न कर सकता है- उपशम और क्षयोपश्म सम्यक्त्व लेकिन देवो मे तीनो सम्यक्त्व होते है– उपशम, क्षयोपश्म और क्षायिक सम्यक्त्व। यहा क्षायिक सम्यक मनुष्यगति के जीव के साथ मरण होने पर आता है।

*प्रथमाेपशम सम्यक्त्व* के साथ देव कई नही जाते क्योकी इसमे मरण ही नही होता।

*द्वितीयोपशम सम्यक्त्व* साथ देव कई नही जाते क्योकि मनुष्यगति से लेकर गया तो होता है लेकिन वह थोडी देर ही रहता है फिर खत्म हो जाता है।

*क्षायोपशमिक सम्यक्त्व* के साथ देव मनुष्य गति मे जाते है।

*कृतकृत्य वेदक* के साथ देव कही भी नही जाते क्योकि यहा उत्पन्न होता भी नही है।

*क्षायिक सम्यक्त्व* के साथ देव मनुष्यगति मे ही जाएगा।

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*आगम के परिपेक्ष में (शलभ जैन)*




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